Showing posts with label article. Show all posts
Showing posts with label article. Show all posts

Monday, 10 August 2015

हरियाली जरूरी है

Author: 
विमल भाई
.

हमारी जीवन पद्धति व सरकारी नीतियाँ केन्द्रित व्यवस्था को ही बढ़ावा दे रही हैं। जिसके कारण हम आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं। नतीजा है कि हम अपने से ज्यादा कुछ ना सोच पा रहे हैं ना ही धरती के पर्यावरण के लिये जो कुछ बहुत आसानी से भी किया जा सकता है वो भी नहीं कर पा रहे हैं।

हमने धरती को खोद-खोदकर खनिजों के अम्बार उसकी छाती पर खड़े कर दिये हैं। जिससे ना केवल धरती को खुद भी साँस लेना दूभर हो रहा है। उसका ओजोन आवरण भी छिद्रों वाला होता जा रहा है।

धरती की हरी चादर कमतर होती जा रही है। या फिर बाजार के अनुसार बनाई जा रही है। जो पेड़ शहरी सभ्यता को पोषित करते हैं उनको बढ़ावा दिया जा रहा है। किन्तु धरती के जीवन की रक्षा करने का सोच समाप्त होता जा रहा है।

आज हमारा भोजन अत्यन्त जहरीला हो चुका है जिसका कारण हमारी जीवन पद्धति ही है। केन्द्रित जीवन और केन्द्रित फ्लैट व्यवस्था में रहने वाला समाज अपने छोटे दायरे से बाहर भी नहीं निकल पाता और दूसरी तरफ उस उच्च और मध्यम वर्ग की सेवा मे रत निर्धन समाज मात्र ‘भोजन-आवास’ चाहे जैसा मिल जाये, उसके लिये संघर्षरत है।

स्वास्थ्य सेवाओं की शिक्षा की तो बात ही दूर है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा उन्हें देना अजीब लगेगा। किन्तु यह उनके लिये शायद ज्यादा जरूरी है चूँकि वे साधन हीन हैं।

5 जून को संसार भर में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन हम सभी को यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि जहाँ भी जगह होगी हम वृक्षों को लगाएँगे।

पीपल, बड़, नीम, सागौन, अर्जुन, बेहड़ा, आँवला, बेल, अमरुद, नींबू, भीमल, अमरुद, कटहल, जामुन और सब चौड़ी पत्ती के पेड़ इसके और धरती के सब जीवों के जीवन रक्षा आधार है। धरती के भिन्न स्थानों पर भिन्न जाति-प्रजाति के वृक्ष-पौधे-लताएँ लुटती-मरती धरती को प्राण देने का काम कर सकते हैं। शहरों में जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है। पेड़ों के लगाने से पानी भी धरती में जाएगा।

बेल, नींबू, आँवला, अमरुद व पपीता इस स्वास्थ्यरक्षक पंचवटी के साथ यदि केला और पौधों में पोदीना, तुलसी, एलोविरा तथा गिलॉय की बेल जोड़ ले तो सोने पर सुहागा हो जाता है। यह सब बहुत ही कम स्थान लेने वाले होते हैं। सड़कों के किनारे, मध्यमवर्गीय सोसायटियों में यहाँ तक की फ्लैटों की बालकनी का भी सदुपयोग हो सकता है।

यहाँ यह भी बता दूँ कि देखने में यह आया है कि इन आवासीय सोसायटियों में ज्यादातर पहले तो सीमेंट बिछा दी जाती है फिर गमलों में खूबसूरत दिखने वाले पौधों को रख दिया जाता है। जिनमें बार-बार पानी देने की जरूरत होती है। यदि रसोई के पानी को थोड़ा सा फिल्टर करके कच्ची ज़मीन में लगे पौधों की सिंचाई की जाये तो चार तरह के फायदे होंगे।

पहला गन्दे पानी की मात्रा कम हो जाएगी, दूसरा धरती को भी पानी मिलेगा, तीसरा पौधों के लिये अलग से पानी नहीं लेना पड़ेगा और चौथा की दवाईयों का खर्चा कम होगा स्वास्थ्यरक्षण होगा। इस काम के लिये कोई अलग से खर्चा नहीं होगा वरन् लोगों का खर्चा कम होकर आमदनी ही बढ़ेगी।

यदि शहरों के चौराहों के बीच बने छोटे-छोटे गोलपार्कों में चौड़ी पत्ती के पेड़ किनारों पर और बीच में यह फलदार पंचवटियों का निर्माण कर दिया जाये तो वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण तो कम होगा ही साथ में ये लाभप्रद फल भी सरकारी मालियों को अतिरिक्त लाभ में दिये जा सकते हैं। जरूरत सिर्फ यह है कि आजकल प्रचलन में आये सीमेंट व प्लास्टिक के पेड़ों को सुन्दरता का चेहरा ना माना जाये और इस प्रकार की बड़ी सोच को लिया जाये।

आज की सरकार स्वच्छ भारत अभियान चला रही है। उसके फूहड़पन का एक उदाहरण है। उत्तराखण्ड के सुदूर पहाड़ी इलाकों में टिहरी बाँध निर्माण कम्पनी टी.एच.डी.सी. शौचालयों का ‘कम्पनी सामाजिक दायित्व’ के पैसे से मरम्मत करवा रही है। इस मरम्मत के कार्य पर प्रतिदिन कड़ी निगरानी रखी जा रही है।

रोज शाम को व्हाट्सएप पर किये गए कार्य का चित्र कम्पनी इकट्ठा करती है और केन्द्र सरकार को भेजती है। फिर चाहे शौचालयों में पानी हो या ना हो। चूँकि पहाड़ में भी पानी का संकट है। बावजूद इसके की पहाड़ का पानी शहरों के शौचालयों तक की जल ज़रूरतों को पूरा करता है। यहाँ यह बात बतानी है कि टिहरी बाँध के सन्दर्भ में 2003 की वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार लगभग नौ हजार हेक्टेयर जंगल फेल था और लगभग आठ हजार हेक्टेयर जंगल सही नहीं लगा पाई थी।

हम बाँध पर यहाँ कोई चर्चा नहीं कर रहे हैं किन्तु जैसे शौचालय मरम्मत के लिये सरकारी व टी.एच.डी.सी. की निगरानी हो रही है काश वो जंगल लगाने के लिये भी हो जाती तो आज बाँध में पानी से होड़ लेते रेत के मैदान ना बनते। कैसे स्वयं ही उगने वाले पहाड़ के दुश्मन पेड़ चीड़ को जलसंग्रहण क्षेत्र संरक्षण के लिये लगाए गए पेड़ बताकर पहाड़ का सत्यानाश कर दिया गया। गर्मियों में आग फैलाते और किसी भी तरह के अन्य पेड़ो को ना पैदा होने देने वाले चीड़ के पेड़ उत्तराखण्ड के पहाड़ों को तेजी से ढँकते जा रहे हैं।

जरूरत है कि योजनाबद्ध रूप से चीड़ को काटा जाये और वहाँ स्थानीय लोगों को जिम्मेदार बनाकर बांज, बुरांस, भीमल जैसे मिट्टी-पानी को बाँधने वाले व चारा देने वाले पेड़ व पहाड़ी फलों के पेड़ आदि लगाए जाएँ। इसके लिये मात्र एक राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है जो स्वच्छ भारत के ढिंढोरा ज्यादा कारगार सिद्ध होगा।

हमारी शिक्षा व्यवस्था में पेड़-पौधों-लताओं के बारे में आवश्यक रूप से शिक्षण होना चाहिए। कौन से पेड़-पौधे-लताएँ कब कहाँ कैसे उगाए जा सकते हैं। उनके लाभ-हानि व हर तरह के उपयोग का शिक्षण होना चाहिए। ताकि हर बच्चा आरम्भ से ही धरती का रक्षक व अपने स्वास्थ्य के रक्षण के बारे में समझ रखें। यह मात्र सरकारी वन विभाग या शहरों के उद्यान विभाग का ही कार्य ना होना चाहिए। शिक्षकों की भूमिका इसमें बहुत ही महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

धरती के संरक्षण के लिये सफल परिणाम के लिये कटिबद्ध सरकारी नीतियाँ तो चाहिए ही साथ ही इस कार्य को एक जनआन्दोलन बनाने के लिये जन जागृति और जन संगठन भी चाहिए।

Saturday, 2 May 2015

फिर जल-सत्याग्रह 2-05-2015

Home 

http://hindi.indiawaterportal.org/node/49258

Author:
विमल भाई 
 
. 
 
मध्य प्रदेश के घोघलगाँव में जल सत्याग्रह को आज लेख लिखने तक 22 दिन हो गए। सत्याग्रहियों के पैर गल रहे हैं, लगातार खुजली हो रही है। बुखार की शिकायत लगातार बनी हुई है। खून पैरों से रिसने लगा है। किन्तु ओंकारेश्वर बाँध प्रभावितों में अपने अधिकारों के लिये उत्साह में कमी नहीं हुई। सत्याग्रह स्थल पर एकदा, गोल सैलानी, सकतापुर, टोकी, केलवा, खुर्द, केलवा बुजर्ग, कामनाखेड़ा आदि डूब प्रभावित गाँवों के लोग लगातार पहुँच कर अपना समर्थन व्यक्त कर रहे हैं।

घोघलगाँव के जल सत्याग्रहियों को देखने जब सरकारी डॉक्टर्स की टीम पहुँची और उन्होंनेे जल सत्याग्रहियों के स्वास्थ्य की जाँच की। उन्होंने देखा कि जल सत्याग्रहियों के पैर गल गए हैं और खून आ रहा है। सरकारी डॉक्टर्स ने इलाज का आग्रह किया तो सत्यग्रहियों ने कहा कि हमारा इलाज सरकार के पास है वो हमारी माँगे पूरी करे। हमारा इलाज हो जाएगा इसके अलावा हम कोई इलाज नहीं लेंगे। बात सही है। न्यायपूर्ण है।

नर्मदा नदी पर बने बड़े बाँधों में से एक ओंकारेश्वर बाँध है। इस बाँध की ऊँचाई बिना पुनर्वास बढ़ा दी गई जिस से 5 गाँव डूब में आ गए। ओंकारेश्वर बाँध को दी गई क़ानूनी मंजूरियों के अनुसार बाँध निर्माण के 6 माह पहले पुनर्वास पूरा होना जरूरी है। बिजली चाहिए- विकास तो चाहिए ही के नारे के बीच बाँध का निर्माण तो पूरा कर लिया गया परन्तु विस्थापितों का पुनर्वास नहीं किया गया।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन की याचिका पर 2008 में उच्च न्यायालय और 2011 में सर्वाेच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि पुनर्वास नहीं हुआ है। इसके बाद भी बिना बाँध कम्पनी नेशनल हाईड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने बिना पुनर्वास किए बाँध में पानी भर दिया। इस डूब के खिलाफ सन् 2012 में 17 दिन का जल सत्याग्रह हुआ। लोग पानी में खड़े रहे। उनके पैर और बदन गले तब सरकार पर असर आया और मध्य प्रदेश सरकार ने 225 करोड़ का पैकेज बाँध प्रभावितों को दिया। परन्तु इस पैकेज को भी पुनर्वास नीति के अनुरूप नहीं बनाने से सैकड़ों प्रभावितों को उनके अधिकार नहीं मिल सके।

.    
 
