Wednesday, 2 January 2019

प्रेस विज्ञप्ति 20-12-2018

प्रेस विज्ञप्ति   20-12-2018

      {English translation after Hindi}

श्रीनगर बांध परियोजना: पावर चैनल में रिसाव 
    गांव के लोग भय में जीने के लिए मजबूर 

पिछले 4 दिन से उत्तराखंड के  टिहरी व पौड़ी जिले में बनी श्रीनगर बांध परियोजना का पावर चैनल यानी लगभग 4 किलोमीटर लंबी खुली नहर में जगह-जगह से तेजी से रिसाव हो रहा है। रिसाव के कारण  मंगसू और सुरासू आदि गांवों के लोग भय में हैं। उनके घरों के आसपास पानी है, खेतों में पानी है जो की फसलों को खराब भी कर रहा है, यह पानी सर्दी के मौसम में और ठंडक बढ़ा रहा है।

ज्ञातव्य है कि 2015 में इन गांवों में नहर के रिसाव के कारण भारी मात्रा में पानी भर गया था । जिसके बाद तत्कालीन उत्तराखंड सरकार ने  2 मंत्रियों की एक कैबिनेट समिति बनाई। जिसमे ऊर्जा सचिव को भी रखा गया था। जिसकी संस्तुति पर देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ने अपनी  रिपोर्ट दी । इस रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि पावर चैनल की जगह और निर्माण में खामियां हैं। अपनी सिफारिशों में वाडिया इंस्टीट्यूट ने बताया था कि कई अन्य संस्थानों के साथ मिलकर इसके गहन अध्ययन की आवश्यकता है। इसके बाद जीवीके कंपनी ने बिना किसी अध्ययन किए, नहर पर जगह-जगह कुछ लीपापोती जैसे काम की किए। मगर वह पूरी तरह कभी भी न सफल हुए हैं । बल्कि नए से कचरा सफाई करके जो मलबा नीचे की तरफ डाला गया उससे लोगों के खेत और खराब हुए। जिस पर कोई मुआवजा नहीं।

हम मानते हैं कि बांध निर्माता जीवीके कंपनी ने लोगों की सुरक्षा को नजरअंदाज किया है। मात्र पानी बेकार न जाए इस बात को ध्यान में रखा। रिसाव क्यों हो रहा है उस गंभीर प्रश्न पर काम नहीं किया। पिछले 3 सालों में उत्तराखंड सरकार में सत्ता बदली है। मगर पूर्ववर्ती और वर्तमान सरकार दोनों ने ही इस ओर ध्यान नहीं दिया। जिसका नतीजा है कि आज स्थिति गंभीर है।

श्रीनगर बांध परियोजना के निर्माण किस समय से ही लगातार प्रश्न उठते रहे हैं । बांध कंपनी ने पर्यावरणीय शर्तों की अनदेखी करते हुए बांध को आगे बढ़ाया । अन्य मुद्दों पर भी आज स्थिति यह है कि शहर में गंदा पीने का पानी, लोगों के मुआवजे लटके हुए हैं, लीज पर ली गई जमीनों के पैसे अभी तक नहीं दिए गए, शहर में मरीन ड्राइव बनाने का वादा गायब, गर्मियों में चौरास में उड़ती धूल। पूरे बांध क्षेत्र के पर्यावरण की तबाही और इन सब के साथ मंगसू से धारी देवी तक के गांवों में छोटी-छोटी समस्याएं जैसे पानी, गांव के रास्ते आदि-आदि भी लटके हुए हैं।

माटू जन संगठन मांग करता है कि :-

1-सरकार वाडिया इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट पर तुरंत कार्यवाही हो।

 2- पावर चैनल के रिसाव से हो रहे नुकसान की भरपाई बांध कंपनी करें ।

3- लंबित मामलों पर सरकार कंपनी के साथ मिलकर तुरंत निदान कराएं।

विमल भाई,    विनोद चमोली,  मनीष रावत
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    (English translation)                                                    
Shrinagar Dam Project: Leakage in power channel, village people forced to live under threat.
For the past 4 days, there has been continuous leakage from the 4km long power channel of Shrinagar Dam Project constructed in Tehri and Pauri districts of Uttarakhand. Due to this leakage, residents of villages like Mangsu, Surasu, etc. are under threat. Their homes are surrounded by water, their fields are water logged which is also damaging the crop. This presence of water adds on to the wintry cold season.
It is well known how in 2015, these villages were waterlogged owing to a leakage in the canal. Following which the then Uttarakhand government had urgently set up a Cabinet Committee comprising 2 ministers which included the secretary for Energy and on the recommendation of which, the Dehradun based Wadia Institute submitted its report. The report concluded that the location as well as construction of the power channel was flawed. Recommendations of Wadia Institute said that an in-depth study of it in collaboration with other institutes was needed. Following this, the GVK company undertook some tasks at various places of the canal without having done any study of any kind. But they have never succeeded entirely. Rather the waste collected after cleaning the canal, which was dumped downwards, all the more damaged people’s fields who have yet not been compensated.
We believe that the Dam constructor GVK company has ignored and overlooked people’s safety. Their only consideration has been that the water for generating electricity shouldn’t be wasted. The question about the cause of the leakage has not been worked upon. In the past 3 years, the government of Uttarakhand has changed. But both the previous and the present  government have paid no heed in this direction. As a result, today, the situation is serious.
There have been continuous doubts and questioning about the Shrinagar Dam Project ever since it had been constructed. The Dam constructing company undertook the construction overlooking all environmental risks. Other unsettled issues include unhygienic water for drinking, unpaid compensations to people, lands taken on lease have not been paid till date, the promise to construct marine drive in the city is missing, the unattended dust and waste blown away in summers. The entire area under dam construction is devastated and along with this, villages from Mangsu till Dhaara devi are aggrieved with small problems like water, pathways, etc.
Matu People’s Organisation demands :-
  1. Immediate Government proceeding on Wadia Institute’s report.
  2. The damage being caused due to leakage in the power channel should be compensated for by the dam construction company.
  3. Pending cases should be urgently resolved by the government with the company’s cooperation.

Vimal Bhai, Vinod Chamoli, Maneesh Rawat.

प्रेस विज्ञप्ति 28-11-218


 प्रेस विज्ञप्ति          28-11-218


संगीनों के साए में पुनर्वास की जनसुनवाई


उत्तराखंड के छोटे से मोरी ब्लॉक में आज बैरिकेडिंग थी और बड़ी मात्रा में पुलिस थी। नजारा ऐसा था कि कोई बड़ा आतंकवादी हमला होने वाला है। उत्तरकाशी जिले के इस छोटे से ब्लॉक में सुपिन नदी पर, गोविंद पशु विहार में बनने वाली जखोल साकरी बांध परियोजना ( 44 मेगावाट) की पुनर्वास संबंधी जनसुनवाई थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मात्र 5 गांव प्रभावित हो रहे हैं पाव तल्ला, मल्ला, सुनकुंडी, धारा व जखोल आदि।
 किसी भी गांव में लोगों की मांग के अनुसार उनको कागजात न दिए गए ना समझाएं गए। 12 जून 2018 को लोगों के कड़े विरोध के चलते पर्यावरणीय जनसुनवाई रद्द हुई थी।
 लोगों की मांग थी कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंध योजना व सामाजिक समाघात आकलन रिपोर्ट उन्हें हिंदी में दिया जाए और व्यवस्थित, निष्पक्ष संस्था , व्यक्तियों द्वारा समझाया जाए। प्रभावित क्षेत्र में मात्र चंद लोग के आलावा तमाम लोग इस बांध परियोजना का विरोध कर रहे हैं।प्रशासन व सतलुज जल विद्युत निगम कंपनी जब पर्यावरणीय जनसुनवाई कराने में सफल नहीं हुए तो उन्होंने सामाजिक समाधान पर आकलन रिपोर्ट पर होने वाली जनसुनवाई का मोरी ब्लॉक में एक केंद्रित आयोजन किया ताकि वे यह दिखा सके की बांध का काम चालू है।
 बहुत टालमटोल के बाद सूचना के अधिकार के तहत मिले कागजातों से यह मालूम पड़ता है कि गांव की अशिक्षित महिला प्रधानों को बिना रिपोर्ट पढ़ाये व बिना कोई प्रक्रिया समझाए, कागजों पर हस्ताक्षर ले लिए गए।
सामाजिक समाघात आकलन प्रक्रिया में आवश्यक है की ग्रामीण स्तर की समितियां बने। जो कि नहीं बनाई गई । परियोजना स्तर की जो विशेषज्ञ समिति बनाई गई उसमें टिहरी बांध परियोजना के बड़े अधिकारियों को लिया गया। यह सर्वविदित है कि टिहरी बांध परियोजना में अभी तक पुनर्वास नहीं हो पाया है। रटिहरी बांध पुनर्वास निदेशालय के आंकड़ों के अनुसार भी 415 लोग अभी भूमि आधारित पुनर्वास के लिए कतार में खड़े हैं। 
पुनर्वास के लिए बनाई गई समिति के ग्रामीण सदस्यों ने यह रिपोर्ट नहीं पढ़ी है। आज की जनसुनवाई किसी तरह संभव हो इसलिए सरकारी स्तर पर लोगों को भ्रमित रखने के प्रयास किए गए। जनसुनवाई प्रभावित गांवों से 40 किलोमीटर दूर मोरी ब्लॉक में रखी गई, जिसके 1 किलोमीटर आगे पीछे पुलिस बैरिकेड था। जिनकी भूमि जा रही है उनकी लिस्ट के अनुसार उनके पास बना करके भेजा गया। इसके अलावा यदि कोई आवश्यक रूप से जीप या कार सड़क से निकल रही थी तो उसमें एक पुलिस वाले को बिठाया गया। 