प्रभावितों की ओर से नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने 22 अप्रैल को मुख्यमन्त्री को पत्र भेजकर बार-बार माँग की थी कि ओंकारेश्वर बाँध प्रभावितों को सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश व पुनर्वास नीति के अनुसार अनुदान देकर यह सुनिश्चित किया जाए कि उन्हें पात्रता अनुसार न्यूनतम 5 एकड़ ज़मीन उपलब्ध हो जाए। यह भी आग्रह किया गया कि घर प्लाट एवं अन्य पुनर्वास की समस्याओं का समाधान भी तत्काल किया जाए।

यह सीधी सरल सी माँग थी। ना बाँध का विरोध था। ना कोई और झगड़ा। न्यायपूर्ण माँग है। सरकार जब कम्पनियों को देश के विकास के नाम पर हर तरह की ज़मीन देने को तत्पर है तो बाँध विस्थापितों को उनके हक की ज़मीन क्यों नहीं दे रही? इस प्रश्न से सरकार क्यों बच रही है? नर्मदा बचाओ आन्दोलन के नेता आलोक अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि आन्दोलन विस्थापितों के पुनर्वास के लिये हर तरह के सहयोग के लिये तैयार है। सरकार एक संयुक्त समिति बनाकर एक निश्चित समय सीमा में पुनर्वास पूरा करे ताकि विस्थापितों को उनके अधिकार मिल सके और बाँध की पूरी क्षमता का उपयोग कर लाभ क्षेत्र में किसानों को सिंचाई उपलब्ध कराई जा सके। आलोक अग्रवाल सहित लोगो को बुखार भी आ रहा है पर सभी सत्याग्रहियों के हौसले बुलन्द हैं कि वो अपने अधिकार लेकर रहेंगे।

आन्दोलन की वरिष्ठ कार्यकर्ता सुश्री चित्तरूपा पालित के नेतृत्व में विस्थापितों का एक प्रतिनिधि मण्डल 23 अप्रैल को नर्मदा मन्त्री से मिला था और लम्बी चर्चा के बाद उन्होंने आश्वासन दिया था कि वह उन सभी विषयों पर मुख्यमन्त्री जी से चर्चा कर निर्णय लेंगे, विस्थापित आज भी इन्तजार कर रहे हैं कि श्री आर्य ने मुख्यमन्त्री जी से बात कर क्या निर्णय लिये।

आज भी घोघलगाँव में जल सत्याग्रह जारी है। विस्थापित/प्रभावित सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश व पुनर्वास नीति के अनुसार अनुदान और यह सुनिश्चितता चाहते हैं। गत् 7 जून 2013 के पैकेज के भी कुछ आदेशों का आज तक पालन नहीं हुआ हैं। अप्रैल 28, मंगलवार को बिना पुनर्वास डूब की स्थिति बनने से नर्मदा बचाओ आन्दोलन की तरफ से उच्चतम न्यायालय में एक अर्जी दी गई थी आज सर्वाेच्च न्यायालय में दायर अर्जी पर न्यायालय ने उसकी तात्कालिकता को अस्वीकार करते हुए अवमानना याचिका की तारीख आगे बढ़ा दी।

लगभग 2000 औसत और छोटे किसान तथा सूचीय आदिवासी व सूचीय जाति के परिवार अपने अधिकारों के लिये लड़ रहे हैं। उनकी न्यायपूर्ण लड़ाई सरकार के खिलाफ है जो ना तो कानून, ना ही लोगों का सम्मान कर रही है।

खण्डवा जल सत्याग्रह 
उदाहरण सामने है 11 अप्रैल 2015 को बाँध कम्पनी नेशनल हाईड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने बिना विस्थापितों का पुनर्वास किए ओंकारेश्वर बाँध को 191 मीटर पूरा भर दिया। आदिवासियों और अन्यों को यह नहीं मालूम था कि वो 5 एकड़ ज़मीन के हक़दार हैं। दिसम्बर 2012 सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें ज़मीन का हक़दार माना। विस्थापितों ने पता चलने पर कर्जा लेकर सरकार से मिला नकद दो लाख का मुआवजा वापिस दिया। उदाहरण के लिये बूड़े ताराबाई राजाराम सीकदार परिवार ने साहूकार से 6 लाख कर्जा लेकर मुआवजा वापिस दिया। पिछले 2.5 सालों में ब्याज ही 4 लाख हो गया। किन्तु ना सरकार ने ज़मीन दी ना ज़मीन के लिये पैसा।

अब लोगों के सामने बाँध के पानी में ही गलने के अलावा और क्या रास्ता बचता है? क्या सभी जन्तर-मन्तर पर आकर पेड़ से लटक जाएँ? क्या आदिवासी किसानों के लिये विकास में यही प्रसाद है। नेपाल में भूकम्प प्रभावितों के लिये त्वरित निणर्य का दावा करने वाली सरकार क्या इस ओर ध्यान देगी?

Friday, 1 May 2015

5 May-2015 भूमि अधिकार संघर्ष रैली

Tuesday, 7 April 2015

Recipe of Environmental Laws



Recipe of Environmental Laws

Last year, just after the change in central government, under the blanket of Ministry of Environment, Forest Climate Change (MOEFCC - the new name of MOEF makes no difefrence but only speed up in giving Environment and Forest clearances) a “HIGH LEVEL COMMITTEE” under the chairmanship of former Cabinet Secretary T.S.R Subramanian was constituted. Other members of the HCL were Former Secretary to Government of India Vishwanath Anand, former Judge of the High Court, Justice A.K Srivastava and former Additional Solicitor General of India K.N Bhat.
HCL review 5 environment laws as Environment (Protection) Act, 1986, the Forest (Conservation) Act, 1980, the Wildlife (Protection) Act, 1972, the Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974, and the Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981. The Indian Forest Act, 1927 was added subsequently to this list.
Amazingly from the day of its constituted 29th August 2014, only in 83 days HCL on 20th November 2014 High Level Committee submitted its report to the government.
Advocate Ritwick Dutta , Shri Manoj Mishra and Shri Himanshu Thakkar made a very good critique of this so called HCL. On 26th March, 2015 “Legal Initiative for Forest and Environment” was released the critique ‘High Level Committee: A recipe for silencing people’s voice and climate disaster’
Leading environmental Lawyers like Sanjay Parikh, Raj Panjvani, Rahul Chowdhry  with some environment activists and others were present in the meeting.
Ritwick Dutta: Environmental Lawyer, Legal Initiative for Forest and Environment, Prof William Lockhart: Emeritus Professor of Law, University of Utah, Salt Lake City, USA and Manoj Misra: Yamuna Jiye Abhiyan, New Delhi gave brife presentation on the report and others were also took part in the discussion. Every one totally reject this SPEEDY WORK of MOEFCC.
If the government follow the report then implications will be very bad on environment as well as people of the country. Now People's Movements have to take the issue as they are agitating on land Bill 2015.
Vimalbhai

Advocate Ritwick Dutta presented a pin-point critique of the report which are give below.
Advocate Ritwick Dutta presentation:-
The report liberally quotes from the Isha Upanishad and highlights the need for ‘transparency’, ‘accountability’, ‘inter generational equity’ and ‘sustainable development’ one finds that there is little connection between the stated philosophy and the recommendations

Consultation?
The HLC report claims that it had a total of 35 to 40 meetings. This itself reveals that the HLC itself is not aware of the actual number of meetings conducted and reflects a casual approach.

RTI Response shows 30 meetings took place Only 7 meeting with 'civil society, non-governmental organizations (NGO) in Delhi, Bangalore, Mangalore, Bhubaneswar and Patna. No meetings in key states such as Maharashtra, Rajasthan, Chhattisgarh, West Bengal skipped the environmentally sensitive north-eastern region No records of any meeting in any form

Introduction of high-sounding concepts such as ‘utmost good faith’, ‘tree land trading’, ‘unique identification’ does not hide away from the fact that the only thrust of the report is to dilute the existing environmental laws.

Beyond its Terms of Reference
the HLC failed to follow its Terms of Reference and in its over enthusiasm to speedily submit its report has gone over board and recommended amendments in the Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006 and the National Green Tribunal Act, 2010 – which were not even included in its Terms of Reference

One of the specific Terms of Reference for the HLC was to to examine and take into account various Court orders and judicial pronouncements with regard to these Acts. The HLC Report does not contain any such analysis. ..only lists a few environmental cases decided by the Supreme Court more than 20 years ago.

Where are the people?
As you continue reading through the lucid prose, you get that strange feeling of missing the elephant in the room. Where are the people? Where are the millions of people who live in forests or mountains or river valleys and islands or far-flung villages, who are most affected by shoddy environmental governance?

Missing impacts
There is hardly any mention of impacts of destructive projects on forests, communities and wildlife. The lines are clearly drawn at compensatory afforestation, raised NPV, monitised afforestation, web-based monitoring, priced databases, etc.

Speedy Clearances
In the 113 page report, the word “speed” in context of speedy clearances gets repeated thirteen times. As we move from initial sagacious pages, the emphasis swiftly shifts from concern for environment to “time consuming clearance processes”.

HLC is Climate blind
Except the mention in the name of the commissioning ministry (Ministry of Environment, Forests & Climate Change), the phrase appears only twice in the whole report – once in the preamble chapter [where it says: “We need to take heed of the very recent intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) call from Copenhagen that the earth is flirting with danger – the alarm flag has been hoisted”] (para 1.3), and once in the main report (para 7.10.4 (e)), which has nothing to do with climate change.

Utmost good faith
No physical / field verification involving ground truthing and enumeration needs to be done till stage I approval under Forest (Conservation) Act, 1980 is obtained. Site visits by the Expert Appraisal Committee and the Forest Advisory Committees puts ‘unnecessary stress’ on both user agency and official at field level

The High Level Committee is truly ‘high level’ - it has displayed a high level of ignorance about environmental laws, environmental issues and a high level of disdain for local democratic institutions, people’s voices and the very values of the environment it says are “sacrosanct.”

Thursday, 12 June 2014

बांध से सुरक्षा-- विमल भाई

बांध से सुरक्षा

Author: 
विमल भाई
18 छात्र और 6 छात्राओं की इस हत्या नें तथाकथित रन आफ द रीवर यानि सुरंग परियोजनाओं से लोगों की सुरक्षा पर फिर से प्रश्न खड़ा कर दिया है। यह कोई पहली बार हुआ हो ऐसा नहीं है। हिमाचल में पहले भी ऐसे हादसे हु्ए हैं। देश में भी ऐसे कई उदाहरण है। मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तराखंड, सिक्किम के अलावा और भी कई जगहों पर ये हो चुका है। बांध कंपनियां बांध से नीचे के लोगों की सुरक्षा को कभी गंभीरता से नहीं लेती हैं। हिमाचल की व्यास नदी पर बने लारजी बांध से अचानक पानी छोड़े जाने के कारण घूमने आए इंजीनियरिंग पढ़ने वाले 24 युवा की जीवन लीला समाप्त हो गई। खबरों के अनुसार हिमाचल में मंडी शहर से 40 किलोमीटर दूर दवाड़ा थलौट गांव के पास ब्यास में कम पानी होने के कारण ये युवा नदी में फोटो खींचने चले गए।

लारजी पनबिजली परियोजना की सुरंग साढ़े चार किलोमीटर की है। बिजली उत्पादन के लिए नदी का लगभग सारा पानी सुरंग में डाल दिया जाता है। जिस कारण नदी लगभग सूखी रहती है। जो हमेशा किनारे पर रहते हैं पानी के घटने-बढ़ने से वे भी मात्र थोड़ी-बहुत समझ ही रखते हैं। बाहर के लोगों को तो इस बारे में कुछ समझ नहीं होती।

बांध कंपनियां भी इस बारे में बहुत लापरवाह होती हैैं। शिमला से लारजी पनबिजली परियोजना के दफ्तर में फोन आया कि बिजली उत्पादन बंद कर दिया जाए। इसलिए परियोजना कर्मचारियों ने बांध के दरवाजे खोल दिए और हजारों क्यूसेक पानी अचानक से नदी में आ गया।

हैदराबाद के वी एन आर विज्ञनना ज्योति इंजीनीयरिंग व टेक्नोलॉजी कॉलेज से आए ये छात्र अचानक पानी आने पर किनारे पर खड़े स्थानीय लोगों के द्वारा सीटी आदि बजाने के संकेत को नहीं समझ पाए। पर्यटन के लिए आए ये छात्र नहीं जानते थे कि बांध कंपनियां बिजली उत्पादन के अलावा किसी भी चीज के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझती। 18 छात्र और 6 छात्राओं की इस हत्या नें तथाकथित रन आफ द रीवर यानि सुरंग परियोजनाओं से लोगों की सुरक्षा पर फिर से प्रश्न खड़ा कर दिया है। यह कोई पहली बार हुआ हो ऐसा नहीं है। हिमाचल में पहले भी ऐसे हादसे हु्ए हैं।

देश में भी ऐसे कई उदाहरण है। मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तराखंड, सिक्किम के अलावा और भी कई जगहों पर ये हो चुका है। बांध कंपनियां बांध से नीचे के लोगों की सुरक्षा को कभी गंभीरता से नहीं लेती हैं।

उत्तराखंड में भागीरथी गंगा में उत्तरकाशी शहर के निकट मनेरी भाली प्रथम चरण पनबिजली परियोजना से अचानक पानी छोड़े जाने के कारण 2006 में 3 लोग बह गए। अगले ही साल फिर 10 नवंबर 2007 में उत्तराखंड जलविद्युत निगम के ही मनेरी भाली द्वितीय चरण के दरवाजों को खोलने बंद करने की टेस्टिंग में दो युवक बह गए।