भू अर्जन पुनर्वास और पुनः व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 का खुले रूप से उल्लंघन किया गया । पहले यह जनसुनवाई 25 अक्टूबर को आयोजित की गई थी किंतु चुनाव के चलते रद्द की गई और 28 नवंबर को पुन: घोषित की गई। प्रशासन ने मात्र जिनकी जमीन जा रही है उनको ही जनसुनवाई में आना है, ऐसा झूठ प्रचारित किया। माटू जन संगठन व अन्य लोगों ने भी पर्यावरण मंत्रालय, जिलाधिकारी व मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर अपना विरोध जताया था । किंतु सरकार ने इस पर कोई ध्यान ना देकर पुनर्वास संबंधी जनसुनवाई किसी तरह पूरी की।  जन सुनवाई के दौरान भी पाव तल्ला, मल्ला, सुनकुंडी, धारा व जखोल आदि के प्रभावितों ने विरोध पत्र जनसुनवाई में देकर, अपना विरोध दर्ज कराया। 12 जून को स्थगित हुई जनसुनवाई से डरे हुए प्रशासन ने ढेर सारी पुलिस शायद इसीलिए लगाई थी ताकि लोग इकट्ठे होकर अपनी आवाज न उठा सके । सरकार ने कागजों की भरपाई तो कर ली। साथ ही यह बता दिया गया कि बांध का मतलब जबरदस्ती, गैर जरूरी तरह से, लोगों पर सरकारी योजना थोपना है। जिसमें ठेकेदार और सरकारी नुमाइंदे का भला होगा। प्रभावितों की कोई चिंता नहीं, पर्यावरण का कोई सोच नहीं।

अन्य गावों से लोग ना पाए इसलिए उत्तराखंड के मुख्य वन संरक्षक का दौरा भी आज ही जखोल में रखा गया। जहां पर लोगों ने उनसे सवाल किया कि हमें एक पेड़ काटने की इजाजत नहीं और आपने कैसे बांध कंपनी को खुलेआम जंगल की जमीन देदी? लोगों ने कहा कि बांध के लिए वनअनापत्ति धोखे से ली गई है। आप उन्हें रद्द कीजिए।

बंदूक और संगीनों से पहाड़ खोदकर बनाए जा रहे इस छोटे से बांध के लिए पूरी सरकार कमर कस के तैयार खड़ी है। बांध कंपनी को हर तरह का संरक्षण है। लोग संरक्षित गोविंद पशु विहार में असुरक्षित बंदूकों के साए में कैद कर दिए गए।

किंतु सरकार यह जान ले कि संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं और राजनेताओं को जल्दी ही वोट मांगने लोगों के सामने आना पड़ेगा। तब जनता उनसे हर तरह से जवाब मांगेगी।

हम हर एक न्यायोचित, संविधान सम्मत, शांतिपुर्ण,
सत्याग्रह में विश्वास करते हुए  अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करेंगे।

रामवीर सिंह,  राणा गुलाब सिंह, किशन रावत, राजपाल रावत, विमल भाई

Press Release 12 Octber, 2018


Press Release 12 Octber, 2018

Politics of “Ganga Saviours” stands exposed
Salute Sawamiji's struggle

FIR be  registered
under Sec. 302 of IPC, on Mr Modi, Mr Nitin Gadkari and Ms Uma Bharti.