किसी तरह एक युवा बचा लिया गया। दूसरा युवा बह गया। इन चारों की मृत्यु नहीं वरन बांध प्रशासन द्वारा हत्या है। जिसका कई सालों तक कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया। ना ही बांध अधिकारियों पर प्रशासनिक कार्यवाही भी नहीं हुई।

माटू जनसंगठन व उत्तरकाशी के स्थानीय संगठनों ने नवंबर 2007 में मणिकर्णिका घाट पर लंबा धरना व 5 दिन का उपवास रखने के साथ मांग की थी कि मनेरी-भाली जलविद्युत परियोजना चरण दो के उद्घाटन से पूर्व कम से कम जलाशय के दोनों तरफ बन रही सुरक्षा दीवार की निगरानी समिति में प्रभावितों व स्वतंत्र विशेषज्ञों को रखा जाए। डूब का निशान स्पष्ट रुप से लगाया जाए। आपदा प्रंबधन योजना और पानी छोड़ने की चेतावनी प्रक्रिया सार्वजनिक हो।

सुरंग निर्माण से जो प्राकृतिक जलस्रोत सूखे हैं उनका व अन्य पर्यावरण क्षति का आकलन हो। आवश्यक पुनर्वास व अन्य पर्यावरणीय सुरक्षात्मक उपाय हो। बांध के द्वारा बिना चेतावनी के छोड़े गए पानी से हुई चारों हत्याओं की न्यायिक जांच हो व प्रभावितों को मुआवजा दिया जाए। किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ।

बांध से सुरक्षाबांध के अधीक्षण अभियंता व जिलाधीश द्वारा पर्चे जरुर बांटे गए जिसके अनुसार ‘‘बैराज के संचालन एवं इस परियोजना के ऊपर मनेरी-भाली परियोजना, प्रथम चरण स्थित होने के कारण जोशियाड़ा बैराज से कभी भी बिना पूर्व सूचना के नदी में पानी छोड़ा जा सकता है।’’ यानि मनेरी भाली बांधों से कभी भी बिना पूर्व सूचना के पानी छोड़ने से कोई बहता है तो सरकार ने अपने बचाव का इंतजाम कर लिया। सुरंग परियोजनाओं के किनारे रहने वालों के लिए ये बहुत ही खतरनाक स्थिति है। नदी अब लोगों की नहीं रही।

जून आपदा में उत्तराखंड में जेपी कंपनी के विष्णुप्रयाग बांध के सभी दरवाजे समय पर ना खुलने के कारण नीचे के लामबगड़, विनायक चट्टी, पाण्डुकेश्वर, गोविन्दघाट, पिनोला घाट आदि गांवों में मकानों, खेती, वन और गोविंद घाट के पुल के बह गए।

जी.वी.के. कम्पनी के श्रीनगर बांध द्वारा आनन-फानन में नदी तट पर रहने वालों को बिना किसी चेतावनी के दिए बांध के गेटों को 16 जून को लगभग 5 बजे पूरा खोल दिया गया जिससे जलाशय का पानी प्रबल वेग से नीचे की ओर बहा। जिसके कारण जी.वी.के. कम्पनी द्वारा नदी के तीन तटों पर डम्प की गई मक बही। इससे नदी की मारक क्षमता विनाशकारी बन गई। जिससे श्रीनगर शहर की सरकारी/अर्द्धसरकारी/व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक सम्पत्तियां बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हुई। किसी तरह से जान तो बची पर आज तक भी लोगों को मुआवज़ा नहीं मिल पाया है। किसी भी बांध कंपनी की जांच नहीं हुई। कोई दंड नहीं दिया गया। देश के विकास के लिए सब जायज माना जाता है।

पर्यावरण व वन मंत्रालय या जल संसाधन मंत्रालय अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं मानते। यदि मानते तो कड़े कदम उठाते, मापदंड बनाते व उनके पालन के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करते।

लारजी बांध कंपनी द्वारा की गई इस आपराधिक लापरवाही के लिए दोषी अधिकारियों को कड़ा दंड मिलना चाहिए। पूरे हिमालय में एक हजार के करीब ऐसे ही बांध प्रस्तावित हैं, बन रहे हैं और बन चुके हैं। सरकारों को सबक लेना चाहिए और बांध कपंनियों पर लगाम कसनी चाहिए।

Monday, 3 March 2014

3- टिहरी बांध : झील में खेल

Home

टिहरी बांध : झील में खेल, भाग-3

http://hindi.indiawaterportal.org/node/46919 

Author: 
विमल भाई
टी.एच.डी.सी. ने सरकार को बांध से 5 किलोमीटर के हिस्से पर कोई भी गतिविधि चलाने पर पाबंदी लगाई है। अभी लंबी लड़ाई के बाद भी सुरक्षा कारणों से बांध से उस पार जाने के लिए के रास्ता के इजाज़त स्थानीय लोगों को नहीं है। जबकि जो रास्ता दिया गया है उसकी हालत बहुत ही खराब है। सरकारी या अन्य ‘बड़े‘ लोगों को बांध पर रास्ता दिया जाता है। यह असमंजस की स्थिति है कि टिहरी बांध की झील पर किसका अधिकार है? वास्तव में तो बांध विस्थापितों का ही झील पर पहला व अंतिम अधिकार बनता है। टिहरी बांध के कारण भागीरथी-भिलंगना के निवासियों के पास से बहती नदी और उसके लाभ चले गए। आज स्थानीय लोग पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं आशंका है कि वैसे ही अब झील भी पर्यटन के नाम पर ना छिन जाए।

टिहरी बांध की झील भरने के बाद सर्वे आफ इंडिया ने डूब की पूर्वलाईन गलत होने के कारण जिन्हें विस्थापित माना उनका पुनर्वास भी अभी तक नहीं हो पाया है। झील के किनारे के लगभग 80 गाँवों में भूस्खलन के कारण नया विस्थापन शुरू हुआ है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति तो झील के पार की है, जिसे कट आॅफ एरिया कहा जा रहा है। झील में पर्यटन की संभावनाओं व योजनाओं पर करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं दूसरी तरफ झील के किनारे के गाँवों में आ रही दरारों, भूस्खलन, धसान आदि का पूरा आकलन करने में बांध कंपनी व सरकारों की कोई इच्छा नहीं है।

टिहरी बांध की झील पर किसका अधिकार है? यह विवाद का विषय नहीं वरन् समझ का विषय है। भागीरथी घाटी के विकास व संरक्षण के लिए टिहरी बांध परियोजना की पर्यावरण स्वीकृति 19 जुलाई 1990 में शर्त संख्या 3.7 में केन्द्रीय ऊर्जा मंत्रालय को 31.3.1991 तक ‘भागीरथी घाटी प्रबंधन प्राधिकरण’ बनाने के निर्देश दिए गए थे। जिसे वास्तव में लगभग 22 साल बाद 2003 में फिर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया तब 2005 में इसे वास्तविक रूप में बनाया गया। इस प्राधिकरण ने भी टिहरी झील में पर्यटन के लिए 15 सितंबर 2006 को नई टिहरी में बैठक का आयोजन किया था। जिसमें एक विस्तृत योजना बनी थी। जिसमें तत्कालीन व पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने खास रुचि ली थी। राज्य सरकार ने एक ‘झील प्राघिकरण’ भी बनाया है। जिसकी अब तक बैठक तक नहीं हो पाई है।

टिहरी जिला पंचायत ने 13 अक्तूबर 2011 को टिहरी व कोटेश्वर बांध झीलों के महापर्यटन के लिए लाइसेंस प्रक्रिया पर आमंत्रित सुझावों पर बैठक करके झील पर अपना अधिकार जमाने की कोशिश की। इसके लिए अखबार में जो नोटिस दिया गया था उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वहां बड़े पूंजीगत पर्यटन को ध्यान में रखकर ही काम हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री के सुपुत्र श्री साकेत बहुगुणा बड़ी-बड़ी बाहरी कंपनियां को बुलाने के पक्ष में निर्देश दे रहे थे। अब स्थिति बदली है नए मुख्यमंत्री जी क्या करेंगे? 300 के करीब आवेदन जिले में दिए गए हैं। जिसमें बाहर के लोग भी हैं। अपुष्ट जानकारी के आधार पर दोनो बांधों के निर्माण में लगे ठेकेदारों ने पहले की झील किनारे की काफी ज़मीन पर कब्जा कर रखा है। विस्थापितों की मांग के बावजूद उन्हें झील किनारे की जमीन का टुकड़ा नहीं मिला।

टी.एच.डी.सी. ने सरकार को बांध से 5 किलोमीटर के हिस्से पर कोई भी गतिविधि चलाने पर पाबंदी लगाई है। अभी लंबी लड़ाई के बाद भी सुरक्षा कारणों से बांध से उस पार जाने के लिए के रास्ता के इजाज़त स्थानीय लोगों को नहीं है। जबकि जो रास्ता दिया गया है उसकी हालत बहुत ही खराब है। सरकारी या अन्य ‘बड़े‘ लोगों को बांध पर रास्ता दिया जाता है। यह असमंजस की स्थिति है कि टिहरी बांध की झील पर किसका अधिकार है? वास्तव में तो बांध विस्थापितों का ही झील पर पहला व अंतिम अधिकार बनता है। मात्र कुछ रुपए देकर यह अधिकार नहीं छीना ला सकता है।

सही तो यह है कि टिहरी बांध और कोटेश्वर बांध की झीलों संबंधी सभी रोजगारों पर जैसे मछली पकड़ना, नौकायन, मोटरबोट संचालन, रोपवे संचालन, राफ्टिंग, जलाशय में जलक्रीड़ा संबंधी सभी कामों में टिहरी बांध विस्थापितों को हक मिले। प्रभावित गाँवों के लोगोंं में खासकर धनार लोग, पुश्तैनी नाविक और मछली का काम करते रहे हैं। उनकी बेरोजगारी दूर करने के लिए उन्हें मछली व बोट का काम दिया जा सकता है।

कुछ युवकों ने हिमाचल में जलक्रीड़ा संबंधी प्रशिक्षण भी लिया है वे जलक्रीड़ा के सभी उद्यमों में सफल हैं और अन्यों को प्रशिक्षण देने की क्षमता भी रखते हैं। उन्हें चूंकि स्थानीय परिस्थितियों के बारे में सब पता है इसलिए वे इन सब कामों के उपयुक्त व नीति सम्मत भी रहेंगे। लोगों को पर्यटन आदि में भी यदि रोज़गार के अवसर दिए जाए तो यह उनके सामाजिक व आर्थिक स्तर को ना केवल ऊंचा उठाएगा साथ ही पर्यटकों को भी स्थानीय समझ के साथ उच्चस्तरीय सुविधा मिलेगी।

बांध प्रभावितों/स्थानीयों को नौकायन, जलक्रीड़ा, राफ्टिंग, मत्स्य पालन में मात्र सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं वरन् अधिकार मिलना चाहिए। बांध प्रभावितों/स्थानीयों को झील संबंधी किसी भी तरह के व्यवसाय की लाईसेंस फीस न्यूनतम होनी चाहिए। 75 प्रतिशत स्थानीय श्रमिक रखने की शर्त ही नहीं वरन् सभी कामों में 75 प्रतिशत आरक्षण स्थानीय लोगों को हो। यहां स्थानीय से तात्पर्य झील के किनारे के गांववासी व विस्थापित से है, चाहे वो कहीं भी बसा हो। इससे सही मायने में पलायन रुकेगा और जो मुश्किलें विस्थापितों ने झेली है और अभी भी झेल रहे हैं, इससे उनका कुछ सहयोग हो पाएगा और जीवनस्तर भी कुछ उठ पाएगा। जिला पंचायत को ‘होम स्टे’ जैसी पद्धति, जिसमें पर्यटक घरों में रुकते हैं, को लाना चाहिए। एक सहकारी समिति के तहत यह व्यवस्था पूरे गांव में हो सकती है।

इस तरह की सहकारी समिति को लाइसेंस देकर जिला पंचायत स्थाई पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ स्थानीय विकास में भारी योगदान दे सकता है। देश में यह सफल रूप में कई स्थानों पर चलाई जा रही है। कुंमाऊ में, पिथौरागढ़ के मुन्सयारी गांव में ‘होम स्टे’ पद्धति, का लाभ ग्रामीण वर्षाें से उठा रहे हैं। पर्यटकों को भी उचित दर पर आवास और भोजन मिल जाता है। वे स्थानीय संस्कृति को भी समझ पाते हैं।

बड़ी पर्यटन परियोजना में महंगे लाइसेंस प्रभावशाली लोगोंं, व्यापारियों, बड़े ठेकेदारों या राजनैतिक हितों के पक्ष होंगे। वास्तव में ये छोटे स्तर के उद्यमियों के पक्ष में होनी चाहिए। जिससे स्थानीय लोगों का जिनमें खासकर महिलाएं हैं, जीवन स्तर सुधरेगा। इसके लिए आवश्यक है कि पर्यटन की छोटी परियोजनाएं हों जिन्हें स्थानीय लोग/ विस्थापित स्वयं या सहकारी समिति के माध्यम से चला सकें।

जहां ग्रामीणों को मत्स्य व्यवसाय, नौकायन, मोटरबोट संचालन, रोपवे संचालन, राफ्टिंग, जलाशय में जलक्रीड़ा संबंधी कामों की जानकारी ना हो वहां जिला पंचायत को स्थानीय स्तर पर उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए। प्रशिक्षण के लिए टीएचडीसी से सहयोग की मांग करनी चाहिए। टीएचडीसी ‘‘व्यवसायिक सामाजिक दायित्व’’ के अंतर्गत स्वंय इसे कर सकती है। आखिर एकमुश्त आधा-अधूरा पुनर्वास देकर, टीएचडीसी प्रतिदिन करोड़ों रुपए कमा रही है। जिसमें से राज्य सरकार भी 12 प्रतिशत हिस्सा लेती है। इसलिए प्रशिक्षण की उचित व्यवस्था दोनों का ही दायित्व है।

महापर्यटन में रोजगार का नया भ्रम दिखाकर लोगों को छलने से बेहतर होगा की झीलों में पर्यटन पर एक खुली बैठक बुलाई जाए। किसी भी तरह से पर्यटन, पर्यावरण व स्थानीय संस्कृति की रक्षा व उसके साथ सामंजस्य के साथ होना चाहिए। नए मुख्यमंत्री जी को इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए।

2- टिहरी बांध : उजड़े पर गिनती में नहींं 1-3-2014

Home

टिहरी बांध : उजड़े पर गिनती में नहींं, भाग-2

http://hindi.indiawaterportal.org/node/46913 

Author: 
विमल भाई
2005 से केन्द्रीय जल आयोग की कोई रिपोर्ट नहीं आई जो बताती कि टिहरी बांध झील की जल गुणवत्ता क्या है? हर बरसात में मृत जानवर, लावारिस लाशें, कचरा आता है इसे हटाने के लिए कोई योजना नहीं है। 7 वर्षों में कोई सफाई नहीं हुई है। किनारे रहने वालों और नई टिहरी जहां झील से ही पीने का पानी की आपूर्ति होती है वहां पर पाचन, गैस व यूरिक एसिड की शिकायतें बढ़ी हैं। इन क्षेत्रों मे 80 प्रतिशत जलापूर्ति हैंडपम्प से होती है।
टिहरी बांध से विस्थापितों की दुर्दशा तो है ही पर जरा टिहरी बांध की झील के पास की स्थिति की बानगी भी देख लें। भिलगंना नदी में जहां टिहरी की झील 25 किलोमीटर तक अंदर गई है। वहां नंदगांव में 865 मी. के पास रहने वाले 20 परिवारों की खेती झील में समा गई है, घरों में दरारें आई हैं। लोग धरने करते जा रहे हैं। सरकार सुनती नहीं।

झील के किनारे के लगभग 80 के करीब गाँवों की जमीनें धसक-सरक रही हैं। हर बरसात में झील का पानी बढ़ता है और गर्मी में जब पानी नीचे उतरता है तो यह धसकना-सरकना शुरू हो जाता है। मदन नेगी सहित कितने ही गाँवों के मकान खत्म हो गए या होने के कगार पर है। राज्य व केन्द्र सरकारें झील के किनारे रहने वालों के लिए अलग नीति की बात करती रही है। सर्वोच्च अदालत के दबाव पर ही एक नई नीति बनाई गई है।

झील के कारण सामाजिक ताना-बाना टूटा है। सुख-दुख में लोग साथ नहीं हो पा रहे हैं। 9 वर्षों में भागीरथीगंगा में टिहरीबांध झील प्रभावित क्षेत्र में महज एक रिश्ता हुआ।

बात थोड़ी पुरानी है पर यह घटित होता ही रहता है। 14 दिसंबर, 2012 को एक बारात, जिसमें लगभग 150 लोग थे, नई टिहरी के बौराड़ी से रौकोट वापिस जानी थी। किंतु झील पार करने के लिए बोट उपलब्ध नहीं थी जबकि पहले बात की गई थी। शाम 4 बजे से रात 11 बजे तक ठंड में बैठना पड़ा। उच्चाधिकारियों से बहुत संपर्क करने के बाद रात को 11 बजे लोग झील पार कर पाए। 5 बच्चों की तबियत भी खराब हुई।

भागीरथी व भिलंगना में 10 पुल डूबे हैं। भागीरथी में छामबाजार के झूला पुल व भिलंगना में घोंटीबाजार के झूला पुल से 30-30 गांव का सम्पर्क था। भल्डियाणागांव वाले पुल से बस जाती थी अब नए बने पुल से मात्र जीप जा सकती है किंतु उसके रास्ते नहीं बने हैं इसलिए यातायात नहीं हो पाता हैै। पीपलडाली के पुल से भी मात्र जीप जाती है। अन्य 3 मोटरपुल अभी योजना स्तर पर है।

बांध की झील में पर्यटन की योजनाओं के अंबार लग गए हैं, पर्यटन मेले-कार्यक्रम भी हो गए पर कोई योजना सिरे अभी तक नहीं पहुंची है। दूसरी तरफ झील तक पहुंचने के संपर्क मार्ग है ही नहीं। ढलानों के विकट रास्तों के कारण मुश्किल से लोग बोट तक पहुंचते हैं। उदाहरण के लिए ओणम से 3 किमी., मल्ला से 2 किमी., बैलगांव से 3 किमी. कई गांवोें से 1-2 किमी. झील दूर है। कुमराडा, बलडोगी, खामली, मजीर, मडगांव आदि में रास्ते नहीं हैं। झील का जलस्तर घटता है तो समस्या और भी विकट हो जाती है। फिसलने का खतरा हमेशा बना रहता है। बीसीयों लोग व 70 से ज्यादा पशु मारे गए हैं।

2005 से केन्द्रीय जल आयोग की कोई रिपोर्ट नहीं आई जो बताती कि टिहरी बांध झील की जल गुणवत्ता क्या है? हर बरसात में मृत जानवर, लावारिस लाशें, कचरा आता है इसे हटाने के लिए कोई योजना नहीं है। 7 वर्षों में कोई सफाई नहीं हुई है। किनारे रहने वालों और नई टिहरी जहां झील से ही पीने का पानी की आपूर्ति होती है वहां पर पाचन, गैस व यूरिक एसिड की शिकायतें बढ़ी हैं। इन क्षेत्रों मे 80 प्रतिशत जलापूर्ति हैंडपम्प से होती है।

नई टिहरी में अभी लोग टिन शेडो में पड़े हैं। विस्थापितों के प्लाटों पर कब्जे हैं। नई टिहरी बार एशोशिएसन के अनुसार टिहरी देहरादून को मिलाकर 100 से ज्यादा फ्लैटों पर बांध कंपनी टीएचडीसी का कब्जा है। पुरानी सुविधाओं के स्थान पर विस्थापितों को नए शहर में सब वैसा ही मिलना चाहिए था उसके लिए विस्थापितों का नागरिक मंच कितने ही धरने-प्रर्दशन-भूख हड़ताले कर चुका। पर समस्याएं जस की तस। समाधान सब सरकारें करने को कहती है पर करता कोई नहीं।

प्रश्न यह है कि जब टिहरी बांध में लगे हर कण के बारे में योजना थी, हर कर्मचारी के भत्ते व परिवार के रहने तक की योजना व पैसे का इंतजाम था है और समय-समय पर उसके लिए व्यवस्थित रूप से सोचा और क्रियान्वित भी किया जाता है तो पुनर्वास की समस्याओं का अध्ययन क्यों नहीं किया गया। उसके लिए पूरे पैसे का इंतजाम क्यों नहीं किया गया। बांध विरोधी आंदोलन ने सरकार को योजना बनाने से नहीं रोका था। आंदोलन के बावजूद बांध संबंधी योजनाएं तो बनती ही रहीं और अब सरकारें पैसे का रोना रोकर काम नहीं करना चाहती हैं। पर यदि समाधान हो जाएगा तो मगरमच्छी आंसू बहाकर वोट कैसे बटोरे जाएंगे। टिहरी बांध मात्र एक उदाहरण है राज्य व देश के सभी चालू बांधों की स्थिति ऐसी ही है।

उत्तराखंड में बांध बनाने के लिए हल्ला मचाने वाला कोई इन बातों की चिंता नहीं करता ना बोलता है। नए बांधों के लिए देहरादून में कई धरने-जल से आयोजित किए गए। विश्वबैंक पोषित करोड़ों की सरकारी परियोजनाओं को चलाने वाले एनजीओ के मालिक जी ने राज्य के रूके बांध चालू ना होने की स्थिति में अपना पद्मविभूषण वापिस करने की घोषणा भी कई बार की। यूं वापिस नहीं किया।

जो लोग सिर्फ बांध बनाओं की माला जपते रहते हैं वे इस ओर ध्यान क्यों नहीं दे पाते की चालू बांधों की स्थिति क्या है। विस्थापितों का पुनर्वास क्यों नहीं हो पाया? पर्यावरण का कितना नुकसान हुआ, भरपाई हुई या नहीं? जलसंग्रहण क्षेत्र का उपचार हुआ या नहीं? क्या बांध उतनी बिजली भी पैदा कर रहे हैं जितने का दावा था? किसी बांध की कोई निगरानी नहीं। विकास का जो दावा किया जाता है क्या वो पूरा भी हुआ है।

बांध से विकास का लाभ किसको गया है? स्थायी रोजगार कितना मिला और आजीविका के स्थायी साधन कितने खत्म हुए? ऐसी की लंबी सूची है। जिस तरफ बांध समर्थकों का कोई ध्यान नहीं है चूंकि इन सबके स्वार्थ उन बांध कंपनियों और विश्वबैंक, एशियाई विकास बैंक जैसी बांध के लिए धन देने वाली संस्थाओं के साथ जुड़े है। जिनको ना विस्थापितों, ना पर्यावरण और ना ही इस बात मतलब है कि बस ऊर्जा प्रदेश का हल्ला मचाते रहो। नए बांधों से पहले पुराने बांधों की स्थिति को भी तो जान लिया जाए। उनके लिए कुछ कर दीजिए साहब!