We, Matu Jansangthan and other organisations express our anguish on the Government assassination of Swami Gyan Swaroop Sanand (G. D. Agrawal) whose contributions to India's environmental planning and design remains unparalleled till date in the country, he was CPCB's first member secretary and a passionate engineer who inspired scores of students while at IIT-Kanpur.

We have resentment that government  completely ignored the issues raised by swamiji .On one hand, Congress acknowledged the issues and Notified a stretch of Bhagirathi as Free fellow.

This governments  head calls himself THE SON OF GANGA. Road and highways  minister also happens to be the Minister of Water Resources, River Development & Ganga Rejuvenation, calls himself THE SERVANT OF GANGA.

Even  Ms Uma Bharti who calls herself THE DAUGHTER OF GANGA who also served the Ganga MInistry and indulge in huge extra vaganz in Delhi’s VIGYAN BHAWAN and at other places used to put up show of NAMAMI GANGE project worth 22,000 crore rupees .
But she failed miserably upholding her towords Ganga and Swami Ji.

Swami Sanand ji after Modi came to power chose to remain silent for  4 years.
And when he realised that this government despite on its way to complete its tenure, in reality, was not stopping the works of dam on Ganga, then he decided to go on hunger strike for betterment  of Ganga.

Along with sitting on fast, Swami Ji sent letters, open letters to the Mr. Modi which was not noticed. He continued to send letters. Government sent, to divert the attention got on board former Chief Ministers Mr.  Nishank who happened to be the supporter of dams and who lent a big hand in dam”s projects during his CM tenure. But they callously prolonged the whole process that Swami Ji’s body gave in. And when his body got terribly  weakened and he had announced to give up water, then on 10th October’s noon Swamiji was sent to hospital by the District Magistrate. They forcibly lifted Swamiji along with his chair into the ambulance and drove away to hospital. Administration did not even showed the basic courtesy about his health and of the fact that he was a senior citizen of 87 years. They did not even care to get him into a stretcher. This shows how Government always wanted to wriggle out of this problem.

A FIR be  registered under Sec. 302 of IPC, on Mr Modi, Mr Nitin Gatkari and Ms Uma Bharti, for the murder of Swami ji, because in his letter earlier, Swami Ji had expressed that Mr. Modi will be responsible for his death.

Swami Sanand Ji had fought for closure of the dams on Alaknanda and Mandakini rivers. Matu Jansangathan has been raising the environment as well as ecology related issues and we are very grieved that government did not pay heed to any of the issues. They, neither thought of environment nor strengthen its own case advocate by the Board of Priests for ganga. Government has come forward with its real face that they only care about big dam companies and stand with them. They do not care about the sanctity of `Ganga’ rather about the resources and funds that can be gained from it. Be it in the form of Waterways and running of cruisers along it, or even the misuse of Ganga water or just made Ganga a vote bank issue

All the akhadas of Rishikesh as well as Haridwar or so Sant Samaj from Ashrams, did not stand with Swami Ji. Even when it is them who take up the  materialistic gains from ganga. Baba Ramdev and Swami Chinmayanand are also guilty. Saints conducting big seminars, conferences, meetings and collecting funds from all over the world, inviting people to ashrams to perform ganga Aarti and all Sant Samaj in reality bear the blot of being the reason for killing of a son of Ganga.
We demand that a FIR be  registered
under Sec. 302 of IPC, on Mr Modi, Mr Nitin Gadkari and Ms Uma Bharti for being complicit in the death of Swamiji.

Also, all the Ashrams and sadhus should support the issues raised by Swami Sanand Ji to stop the construction of dams and stand  for which Sawami ji had to pay with life.

Vimal Bhai

प्रेस विज्ञप्ति 4-10-2018

प्रेस विज्ञप्ति 4-10-2018

प्रधानमंत्री को पर्यावरण के लिए पुरुस्कार?नदियों पर बांध: लोगो की आवाज़ों पर ताला!!


जखोल साकरी जल विद्युत परियोजना की जनसुनवाई अचानक से 25 अक्टूबर को घोषित हुई ।ज्ञातव्य हैं कि पिछली जन सुनवाई 12 जून को प्रभावित लोगों ने इसीलिए स्थगित करवाई थी कि सभी कागजात अंग्रेजी में रखे गए थे और गांव में जो समरी कागजात दिए गए वे भी अंग्रेजी भाषा को हिंदी लिपि में लिखा गया था।

उत्तराखंड की उत्तरकाशी जिले में टोंस की सहायक छोटी सी नदी सुपिन पर प्रस्तावित 44 मेगावाट की जखोल साकरी बांध के असर के बारे में लोगो को कोई जानकारी नहीं । बरसो से इस सुपिन नदी घाटी की सुंदर वादी को गोविंद वन्यजीव विहार में लिया गया है इस कारण यहां पर तीव्र ध्वनि तक पर पाबंदी है। ऐसी में यहां पर बांध समझ में ही नहीं आता है।
चालाकी से मात्र बांध निर्माण क्षेत्र को वन्यजीव विहार से कुछ सालों पहले अलग कर दिया गया। ताकि बांध का रास्ता खुल जाए।

लोगो पर दवाब लेन के लिए,  उनमें भ्रम फैलाकर, गलत सूचना देकर, धमका कर तत्कालीन जिला उपजिलाधिकारी अनापत्ति प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर ले रहे थे। 24 मई को जिलाधिकारी उत्तरकाशी को मिलकर हमने यह सब बताया था।

इस बार भी अगस्त व सितम्बर महीने में बांध प्रभावित में तत्कालीन उपजिलाधिकारी ने लोगों को डरा धमका कर बांध के पक्ष में होने के लिए दबाव दिया। लोगों को मुकद्दमें का भय दिखाया गया। जिसके लिए 30 अगस्त को जिलाधिकारी को फैक्स से निवेदन भेजा। 17 सितंबर को थानाध्यक्ष, मोरी को लोगो ने डाक द्वारा थाने में तहरीर दी थी। 

परियोजना के लिए लोगों पर अनावश्यक दवाब दिया गया है। जबकि 20 लाख से ज्यादा खर्च कर बनाये गए कागजातों को लोगों की भाषा में देने और समझाने की मांग को प्रशासन ने नहीं पूरा किया है।
बांध प्रभावित मात्र वे नहीं है जिनकी जमीन जा रही है प्रभावित पूरा क्षेत्र होगा जिसका पर्यावरण खराब होगा।

अब अचानक से ही लोगों कि किसी मांग पर ध्यान दिए, 25 अक्टूबर को पुन: जनसुनवाई घोषित  कर  दी गई है, जो पूरी तरह अनुचित है। कपनी के दवाब में मनमानी कार्यवाही है। हम इस मनमानी का विरोध करते हैं।

12 जून 2018 को हुई जनसुनवाई में भी 14 सितंबर 2006 की अधिसूचना की शब्द और आत्मा का उल्लंघन किया गया था वैसे ही इस बार भी हुआ है।

लोगों की मांग के अनुसार उनको परियोजना संबंधित कागजात पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंध योजना व सामाजिक आकलन रिपोर्ट (EIA, EMP & SIA) ना हिंदी में दिए गए हैं ना समझाए गए हैं।

वन अधिकार कानून 2006 के अंतर्गत प्रभावित गांवों के अधिकार भी सुनिश्चित नहीं किये गए हैं।

स्थानीय अख़बारों में बांध द्वारा ली जाने वाली भूमि की जानकारी के नीचे मात्र जनसुनवाई का स्थान और समय बताया गया है । कागजातो के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।

यह जनसुनवाई प्रभावित गांवों से लगभग 40  किलोमीटर दूर मोरी ब्लॉक, सभागार में रखी गई है। जहां लोगों का पहुंचना बहुत ही कठिन है। 12 जून की जनसुनवाई में भी लोगों के लिए किसी तरह के वाहन की व्यवस्था नहीं की गई थी। 

यह समय त्यौहारों के साथ फसल कटाई, लकड़ी, घास इकट्ठी करने का है जो कि इस तरह की सार्वजनिक  लोकसुनवाई के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है।

हमारे द्वारा उठाए गए इन सवालो पर प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया है। यह बांध इस सुपिन नदी घाटी क्षेत्र के लोगों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व पर्यावरण की ढांचे को छिन्न भिन्न करेगा। इसी बांध कंपनी द्वारा बनाई जा रहे नटवार मोरी परियोजना के प्रतिफल हमारे सामने दिखते हैं। 