Saturday, 1 March 2014

1- टिहरी बांध : अनदेखी कब तक, 1-3-2014

Home

टिहरी बांध : अनदेखी कब तक, भाग-1

 Author: 

विमल भाई
सर्वोच्च न्यायालय में टिहरी बांध का 22 वर्ष से एन. डी. जुयाल और शेखर सिंह बनाम भारत सरकार वाला केस सुना जा रहा था। सरकारी वकील दलील देते हैं कि टिहरी बांध से बिजली पैदा हो रही है, कोटेश्वर बांध भी बन गया है। पर विस्थापितों की समस्याएं समझी नहीं गई। इन सबके चलते भागीरथीगंगा समाप्ति की कगार पर पंहुच गई। टिहरी बांध की समस्याएं नासूर की भांति लगातार बहती ही रहती है। विस्थापित लोग और पर्यावरण इस दर्द को झेलते हैं। माटू जनसंगठन ने फिर उत्तराखंड सरकार को टिहरी बांध विस्थापितों के भूमिधर अधिकार और साथ ही बरसों पुराने विस्थापित स्थलों पथरी भाग 1,2,3 व 4 में शिक्षा, स्वाथ्यय, यातायात, सिंचाई व पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधायें तुरंत पूरी करने की बाबत याद दिलाया है।

याद रहे कि टिहरी बांध की गौरव गाथा गा-गाकर बांध कंपनी टिहरी जलविद्युत निगम जो टीएचडीसी के नाम से प्रचारित है उसे और भी कई नए बांधों के ठेके मिल गए हैं। किंतु पथरी भाग 1, 2, 3 व 4 हरिद्वार के ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले टिहरी बांध विस्थापितों के मामले 30 वर्षाें से लंबित है। यहां लगभग 40 गाँवों के लोगों को पुनर्वासित किया गया है। यहां 70 प्रतिशत विस्थापितों को भूमिधर अधिकार भी नहीं मिल पाया है।

बिजली, पानी, सिंचाई, यातायात, स्वास्थ्य, बैंक, डाकघर, राशन की दुकान, पचांयत घर, मंदिर, पितृकुट्टी, सड़क, गुल, नालियां आदि और जंगली जानवरों से सुरक्षा हेतु दिवार व तार बाढ़ तक भी व्यवस्थित नहीं है। बीसियों वर्षों से यह सुविधाएं लोगों को उपलब्ध नहीं हो पाई है। यदि कहीं पर किसी तरह से कुछ व्यवस्था बनी भी है तो स्थिति खराब है। स्कूल भी कुछ ही वर्षों पहले बना है वो भी मात्र 10वीं तक है।

प्राथमिक स्कूलों की इमारतें बनी हैं पर अध्यापक नहीं है। स्वास्थ्य सेवाएं तो हैं ही नहीं। रास्ते सही नहीं हैं तो निकासी नालियां भी नहीं है। यातायात की सुविधाएं भी नहीं हैं। लोगों को मात्र जंगल में छोड़ दिया गया है। अपने बूते पर विस्थापितों ने मकान बनाए हैं।

अभी उत्तराखंड में नए मुख्यमंत्री आए हैं। उनके पूर्व मुख्यमंत्री श्री विजय बहुगुणा ने हर चुनाव के समय टिहरी का मुद्दा उठाया था उन्होनें कहा था कि वे विस्थापितों के लिए सर्वोच्च अदालत में जाएंगे। यह भी कहा की राज्य के पास मुफ्त मिलने वाली बिजली के करोड़ो रुपए हैं उसे क्यों नहीं विस्थापितों के लिए खर्च किया जाता? यह भी तथ्य है की वे कभी अदालत नहीं आए।

किंतु जब वे मुख्यमंत्री थे तो भी उन्होंने विस्थापितों के लिए नहीं किया। अब नए मुख्यमंत्री हरीश रावत जी हैं उनसे ये आशा चूंकि वे जहां से चुनकर आए हैं वहीं टिहरी बांध के विस्थापितों को तथाकथित तरीके से बसाया गया है। यह पत्र दिया गया। चूंकि केन्द्र व राज्य में उन्हीं की पार्टी की सरकार है। वैसे इन कार्यों के लिए टिहरी बांध परियोजना से, जिसमें कोटेश्वर बांध भी आता है, मिलने वाली 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली के पैसे का उपयोग किया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय में टिहरी बांध का 22 वर्ष से एन. डी. जुयाल और शेखर सिंह बनाम भारत सरकार वाला केस सुना जा रहा था। सरकारी वकील दलील देते हैं कि टिहरी बांध से बिजली पैदा हो रही है, कोटेश्वर बांध भी बन गया है। पर विस्थापितों की समस्याएं समझी नहीं गई अदालत में भी उलटे-सीधे शपथ पत्र दाखिल किए जाते हैं। इन सबके चलते भागीरथीगंगा समाप्ति की कगार पर पंहुच गई।

टिहरी बांध की समस्याएं नासूर की भांति लगातार बहती ही रहती है। विस्थापित लोग और पर्यावरण इस दर्द को झेलते हैं। जितना दर्द मवाद निकलेगा उतना ही राजनैतिक दलों को मुद्दा मिलेगा, कंपनी के वकीलों की आमदनी बढ़ती है, पुर्नवास कार्यालय को काम मिल जाता है। समस्या होगी तो हल्ला मचेगा फिर पैसा आएगा।

टिहरी बांध केस के कारण अरबों रुपए बांध कंपनी को पुनर्वास के लिए देने पड़े। 29 अक्तूबर 2005 में बांध की झील में पानी भरना चालू हो गया था। जुलाई 2006 में बांध के उद्घाटन के समय तत्कालीन उर्जामंत्री शिंदे जी ने घोषणा की थी कि पुर्नवास पूरा करेंगे, विस्थापितों को मुफ्त बिजली देंगे ऐसे वादे किए गए।

बीजेपी की राज्य सरकार ने ही 2010 में रिर्पोट बनाई की छूट गए पुनर्वास कार्यों के लिए पैसा चाहिए। 3 नवंबर 2011 को उच्चतम न्यायालय ने एक अरब रुपए अपूर्ण पुनर्वास व स्थलों की सुविधाएं पूरी करने के लिए दिए गए। सब खुश अदालत ने न्याय किया और बांध कंपनी ने कर्तव्य निभाया। पुर्नवास के रुके काम पूरे होंगे। कुछ राजनेता खुश की चलो पैसा मिला है। काम पूरा होगा। यक्षप्रश्न यह भी है कि राज्य सरकार बांध से मिली मुफ्त बिजली के पैसे को कहां खर्च कर रही है? विस्थापितों की वास्तविक स्थिति खराब है।

उदाहरण के लिए सुमन नगर शुरूआती यानि 1978 के टिहरी बांध विस्थापितों का पुनर्वास स्थल है हरिद्वार जिले में यही से गंगनहर निकलती है आधा किलोमीटर पर बिना पानी के खेत हैं लोग कहते हैं हमें पानी नहीं है तो हमें मजबूरन जमीन बेचनी ही पड़ेगी। बिजली आती नहीं है हमारे तार में से साथ में फैक्टरी वाला बिजली ले लेता है हमें बिजली भी नहीं, पीने का पानी गंदला है सूखने पर थोड़ा पीला हो जाता है।

गंगनहर से दिल्ली व पश्चिमी उत्तर प्रदेश को 200 क्यूसेक पीने का और सिंचाई को 300 क्यूसेक पीने के लिए अतिरिक्त पानी जाता है राज्य को 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली के 1000 करोड़ के लगभग मिल चुके हैं।

इसी सुमन नगर में प्लाट नं0 366, 421 और 422 20 वर्ष पहले आवंटित हुए थे इन्हें भूमिधर अधिकार नहीं मिला। कारण की वो जमीन कागजों में नदी की जमीन है। विस्थापितों को भूमि आबंटन में कितने घोटाले हुए हैं इसकी जांच भी ज़रूरी है पर कौन करेगा? कोयले की कोठरी में काला ही काला है।

सरकार को मालूम है कि एक पीढ़ी बदलने के बाद लोग इसी तरह रहने के आदि हो जाएंगे और फिर कोई आवाज़ नहीं उठेगी। आखिर अब तक के बांधों से उन्होंने भी सीखा है ।

Wednesday, 26 February 2014

बेडू पाको बारमासा 26-02-2014


Home

बेडू पाको बारमासा

http://hindi.indiawaterportal.org/node/46911

Author: 
विमल भाई
अभी अलकनंदा सहित सब नदियां-गंगाएं शांत सुन्दर बह रही हैं। जैसे सारा गुस्सा उतार चुकी हों। सबक दे चुकी हों और अब अपने किनारे बसे लोगो की आजीविका और सुरक्षित भविष्य के लिए चिंतित दिखाई देती हों। मानो वो कहना चाह रही हों कि कसूर किसी का था और बुराई आ गई नदियों पर किंतु नदियां इसका भी बुरा नहीं मान रही हैं। वो जो कहना चाहती थी उसे उन्होंने अपनी भाषा में जून 2013 में अच्छी तरह से बता दिया है। नदी शांत और सुंदर बह रही है। अभी तेज बारिश में भी नदी बिलकुल शांत अपना हरा रंग लेती बहती हुई अलकनंदा और उसमें मिलती धौलीगंगा, बिरही, गरुड़गंगा, नंदाकिनी, पिंडर, मन्दाकिनी और ना जाने कितनी नदियां मिलकर मानो आमंत्रण ला रही हों नीचे की ओर कि आओ जो होना था वो हो गया और ये फिर होगा अगर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करोगे तो। मगर अभी तो तुम आओ ज़रूर, मेरे अंचल में आओ, मेरा जल जो प्रकृति का दूध है उसका आनंद लो और बोलो जय उत्तराखंड, मुस्कुराता उत्तराखंड।

ऊपर पहाड़ों में बादल छू रहे हैं, बादल नीचे आके भी छूते हैं। हरियाली फैली हुई है। हाँ, कहीं नीचे इलाकों में बरफ पड़ी हुई है तो उस हरियाली पर एक सफ़ेद चादर बिछ जाती है मानो प्रकृति ने एक सफ़ेद चादर चांदनी की तरह ओढ़ी हो, जैसे चाँद अपनी रात की चांदनी छोड़ गया हो। नदी के बीच में उभरते हुए, बचे हुए शैवाल, छोटी-छोटी चट्टानें।

हाँ, अलकनंदा के किनारे पर विष्णुप्रयाग बांध और मंदाकिनी पर बन रहे बांधों का मलबा ज़रूर नज़र आता है जो बताता है कि बाँध कंपनियों ने उत्तराखंड की सुन्दर प्रकृति को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लोग लड़ भी रहे हैं। अलकनंदा नदी पर जेपी कंपनी के विष्णुप्रयाग बाँध के दरवाजे टूटने से नीचे लाम्बगड़, पांडुकेश्वर, गोविंदघाट, विनायक चट्टी आदि में जो तबाही आई। चूंकि उसने 16-17 जून को बाँध के दरवाज़े बंद रखे। लोग इस तबाही के खिलाफ लड़ रहे हैं और पुनः अपने सौंदर्य के साथ खड़े होने की कोशिश भी है उनकी। दोबारा से नई जगह होटल बनाने की सोच है।

सरकार ने ज़्यादा पैसा तो नहीं दिया है, लोगों ने कर्ज भी लिया है, क्योंकि फिर से बसने की बात है। सब खत्म हो चुका था पर लोग दुबारा यहीं बसना चाहते हैं, उनकी फिर कोशिश है वापिस रास्ते बनाएं, जीवन तो जीना है ना। ये जिंदगी को जीने का जज्बा जो है लोगों में उसी ने उत्तराखंड को वापिस पटरी पर लाने की कोशिश की है।

सड़कों पर भरी हुई गाड़ियाँ, सामान से लदे ट्रक और कारों में आते लोग देखकर के जीवन जीने की आस फिर से उमड़ आती है. छः महीने पहले आई बाढ़ ने जो गढ़वाल और कुमाऊं के क्षेत्रों को तबाही दिखाई थी, आज वो बर्बादी सिमटी हुई नज़र आती है। उसको संभालना भी ज़रूरी है और इसके साथ ये भी समझना ज़रूरी है कि उत्तराखंड समाप्त कभी नहीं हुआ था। उत्तराखंड फिर से करवट ले कर खड़ा हो रहा है। आओ इस उत्तराखंड को हम फिर से संवारे, प्रकृति के हरे रंग को सफ़ेद चांदनी में लपेटते हुए फिर से देखे। नई सुबह के संग, नए आगाज़ के संग, आओ फिर उत्तराखंड को पुकारे फिर वही गीत गायें ‘‘बेडू पाको बारमासा, कॅाफल पकी चैता मेरी छेला”

अलकनंदा के कई किनारे टूटे ज़रूर हैं। बांधों के टूटने व उनके द्वारा बनाए गए कई कारणों की वजह से भी बहुत सारे लोग प्रभावित ज़रूर हुए। पर जून 2013 की आपदा की स्थिति याद करने के बाद आज अगर देखो तो मालूम ही नहीं पड़ता कि यहाँ आपदा आई थी। यदि आप उन गाँवों में देखें जिनके बच्चे खत्म हो गए या जिनके घर उजड़ गए।

गाँव के गाँव धंस गए। कितनी महिलाएं विधवा हुई, ना जाने कितने बच्चे कहाँ खो गए, किसी को नहीं मालूम? अब आकड़ें फीके पड़ गए हैं। राहत कार्य अलग-अलग स्तर पर चालू है। कई सरकारी योजनाएं चली हैं। ज़्यादातर बाहर के लोगों ने, गैर सरकारी संगठन ने, विभिन्न संस्थाओं ने कई प्रकार से मदद की है। यह भी सच है की कुछ हिन्दूत्ववादी शक्तियों ने खड़े होके अपने चने मटर भुनाने भी शुरू किए। हिंदुत्व की पैदावार खड़ी करने के लिए यहाँ अनेक साधु-साध्वियों के आश्रम भी खड़े हुए।