क्योंकि लोगों को उनकी भाषा में जानकारी नहीं दी गई थी इसलिए वे समुचित रुप से अपनी बात नहीं कह पाए थे। जिसका नतीजा आज क्षेत्र भुगत रहा हैं। हम ऐसा इस क्षेत्र में नहीं चाहते। लोगो की भाषा में संपूर्ण कागजातो की जानकारी दी जाए तो लोग बता सकते हैं कि जखोल साकरी बांध से क्या बर्बादी आएगी?
 एक ही नदी पर, एक के बाद एक बन रहे इन बाधो से भविष्य में नदी घाटी का क्या होगा? इसकी कल्पना अभी शासन कर्ताओं को नहीं है । जून 2013 में प्रकृति ने अपना रूप दिखाया था। केरल में अभी की तबाही में बांधो का बड़ा हिस्सा है। जैसे कि उत्तराखंड में रह हैं।
प्रशासन ने लोगों के विरोध के कारणों को न हल करके, लोगों से दूर बंद कमरे में सुरक्षा बलों के साए में जनसुनवाई करने का फैसला किया है।

बांध कंपनी व शासन भीतर जानता है कि जनसुनवाई,  14 सितंबर 2006 की अधिसूचना के अनुसार पर्यावरण स्वीकृति के लिए लोगों के बीच जाना, उनके लिए बाध्यकारी है। इसीलिए जनसुनवाई की प्रक्रिया को किसी भी तरह पूरा करने की मंशा साफ नजर आती है। किंतु यह स्थानीय लोगों के हितों के खिलाफ और पर्यावरण के लिए पूरी तरह गलत होगा। 

इसलिए हमारी मांग है कि:-

1. लोगों की मांग के अनुसार उनको परियोजना संबंधित कागजात पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंध योजना व सामाजिक आकलन रिपोर्ट (EIA, EMP & SIA) हिंदी में दिए जाए तथा आसान भाषा मे  स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा समझाया जाए।

2. इस पूरी प्रक्रिया के बाद ही जनसुनवाई का आयोजन प्रभावित गांव में हो।

3. लोगो को अन्य गांवों से लेने के लिए साधनों की व्यवस्था भी हो।

4.  वन अधिकार कानून 2006 के अंतर्गत प्रभावित गांवों के अधिकार सुनिश्चित किये जाएं।

ऐसे समय में जब देश के प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण के लिए पुरुस्कार प्राप्त कर रहे हों तब क्या अपने ही देश में लोगों और पर्यावरण के खिलाफ उनकी सरकार जाएगी?


गुलाब सिंह रावत, रामलाल विश्वकर्मा, रामवीर राणा, राजपाल रावत, विमल भाई

Wednesday, 13 June 2018

प्रेस विज्ञप्ति , 13 जून , 2018



जनसुनवाई रद्द, लोग चाहते है जंगल पर अधिकार

उत्तरकाशी जिला प्रशासन को 12 जून को आहूत  जखोल साकरी परियोजना की जनसुनवाई रद्द करनी पड़ी। सैकड़ों ग्रामीणों ने 3 घंटे तक जनसुनवाई मंच के सामने  "जनसुनवाई रद्द करो , बांध कंपनी वापस जाओ" आदि नारे देते रहे।  आक्रोशित युवा महिलाओं ने लगातार डटे रहकर बाद कंपनी व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की चालाकियों को नाकाम किया। प्रशासन की ओर से कोशिशें की गई कि लोग या तो शांति से बैठे या चले जाएं।
 जिलाधीश महोदय ने एक बार मंच से बिना माइक के जनसुनवाई रद्द करने की घोषणा भी की किंतु लोग जानते थे कि जब जनसुनवाई की अध्यक्षता अतिरिक्त जिलाधीश  कर रहे हैं तो उन्हें ही घोषणा करनी होगी कंपनी के लोगों को वहां से हटना चाहिए , मंच को हटाना चाहिए ।