मगर इन सब के बावजूद भी, जो बची हुई है वो है उत्तराखंड की रीढ़ की हड्डी यानि यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य और लोगों की ताकत। जो बर्बादी को झेलने के बाद भी फिर से खड़े हो रहे हैं। अभी पिछले कुछ महीनों में शादियां खूब जोर-शोर से हुईं। शादियां अभी भी चालू हैं। पहाड़ी शादियां! मस्त, ढोल-नगाड़ों के बीच नाचते हुए लोग देखकर बड़ा सुकून मिलता है।

ये सब देखकर मन में प्रश्न आ सकता है कि क्या ये वही उत्तराखंड है, जहाँ मात्र 8 महीने पहले भीषण आपदा आई थी? समझ में आ जाना चाहिए कि लोगों ने प्रकृति के साथ जीना सीखा है। अपनी जिंदगी को सिरे पर लाने के लिए, फिर से उजड़े घर बनाने की, चौपट व्यापार को ठीक करने की कोशिशें जारी है। काफी कुछ तो लोग अपने ही बल पर खड़ा कर रहे हैं। सरकार या अन्य बाहरी मदद भी कहां तक सहयोग दे सकती है। तो लोगों को अपने ही बल पर ही आगे बढ़ना होगा।

अभी अलकनंदा सहित सब नदियां-गंगाएं शांत सुन्दर बह रही हैं। जैसे सारा गुस्सा उतार चुकी हों। सबक दे चुकी हों और अब अपने किनारे बसे लोगो की आजीविका और सुरक्षित भविष्य के लिए चिंतित दिखाई देती हों। मानो वो कहना चाह रही हों कि कसूर किसी का था और बुराई आ गई नदियों पर किंतु नदियां इसका भी बुरा नहीं मान रही हैं। वो जो कहना चाहती थी उसे उन्होंने अपनी भाषा में जून 2013 में अच्छी तरह से बता दिया है। नदी की इस भाषा को यदि हम नही समझ पाये तो फिर मुश्किल होगी।

फिलहाल उत्तराखंड को बस इंतज़ार है तीर्थयात्रियों और पर्यटको का जो आएं और जो काला तगमा लग गया उत्तराखंड के ऊपर कि अरे यहाँ तो बाढ़ आई थी, वहाँ तो पहाड़ टूटे थे, उस सदमे को हटाने की ज़रुरत है। आज ज़रुरत है कि पर्यटक आए और यहाँ रुकें, इस समय फरवरी में अलकनंदा घाटी में इतनी सुंदरता बिखरी हुई है कि आंखे बंद ना हो। पांडुकेश्वर गांव में छः महीने के लिए ब्रदीविशाल जी विराजमान हैं। औली पर्यटन स्थल है। जहां जोशीमठ के पास पहाड़ियों पर बरफ गिर रही है। सरकारें क्यों नही शीतकालीन तीर्थाटन और पर्यटन के लिए प्रचार करती है?

Monday, 15 July 2013

गंगा को कब्जियायें नहीं 15-7-2013


Home

Author: 
 विमल भाई

Source: 
 माटू जनसंगठन

उत्तराखंड में आई आपदा ने, जिसे मेधापाटकर जी ने ‘काफी हद तक शासन निर्मित’ करार दिया है, उत्तराखंड का नक्शा बदल दिया है। नदियों पर बने पुल टूटे और रास्ते बदले हैं। अब उत्तराखंड के पुननिर्माण में पिछली सब गलतियों को ध्यान में रखना होगा। दिल्ली जैसे तथाकथित विकास को एक तरफ करके ग्राम आधारित विकास की रणनीति बनानी होगी। केदारनाथ मंदिर निर्माण के साथ उत्तराखंड निर्माण पर ध्यान देना होगा। केदारनाथ मंदिर की स्थापत्य कला को देखे तो मालूम पड़ेगा कि पुराने समय में इंजिनीयरिंग हमसे कहीं आगे थी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री जी का कहना है कि भू-वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की सलाह मंदिर बनाने के लिए ली जाएगी साथ में केदारनाथ यमुनोत्री के लिए पंजीकरण कराने का प्रस्ताव है। पर गंगोत्री और बद्रीनाथ के लिए हमें किसी आपदा का इंतजार नहीं करना चाहिए वहां भी इस समय काफी बर्बादी हुई है। पंजीकरण चारोधाम के लिए अनिर्वाय करना चाहिए।

हमें सरकार के साथ अपनी लापरवाहियों व गलतियों को भी देखना चाहिए। जिस तरह हमने तीर्थयात्रा को पर्यटन और रोमांचकारी पर्यटन में बदला है वो पहाड़ के लिए तो विनाशकारी सिद्ध हुआ है बल्कि तीर्थयात्रियों के लिए स्वयं भी बहुत जोखिम भरा सिद्ध हुआ है। जैसे पर्यटक वैसे ही उनके लिए सुविधाजनक रहन-सहन और बाजार-होटल बनते गए जिसके निर्माण में किसी नियम को नहीं देखा गया। बस रोजगार और विकास के लिए आज खंडहरों में तब्दील हुए किनारे अंधाधुंध निर्माण के रूप में शेष है। इसके लिए किसी नियम का ना होना और सरकार के लोक निर्माण विभाग की पूरी तरह अनुपस्थिति भी इसके लिए दोषी है।

इस त्रासदी के बाद यह बहस भी उठाने का प्रयास हुआ है कि केदारनाथ तक सड़क बनी होती तो सही रहता किंतु जहां सड़कें थी वहां क्या हाल हुआ है? गंगोत्री-बद्रीनाथ में केदारनाथ जैसी तबाही नहीं हुई। बड़ी सड़कों से ही लोग वहां खूब पहुंचे और वही सड़के टूटने के कारण ही दसियों हजार यात्रियों को फंसे रहना पड़ा उनके बचाव की बारी भी केदारनाथ से सब यात्रियों को निकाल लेने के बाद ही आई।

उत्तरकाशी का मर्णिकर्णिका घाट

चारधामों में भी जिस तरह से वहां की पारिस्थितिकी की अनदेखी करके बड़ी-बड़ी संख्या में भक्तों को बुलाकर धार्मिक प्रवचनों, कथाओं आदि का आयोजन किया जाता है वह भी एक बड़ा कारण बना है। गंगोत्री में ज्यादा लोगो के फंसने का कारण वहां एक कथावाचक द्वारा कथा का आयोजन था। इन सबको आस्था से जोड़कर अपने व्यवयाय को बढ़ाने का तरीका है। पायलट बाबा के आश्रम का बड़ा हिस्सा टूटा, भागीरथी घाटी में उत्तरकाशी से ऊपर आश्रम को गंगा जी की छाती पर बनाया गया था। गंगा जी ने इस सब को नकारा है।

चारधाम तीर्थ यात्राओं को पर्यटन में बदलने हवाई जहाज की शुरुआत ने और भी तेज किया है। जिसने स्थानीय लोगों के रोजगार पर भी बहुत बुरा असर डाला है। ध्यान देने की बात है कि केदारनाथ जी में आई आपदा के दिन यात्रियों की संख्या बहुत ज्यादा थी। कारण था की घोड़े-खच्चर वालों की इसके विरोध में दो दिन की हड़ताल थी जो उसी दिन खुली थी।

हेमकुंड की यात्रा को रोमांचकारी यात्रा के रूप में लिया जा रहा है। तीर्थ का भाव कम दिखता है मस्ती का ज्यादा। तेज गति से मोटरसाइकिलों पर जाना इसमें रोमांच की धमक ही दिखती है पर तीर्थयात्रा का भान नजर नहीं आता है। बहुत जल्दी में तीर्थ करने की जरुरत क्यों है? गोविंद घाट पर बहुत सी कारें-मोटरसाइकिले-बसें बही है और काफी अटकी है जिन्हें अब बाद में निकाला गया।

गंगा को पर्यटन का प्रतीक बनाना महज पहाड़ में नहीं बल्कि ऋषिकेश और हरिद्वार में भी दीखता है। यहां होटलों जैसी सुविधाओं वाले आश्रमों की भरमार हो गई है। प्रश्न है कि क्या सफेद धन से इतना कुछ बन सकता है? यहां दोनों तीर्थनगरियों में कुछ आश्रमों और साधु संतो को छोड़ कर शेष आत्मप्रसार वैभव तथा साधारण गृहस्थ से ज्यादा भोग विलासिता के आडम्बर के साथ गंगा जी को शोकेस में रखकर अपने आश्रम में की श्री वृद्धि में लगे हैं। 

उत्तरकाशी में गंगा ने किया तबाही

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेशों में गंगा के किनारों को छोड़ने की 500 मीटर दोनों तरफ बात थी। पहाड़ में 500 मीटर छोड़ना या हटना बहुत ही मुश्किल काम है। पहाड़ में छोटे बाजार जैसे अगस्त्यमुनि, चंद्रापुरी, नारायणबगड़ आदि स्थानीय छोटे व्यापारियों के जीवनयापन का सहारा है। किंतु यहां इन आश्रमों की ऐसी कौन सी मजबूरी है की वे गंगा जी के किनारों से हटने के बजाए नदी के और अंदर अपने आश्रमों को, ईश्वर की मूर्तियों को बना रहे हैं। यदि आप नदी के रास्ते को छोड़ दें तो गंगा से इतना विनाश नहीं होता।

बड़े हो या छोटे सभी जगह नदी नालों ने फिर से सिद्ध कर दिया कि उनको नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। आपको नदियों के लिए रास्ता छोड़ना ही होगा। उन पर कब्जा करना भी गलत होगा। चाहे वो बड़ा-छोटा बांध हो, होटल हो या गुमटी या कोई भी धार्मिक आश्रम। 

पिछले कुछ वर्षों में कावड़ यात्रा, चारधाम यात्रा हेमकुंड सहित की यात्रा में अप्रत्याषित वृद्धि हुई है। जिन धार्मिक संगठनों ने इन्हें बढ़ावा दिया है। उन्होंने भी कभी गंगा जी के स्वास्थ्य को इन यात्राओं से जोड़कर नहीं देखा। आस्था के नाम पर, जिसमें आस्था है उसे ही रौंद दिया। ना यात्रियों की सुरक्षा पर कोई ध्यान दिया गया। सरकार को तो आज हम सब दोष दे ही रहे थे। वैसे सरकार अपने इस गैर जिम्मेदार व्यवहार के लिए, यात्रियों की इतनी परेशिानियों और मौंतों के दोष से सरकार बच नहीं सकती। ठीक है कि अब यात्रियों के पंजीकरण की बात सरकार अधूरे रूप में स्वीकार कर रही है। किंतु क्या लोग भी सोचेंगे करेंगे कि तीर्थों को पर्यटन की दृष्टि से ना देखें ना गंगा को कब्जियायें।