जिलाधिकारी महोदय को " पर्यावरण आकलन अधिसूचना 14 सितंबर 2006" की प्रति दी गई और इस बात की कानूनी जरूरत बताई गई की ऐ डी एम श्री शाह मंच से घोषणा करें कि जनसुनवाई रद्द की गई तब ही जनसुनवाई रद्द मानी जायेगी। जिलाधीश महोदय को यह भी बताया गया कि 18 अक्टूबर 2006 को विष्णुगाड पीपलकोटी बांध की जनसुनवाई की अध्यक्ष निधि यादव जी, SDM चमोली ने, लोगों को जानकारी ना होने की आधार पर जनसुनवाई रद्द की थी । 21 जुलाई 2010 में भी देवसारी बांध की जनसुनवाई के अध्यक्ष ने लोगों के विरोध के चलते जनसुनवाई रद्द की थी।
 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी व बांध कंपनी  सतलुज जल विद्युत निगम के अधिकारी जिलाधीश श्री आशीष चौहान को यह बताते रहे कि हमने सभी कानूनी जरूरतें पूरी की है किंतु संगठन ने उनको बताया कि ऐसा नहीं हुआ है और कानूनी व व्यवहारिक सभी तरह की कमियों की सूचना हमने बोर्ड को भी दी थी। बोर्ड के सदस्य सचिव ने बहुत कड़ा रुख लेकर अपनी जिम्मेदारी से को मात्र कागजी कार्रवाई तक सीमित रखा। 
 इस पूरी बात के बाद  एडीएम श्री शाह ने जनसुनवाई समाप्ति की रद्द होने की घोषणा की और बांध कंपनी के लोग व बोर्ड के अधिकारी मंच से हटे।
जखोल, धारा, सुनकुंडी, पांव तल्ला, पाव मल्ला आदि प्रभावित गांवों के लोग इन अधिकारियों के पंडाल से जाने और जनसुनवाई का सामान समेटे जाने तक पंडाल में ही डटे रहे । जनसुनवाई के लिए किए गए भोजन की व्यवस्था को भी ग्रामीणों ने अस्वीकार किया।
जनसुनवाई पांव मल्ला के स्कूल में की गई थी। उस स्कूल के लिए जिन्होंने अपनी जमीन दान दी थी वह 2 दिन से वहां पहले ही धरने पर बैठे थे । गांवो से लोगो को लाने के लिए बांध कंपनी ने वहां की कोई व्यवस्था नही की थी। लोग लंबे रास्ते पैदल ही चल कर आये। जनसुनवाई स्थल पर पुलिस का बहुत सारा इंतजाम किया गया था। जनसुनवाई पंडाल में जाने से पहले लोहे के दरवाजे पर ग्रामीणों से नारे की तख्तियां भी लोगों से छीन ली गई थी।
किन्तु आखिर में जनता ने न्याय हासिल किया। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन को धन्यवाद दिया। न्यायोचित निर्णय के लिए जिलाधिकारी डॉ0 आशीष चौहान का आभार प्रकट किया।
यमुना घाटी की सहयोगिनी टोंस नदी से मिलने वाली सुपिन एक छोटी नदी है जिस पर बांध प्रस्तावित है यह पूरा क्षेत्र गोविंद पशु विहार में आता है। कई दशकों से यहां के गांववालो को हॉर्न बजाने तक की पाबंदी है। उच्च कोटि के पर्यटन की संभावनाओं वाले क्षेत्र में सड़क, जंगल के अधिकारों से वंचित लोग अपनी पारंपरिक संस्कृति के साथ जीते हैं। 
आश्चर्य का विषय है की लगभग 8 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने की अनुमति कैसे हो गई? इसी बांध के नीचे नैटवार मोरी बांध के प्रभावित अपनी समस्याओं को लेकर परेशान हैं। इसी बांध क्षेत्र में रहने वाले गुर्जरों को विस्थापन झेलना पड़ रहा है किंतु कोई मुआवजा या पुनर्वास की बात नहीं और वही बांध कंपनी जखोल-साकरी बांध बनाने के लिए आगे आ रही है। 

जिस घाटी में 42% साक्षरता है वहां 650 पन्नों के अंग्रेजी वाले कागजात पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंध योजना व समाजिक आकलन रिपोर्ट दिए गए। जिनमें किसकी कितनी जमीन जा रही है इतना भी जिक्र नहीं है, सुरंग से बर्बाद होने वाले गांवों की तो कोई बात ही नहीं। यह सब तरीके बताते हैं कि बांध कंपनी के लोग देश का, राज्य का, गांव का विकास जैसी बातें करके प्रभावित गांवों से कंपनी सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के पैसे से कुछ सामान बांट कर बांध के लिए झूठी अनापत्ति लेते रहे हैं। जखोल गांव की जमीन भले ही कम जा रही हो किन्तु सुरंग से बर्बादी का आकलन असंभव है।और जिन  गांवो की जमीन  ज्यादा जा रही है उनको भी मात्र जमीन के दाम पर भ्रमित करके और आश्वासन देकर चुप करने की कोशिश की गई है। वन अधिकार कानून 2006 के अंतर्गत बिना कोई अधिकार दिए और यह भ्रम फैलाकर की कानून मात्र आदिवासियों के हक की बात करता है, लोगों से व्यक्तिगत रूप से हस्ताक्षर कराए गए हैं।