Friday, 14 June 2013

गंगा को मारने की नई साज़िश 14-6-2013


Author: 
विमल भाईसैंड्रप द्वारा तैयार की गई आलोचनात्मक टिप्पणी, जिसे माटू के अलावा अन्य कई जन संगठनों ने अनुमोदित किया है, बिंदुवार समिति की रिपोर्ट की बदनीयत, चालाकी और गैरजानकारी का खुलासा करती है। जो जलविद्युत परियोजनाएं भागीरथीगंगा पर रोक दिए गए हैं उन्हें भी निर्माणाधीन की श्रेणी में दिखाया गया है। ऐसे कई उदाहरण इस रिपोर्ट में मिलेंगे जो बताते हैं की समिति ने बांध समर्थन की भूमिका ली है। बांधों की स्थिति बताने वाली सारिणी भी गलत आंकड़ों से भरी है। नदी की लम्बाई का अनुपात भी गलत लगाया गया है। समिति 81 प्रतिशत भागीरथी और 69 प्रतिशत अलकनन्दा को बांधों से प्रभावित कहती है जो कि पूरी तरह से गलत है। 
नापे सौ गज और काटे इंच भी नहीं। प्रधानमंत्री जी बार-बार गंगा के लिए प्रतिबद्धता जताते हैं उनकी पार्टी गंगा रक्षण का दम भरते हुए वोट भी मांगती है। किंतु ज़मीनी स्तर यह नहीं दिखाई देता है। जिसका उदाहरण है हाल ही में गंगाजी पर आई अंतरमंत्रालयी समिति की रिर्पोट। सरकार ने 17 अप्रैल, 2012 को स्वामी सानंद जी के उपवास के समय राष्ट्रीय गंगा नदी प्राधिकरण की बैठक बुलाई थी। तब सानंद जी को सरकार ने एम्स में रखा हुआ था। बैठक में वे नहीं गए उनकी ओर से कुछ संत प्रतिनिधि गए थे। प्रधानमंत्री ने उन्हें अलग से मिलने का वादा किया। बैठक में डब्ल्यू. आई. आई. और आई. आई. टी. आर. की रिपोर्ट के बारे में उठ रही तमाम शंकाओं पर विराम लगाते हुए इन रिर्पोटों को सही ठहराया। इन संत प्रतिनिधियों ने इस पर कुछ कहा हो ऐसी कोई खबर बाहर नहीं आई। बैठक शांति से निबट गई। 15 जून 2012 को सरकार ने चुपचाप से गंगा के लिए चिल्लाने वालों के मुंह में अंतरमंत्रालयी समिति का लड्डू रखा दिया गया। 15 सदस्यों में बिना किसी चयन प्रक्रिया के तीन गैर सरकारी सदस्यों को भी समिति में रखा गया। रिपोर्ट के बीच बांधों के कामों पर भी कोई रोक नहीं लगाई गई थी। समिति की रिपोर्ट आने की कोई समय सीमा नहीं रखी गई थी। समिति को भागीरथी, अलकनन्दा तथा गंगा की अन्य सहायक नदियों पर बांधों के असरों को जांचने और उनको दूर करने के उपाय सुझाने का काम दिया था। जिसका आधार डब्ल्यू. आई. आई. और आई. आई. आर. टी. की रिपोर्टे दी गई थी। इस अंतरमंत्रालयी समिति का माटू जनसंगठन व कुछ अन्य संगठनों ने विरोध किया था। इस बाबत पत्र भी प्रधानमंत्री को लिखा था। समिति के मात्र दो सरकारी सदस्यों ने विवादास्पद श्रीनगर परियोजना से प्रभावित धारी देवी तक की यात्रा की। गैर सरकारी सदस्यों ने इस बीच गंगाघाटी की ना कोई यात्रा की। ना ही इस बाबत कोई बैठक बुलाई। खैर समिति की रिपोर्ट 3-4 महीने में आने के बजाए लगभग 11 महीनों में आ पाई। इस बीच कितने ही बांधों की प्रक्रियाएं आगे बढ़ गई। श्रीनगर परियोजना तो बन भी गई।

रिर्पोट से मालूम पड़ता है कि बहुत तरीके से सरकार ने गंगा के विषय को दबाया है। पहले तो चुपचाप 15 जून 2013 को समिति बनाई और उसकी खबर भी बाहर नहीं की गई। समिति ना तो गंगाघाटी में ज़मीनी स्तर पर कार्यरत संगठनों से नहीं मिली ना ही गंगाघाटी का विस्तृत दौरा किया। समिति से माटू जनसंगठन ने 19 अगस्त को पत्र द्वारा मिलने का समय मांगा था, जो नहीं मिला। जबकि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने 17 जुलाई 2011 के अपने आदेश में समिति को यह निर्देश भी दिया था। समिति मात्र कुछ ही चुनिंदा लोगों से मिली। समिति की रिपोर्ट को भी कुंभ के बाद निकाला गया ताकि कुंभ के जमावड़े का कोई फायदा बांध विरोधियों को न मिल जाए। फिर रिपोर्ट भी जो निकली वो पूरी तरह से बांधों के पक्ष में आ रही बाधाओं को दूर करती है। पर्यावरणीय प्रवाह पर समिति ने किसी भी तरह की कोई परिभाषा नहीं दी है। अवैज्ञानिक व आधारहीन वक्तव्यों से भरी इस रिपोर्ट में जिन छोटी सहायक नदियों के बारे में कहा गया है कि उन पर आगे कोई नया बांध नहीं बनेगा। वे नदियां तो पहले से ही लगभग बांधी जा चुकी हैं या वहां बांध परियोजनाएं निमार्णाधीन हैं।

सरकार ने आज तक इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है। डॉ. भरत झुनझुनवाला के एक मुक़द्दमे में सर्वोच्च न्यायालय में सरकार ने यह रिपोर्ट ज़रूर दाखिल की है। इस तरह समिति के बनने से रिपोर्ट आने तक पूरी गोपनीयता का माहौल बनाए रखा गया है। हां समिति का हवाला देकर गंगा पर बांधों को आगे बढ़ाए जाने की पूरी उम्मीद है। सरकार ने डब्ल्यूआईआई और आईआईटीआर की रिपोर्ट के बाद इस समिति को बनाकर गंगा में पर्यावरणीय प्रवाह के मुद्दे को समाप्त करने की कोशिश की है। वैसे समिति के तीन गैर सरकारी सदस्यों में से वीरभद्र जी का देहावसान बीच में ही हो गया था। सुनीता नारायण जी और राजेन्द्र जी ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। राजेन्द्र जी ने असहमति का पत्र लिखा है। सुनिता जी ने भी एक नोट डाला है किंतु उन्होंने बांधों के वर्गीकरण पर समिति द्वारा अनजाने में सहमति दी है।

सैंड्रप द्वारा तैयार की गई आलोचनात्मक टिप्पणी, जिसे माटू के अलावा अन्य कई जन संगठनों ने अनुमोदित किया है, बिंदुवार समिति की रिपोर्ट की बदनीयत, चालाकी और गैरजानकारी का खुलासा करती है। आईए जरा विस्तृत रूप में इसे समझें। जो जलविद्युत परियोजनाएं (जविप) भागीरथीगंगा पर रोक दिए गए हैं उन्हें भी निर्माणाधीन की श्रेणी में दिखाया गया है। ऐसे कई उदाहरण इस रिपोर्ट में मिलेंगे जो बताते हैं की समिति ने बांध समर्थन की भूमिका ली है। बांधों की स्थिति बताने वाली सारिणी भी गलत आंकड़ों से भरी है। नदी की लम्बाई का अनुपात भी गलत लगाया गया है। समिति 81 प्रतिशत भागीरथी और 69 प्रतिशत अलकनन्दा को बांधों से प्रभावित कहती है जो कि पूरी तरह से गलत है। वास्तव में पूरी नदी या तो सुरंगों में होगी या जलाशयों में। तो समिति कौन से हिस्से के बचने की बात कर रही है? आकंड़ों के खेल ये हैं कि कोटली भेल-2 को बांधों में गिना ही नहीं है। जबकी वो मुख्य गंगा, भागीरथी व अलकनन्दा नदी को डुबाने वाली है। बांधों के बीच की दूरी पर भी दोमुंही बाते हैं। समिति या तो चालाकी पूर्ण या मूर्खता की बात कर रही है, या वो नदी विज्ञान की समझ से पूरी तरह अनजान है। जैसे समिति कहती है कि तकनीकी जरूरत के अनुसार बांधों के बीच की दूरी तय हो। इस तरह समिति ने सभी बांधों को छूट ही दे दी है। बांधों की श्रृंखला होने से जो प्रभाव होता है उनको पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया है। डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट में जिन 24 बांधों को रोकने की बात कही गई थी समिति ने उसे बिना कोई कारण दिए नकारा है। रिपोर्ट में जगह-जगह गंगा घाटी की जैवविविधता, सुंदरता, फूलों की घाटी, नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान आदि का जिक्र है किंतु वहां के बांधों पर रोक की बात नहीं की है।

कोटली भेल-2 की पर्यावरण स्वीकृति रद्द की गई है, और इसके साथ ही अलकनंदा जविप की भी वन स्वीकृति तीन बार रद्द की गई है उसे निर्माणधीन बताना गैरजानकारी नहीं बल्कि बद्नीयत की ओर इशारा करता है। 6 नदियों को अक्षुण्ण रखने की बात मज़ाक से कम नहीं है। इनमें से अस्सी गंगा, बिरही गंगा तो बंध ही चुकी हैं। इस तरह बड़े बांधों को हरी झंडी दी है। मात्र गंगा की बड़ी सहायक नदी पिंडर अभी तक अक्षुण्ण है। जिस पर अभी कोई बांध नहीं है ना ही कोई स्वीकृति मिली है। उस पर समिति का ध्यान नहीं गया। दूसरी 4 नदियों पर भी बांध बने हैं और बन रहे हैं। फिर कौन सी नदी को बचाने की बात समिति ने की है? समझ से परे हैं। फिर इन नदियों पर जविप ना बनने से बिना आधार दिए 400 मेगावाट के हानि की बात भी समिति ने कही है।

समिति साथ ही कहती है कि बांध मितव्ययी और चलाने लायक हो हर हालत में यानि पर्यावरणीय, सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक असरों को एकतरफ करते हुए बांध बनते रहे बस। समिति ने कहीं भी पर्यावरणीय प्रवाह की बात नहीं की है जो की उसका मुख्य काम था समिति कहती है की अविरल धारा पाईप लाईन में भी हो सकती है यानि नदी का अर्थ ही समिति ने नहीं समझा है। समिति रिपोर्ट में सामायिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्षों की बात लगातार कर रही है किंतु वो किन्हीं ऐसे समूहों से नहीं मिली। ना ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को भी देखा जो कहता है की किसी भी नदी को 50 प्रतिशत से ज्यादा नही मोड़ा जा सकता है समिति ने जो महीनेवार प्रवाह की बात कही है वो किसी प्रक्रिया तथ्य आदि पर आधारित नहीं है। पर्यावरणीय प्रवाह की निगरानी भी बांध कंपनी की ज़िम्मेदारी पर छोड़ दिया है और वो भी 25 मेगावाट से ज्यादा की जविप में ही। आप बाघ से बकरी की निगरानी करने को कह रहे हैं। बांधों के पक्ष में समिति ने नया आधारहीन तर्क गढ़ा है की हिमालयी नदियों में मछलियों को कम जलस्तर की जरूरत होती है। जिन परियोजनाओं को कोई पर्यावरणीय और वन स्वीकृति तक नहीं मिली उन्हें भी निमार्णाधीन बताया है। बांधों के पक्ष में यह गलत प्रस्तुतीकरण साज़िश जैसा ही लगता है।

बहुत सारे पर्यावरणीय प्रभावों को समिति ने छुआ तक नहीं है। जैसे पीकिंग पावर उत्पादन यानि आवश्यकता के अनुसार बिजली का उत्पादन जिससे नदी का पानी कभी भी ऊपर नीचे हो सकता है। हर बांध के नीचे नदी पर बड़े-बड़े बोर्डो में लिखा भी है कि नदी का जलस्तर कभी भी 5 से 15 मीटर तक ऊंचा हो सकता है। कृपया नदी किनारे नहीं जाएं। मगर समिति ने यदि क्षेत्र का दौरा किया होता तो ये तथ्य वो समझ पाती डब्ल्यू आई आई, आईआईटीआर की रिपोर्ट को सही सिद्ध करने का एक प्रयास में समिति कहती है की टिहरी को छोड़कर सभी रन ऑफ द रिवर जविप है टिहरी बांध के ठीक नीचे कोटेश्वर उन्हें नहीं दिखा और जिन्हें ऑफ द रीवर कहा गया है उन कोटली भेल की तीनों जविप आदि के जलाशय 33 कि.मी. तक के हैं इस प्रकार के हर बांध के नीचे स्लूस गेट बने हैं जो रेत निकालने के लिए हैं। जबकि डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट भी कहती है की 69 जविप में से 13 जविप जलाशय वाली है। समिति को अलकनन्दा जविप के धारी देवी मंदिर पर असरों को भी देखना था। राजेन्द्र सिंह जी और वीरभद्र मिश्रा जी ने परियोजना में परिवर्तन सुझाए किंतु बिना कोई कारण दिए वे सुझाव अमान्य कर दिए गए। समिति बांधों को सामाजिक असरों पर मौन है जबकि देवसारी व विष्णुगाड पीपलकोटी बांधों में विरोध जारी है।

पर्यावरणीय प्रवाह वर्तमान में कार्यरत जविप के लिए भी समिति ने मान्य करने को कहा है किंतु उसकी कोई प्रक्रिया नहीं बताई है। समिति ने प्रदूषण के प्रमुख विषयों जैसे सहकारिता का अभाव, शहरी पानी और प्रदूषण नियंत्रण में प्रजातांत्रिक सत्ता आदि के बारे में कहा है कि नदी के सभी हिस्सों में प्रवाह लगातार रहना चाहिए। किंतु मात्र यह कह देने से उद्देश्य पूरा नहीं होता। समिति की रिपोर्ट में आपसी चर्चा को कहीं नहीं बताया गया है। बांधों की सूची तक पूरी और सही नहीं है। गंगा के पांचों प्रयागों को सुरक्षित रखने के बारे में भी समिति मौन है। राजेन्द्र सिंह की नोट छोड़ दे तो समिति की रिपोर्ट पूरी तरह बांधों के पक्ष में ही है। बल्कि पर्यावरण मंत्रालय के वर्तमान में स्थापित दिशा निर्देश ज्यादा सही नजर आते हैं। समिति ने यह दिखाने के लिए की उसने कुछ काम किया है। इन दिशा निर्देशों की एक सूची बनाई है। यह समिति बनाना अपने में बहुत बड़ी बात हो सकती थी किंतु गंगा के स्वास्थ्य व पर्यावरण और स्थानीय विकास को निरूपित करने का मौका समिति में गँवा दिया है। यह रिर्पोट मात्र और मात्र गंगा को मारने की नई साज़िश का हिस्सा है। इसे स्वीकार करना मात्र गंगा के लिए ही शर्मनाक बात नहीं होगी वरन यह अन्य नदियों के लिए भी एक खतरनाक मापदंड होगी। मगर शर्म उन्हें नहीं आती।

Wednesday, 22 May 2013

उद्गम शेष 23-5-2013

उद्गम शेष

Home

Author: 
विमल भाई
Source: 
माटू जनसंगठन
अधिसूचना में जहां बड़े बांधों पर पूरी तरह से रोक की बात है वहीं 25 मेगावाट से छोटे बांधों को पूरी तरह से हरी झंडी देने का प्रयास है। अस्सीगंगा में 4 जविप निर्माणाधीन हैं जो 10 मेगावाट से छोटी हैं। जिनमें एशियाई विकास बैंक द्वारा पोषित निमार्णाधीन कल्दीगाड व नाबार्ड द्वारा पोषित अस्सी गंगा चरण एक व दो जविप भी है। उत्तरकाशी में भागीरथीगंगा को मिलने वाली अस्सीगंगा की घाटी पर्यटन की दृष्टि से ना केवल सुंदर है वरन् घाटी के लोगो को स्थायी रोज़गार दिलाने में भी सक्षम है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की ताजी अधिसूचना के अनुसार गौमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथीगंगा के लगभग 100 किलोमीटर लम्बे 4179.59 वर्ग किलोमीटर के संपूर्ण जल संरक्षण क्षेत्र को भागीरथीगंगा के पर्यावरणीय प्रवाह और परिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए पारिस्थितिकीय और पर्यावरणीय दृष्टि से पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया है। इसके साथ ही उत्तराखंड में खासकर उत्तरकाशी के इस क्षेत्र में फिर से धरने प्रर्दशन चालू हो गए।

पूर्व के जी.डी. अग्रवाल और वर्तमान में स्वामी सानंद के उपवास से आस्था के नाम पर बांध रोकने के प्रयासों पर यह पक्की मोहर है। उत्तराखंड सरकार ने नवंबर 2008 पाला-मनेरी व केन्द्र सरकार ने 2010 में लोहारीनाग-पाला बांध रोका था। यह जानते हुए भी कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार और राज्य की बीजेपी सरकार के ही द्वारा यह बांध रुके हैं। स्थानीय स्तर पर बांध समर्थन में आंदोलन करके वोट बटोरने की खूब कोशिशें चली हैं। राजनीतिक दलों ने चाहे वह कांग्रेस हो या बीजेपी पिछले लोकसभा, विधानसभा और नगर निगम चुनावों में इसका भरपूर राजनीतिक फायदा उठाया। नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन (एनटीपीसी) ने आज की तारीख में भी लोहारीनाग-पाला जलविद्युत परियोजना ज.वि.प. को उसी दशा में छोड़ा हुआ है अभी तक ना तो उसकी निर्माण समान हटाई गई और ना ही बांध के लिए बनाई गई सुरंग को भरने की कोई कोशिश की गई। उनके पांच विभिन्न प्रबंधक अभी भी बांध क्षेत्र में बैठे तनख्वाह पाते रहे हैं। इस तरह बंद पड़ी परियोजना की भी लागत बढ़ती गई है। एनटीपीसी को व स्थानीय राजनेताओं को इस अधिसूचना से करारा झटका लगा है। अब एनटीपीसी का बोरिया बिस्तर समेटना तय हो गया। साथ में इन परियोजनाओं की बनने या ना बनने की रस्साकशी पर भी विराम लगा।

स्वामी सानन्द जी के साथ निश्चय ही वे साथी, तमाम संगठन व व्यक्ति धन्यवाद के पात्र है जिन्होंने इस संपूर्ण नकारात्मक स्थिति में भी ऐसी अधिसूचना लाने के लिए प्रयास किए। इस अधिसूचना की खबर जैसी ही क्षेत्र में पहुंची तमाम तरह की प्रतिक्रिया उभरी और पंचायत चुनावों को मद्देनजर रखते हुए स्थानीय नेताओं ने बिना अधिसूचना को जाने समझे भ्रम की स्थिति फैलाना शुरू की और एक आन्दोलन को जन्म देने की भी कोशिश की। जो कि सफल होती नहीं दिखती।

अस्सीगंगा में बादल फटने के बादअस्सीगंगा में बादल फटने के बाद 
देखा जाए तो इस अधिसूचना में बहुत कठिन निर्णय नहीं लिए गए हैं। अधिसूचना में अभी पूरी तरह से क्षेत्र को कोई ऐसा प्रतिबंध नहीं किया है जैसा कि राजनीतिक दलों ने प्रचार किया। हां इस अधिसूचना से बड़े होटल मालिकों आदि पर प्रभाव ज़रूर पड़ेगा। तथाकथित रूप से अधिसूचना में जहां बार-बार विकास कार्य रोकने की बात कही गई है उसमें कहीं स्थानीय लोगों का जीवन नकारात्मक रूप से प्रभावित होने वाला नहीं है। बल्कि यह देखा जाए तो हम उत्तराखंड में स्थानीय स्तर पर पर्यटन, आजीविका, उर्जा की स्थाई स्रोतों के साथ स्थाई विकास की अवधारणा को विकसित कर सकते हैं। राज्य सरकार व अन्य बड़े राजनैतिक दल इस पर इस शुरूआत को आगे ला सकते हैं।

इस अधिसूचना में क्षेत्र के मानव निर्मित विरासतों सहित सांस्कृतिक, प्राकृतिक विरासतों को सहेजने की बात है। अधिसूचना में स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति पर कहीं रोक नहीं है। बशर्ते की अधिसूचना की धाराओं का स्थानीय शासन-प्रशासन गलत तरह से उपयोग करके स्थानीय निवासियों को प्रताड़ित न करे, जैसा कि चिपको आन्दोलन के बाद बने नियमों, कानूनों का इस्तेमाल करके स्थानीय लोगों को 1,000 मीटर से ऊपर पेड़ काटने की अनुमति नहीं है। दूसरी तरफ वन विभाग द्वारा और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए इस कानून का खूब उल्लंघन होता है। अधिसूचना में खनिजों का खनन और पत्थर उत्खनन, आरा मशीनों की स्थापना, प्रदूषणकारी उद्योग, मल-जल और औद्योगिक बहिस्राव, प्लास्टिक के समान ले जाने वाले थैलों का उपयोग, परिसंकटमय अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाईयां के लिए पूर्व अनुमति की जरूरत होगी। जल, वायु और मृदा प्रदुषण पर रोक और साथ ही इन पर सख्त निगरानी का नियम है। किंतु निगरानी समिति में गैर सरकारी सदस्य का न होना चिंताजनक है। चूंकि आज तक की सरकारी निगरानी समितियों की स्थिति बहुत ही दयनीय रही है। बल्कि सच कहा जाए तो कोई निगरानी ही नहीं होती। चाहे वो पर्यावरण की हो या जलविद्युत परियोजनाओं की अस्सी गंगा में बादल फटने के बाद जो हुआ उससे यह और अधिक स्पष्ट होता है।

अधिसूचना की धारा 2 में पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र के लिए आंचलिक महायोजना बनाने के लिए कहा गया है। जिसमें राज्य सरकार को पारिस्थितिकी संवदेनशील क्षेत्र के लिए दो वर्ष के भीतर स्थानीय जनता, विशेषकर महिलाओं, के परामर्श से एक आंचलिक महायोजना बनाकर उसे केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय, से अनुमोदित कराने का निर्देश है।

भागीरथी गंगा अपने स्वतंत्र प्रवाह में                                भागीरथी गंगा अपने स्वतंत्र प्रवाह में                                                                                                                         
अधिसूचना में जहां बड़े बांधों पर पूरी तरह से रोक की बात है वहीं 25 मेगावाट से छोटे बांधों को पूरी तरह से हरी झंडी देने का प्रयास है। अस्सीगंगा में 4 जविप निर्माणाधीन हैं जो 10 मेगावाट से छोटी हैं। जिनमें एशियाई विकास बैंक द्वारा पोषित निमार्णाधीन कल्दीगाड व नाबार्ड द्वारा पोषित अस्सी गंगा चरण एक व दो जविप भी है। उत्तरकाशी में भागीरथीगंगा को मिलने वाली अस्सीगंगा की घाटी पर्यटन की दृष्टि से ना केवल सुंदर है वरन् घाटी के लोगो को स्थायी रोज़गार दिलाने में भी सक्षम है। यह ट्राउट मछली के लिए देशी-विदेशी शौकीनों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। 1992 के भयानक भूकंप का केन्द्र अगोड़ागांव है जहां सड़क बनाने की इजाज़त नहीं है किंतु कल्दीगाड जविप बन रही है। अगस्त 2012 में बादल फटने की घटना के बाद अस्सी गंगा ने इन बांधों को नकार दिया है। ज्ञातव्य है कि 24 जुलाई व 3 अगस्त 2012 को अस्सी गंगा नदी में बादल फटने के कारण निमार्णाधीन कल्दीगाड व अस्सी गंगा चरण एक व दो जलविद्युत परियोजनाओं ने तबाही मचाई और भागीरथीगंगा में मनेरी भाली चरण दो के कारण बहुत नुकसान हुआ।

हद तो यह है कि मारे गए मज़दूरों का कोई रिकार्ड भी नहीं मिला। अस्सीगंगा के गांव बुरी तरह से प्रभावित हुए। छोटे-छोटे रास्ते टूटे, अस्सीगंगा घाटी का पर्यावरण तबाह हुआ जिसकी भरपाई में कई दशक लगेंगे। प्रकृति के इस संदेश को भी समझने की जरूरत है। निर्माण कंपनी ‘उत्तराखंड जल विद्युत निगम’ भी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। बल्कि उनकी सारी गलतियों को बाढ़ के साथ बहा दिया गया। बीमा कंपनियों से उनका नुकसान तो पूरा होगा साथ ही भ्रष्टाचार के लिए और पैसा मिल जायेगा। प्रभावितों का पुनर्वास अभी नहीं हो पाया है। किंतु परियोजनाएं फिर चालू हो रही हैं। माटू जनसंगठन ने इस पर एक रिपोर्ट ‘आपदा में फायदा’ निकाली है। स्थानीय लोगों के साथ मांग की गई है कि अस्सीगंगा पर बांध तुरंत रोके जाएं और अस्सीगंगा को लोक आधारित पर्यटन के लिए सुरक्षित किया जाए। इसे आंचलिक महायोजना में जोड़ना चाहिए।

वास्तव में गंभीर चुनौती तो इस आंचलिक महायोजना को बनाने की होगी जिसमें हमें ध्यान रखना होगा की अधिसूचना की शाब्दिक और आत्मिक भावना सुरक्षित रहे साथ ही स्थानीय लोगों के जीवन विकास में कोई बाधा न आए। चूंकि किसी भी ओर पूरी तरह से जाना घातक होगा चाहे वो मां गंगा की अर्चना सेवा की सोच हो या स्थानीय विकास के नाम पर मात्र कुछ लोगों के विकास का हो। कुछ लोगों को छोड़कर, जिसमें जनप्रतिनिधि भी आते हैं जो पिछले कुछ वर्षों में तेजी से सम्पत्ति वाले बने हैं। आंकड़े बताते हैं कि उत्तरकाशी में अभी भी बहुत गरीबी है। अगर यदि महायोजना सही तरीके से बने और अधिसूचना की निगरानी का ईमानदार कदम रहे तो न केवल तीर्थ यात्रियों की संख्या में इज़ाफा होगा बल्कि यह क्षेत्र उत्तराखंड का सांस्कृतिक-आर्थिक रूप से समृद्ध क्षेत्र बनेगा और पलायन भी रुकेगा। एक उत्कट ईमानदार राजनीतिक इच्छा और प्रयास इन सबके लिए अपेक्षित है।