पंचेश्वर व रुपालीगाड बांध की जनसुनवाईयो में भी यही किया गया है माटू जन संगठन ने इस पर भी आपत्ति उठाई थी और प्रशासन को जनसुनवाई से पहले ही मिलकर पूरे झूठ से अवगत कराया था किंतु पुरजोर विरोध के बावजूद बंद कमरों में जनसुनवाई की गई। स्थानीय संगठन भी बाहर धरना देते रहे नारेबाजी करते रहे किंतु प्रशासन और बांध कंपनी जनसुनवाई की नाटक पूरा किया।
घाटी के लोगो ने पर्यावरण को बचाने के लिए बांध को नकारा हैं । सरकार को चाहिए कि क्षेत्र के विकास के लिए वन अधिकार कानून 2006 लागू करें। लोगों को जंगल पर अधिकार दें, जीने की मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराए।

राजपाल रावत , गुलाब सिंह, सूरज रावत, रामबीर सिंह, ज्ञान सिंह, बलवीर सिंह, भगवान सिंह, प्रह्लाद सिंह पंवारकेशर सिंह, विमल भाई
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Tuesday, 29 May 2018

Press Note 29 May, 2018



{हिंदी अनुवाद अंग्रेजी के बाद है}

Question is not for or against Dam

 
 No meaning of public hearing without giving information about the dam, Dam company do not want that people know about the truth, ones public hearing happened then no say of people

for video click the link
In Uttarakhnad on 12th June, 2018 a public hearing has been announced for the Jakhol-Sankri hydro electric project (44MW) on Supin River in Yamuna Valley. The hearing has been organised despite the flouting of various legal provisions and ethical codes of conduct, all reminiscent of the infamous Pancheshwar dam public hearing from August, 2017. Legal documents, reports and other documents required for the same are not publicly accessible. There is also no information about the Environment Impact Assessment report, the Social Assessment report and the management plan.

In spite of the Forest Rights Act of 2006, Uttarakhand remains mostly untouched by its legal provisions. In an act of open defiance of the law, the Sub-District Magistrate of the area sent letters asking all village heads to acquire signatures of their villagers to escalate the Jakhol Sankri hydroelectric project. The letter was meant to record people’s objections about the dam, but they were ordered to give their consent.

The villagers who will be affected by the dam have been given no information regarding how much of their land will be taken away from them. These villages are being routinely visited by officials from the Sutlej Jal Vidyut Nigam under the guise of ‘Corporate Social Responsibility’. Along with distributing sewing machines to the villagers amongst other small benefits, the officials have been collecting signatures on blank sheets of paper. In contradiction to the feeling of trust the villagers earlier had for the officials, they are now worried that their signatures will be used for illegal activities.

According to the Environmental Impact Notification 2006, at least a month before any public hearing, the report is to be kept in the District Collectorate, District Industries Department, District Panchayat Office, and Environment Department and Pollution Control Board for the public to read. This is to ensure that people make informed decisions and opinions while addressing the hearing.
How can the people make any decisions regarding it if they haven’t read about the project and its effects on their lives and lands?

We found that villagers had no understanding of a public hearing. They were largely unaware of a hearing’s purpose, process and the paperwork. The affected villages are extremely vulnerable due to these reasons. Even when the heads of the villages are given notices, most of the time they are unable to understand the message. All reports are kept in the District office which is 190 kilometres away from these areas and the Block Office which is 30 kilometres away. Even if villagers spend thousands of rupees in travelling to these areas to gain access to the papers, the paperwork is in English. There is no Hindi translation and nor are the officials at these offices equipped to explain the document to the villagers.

The big question now is that even though the current state of affairs has been presented in front of the State and the Central government, they have paid no attention to it. From the District Administration to the State and the Central government, the people’s concerns are being viewed as anti-dam propaganda.

Why is the government fearful of citizens accessing information?

We met the District Collector of Uttarkashi and he gave us full assurance that he would follow the procedures. He also said that taking the first non-objection is not good. When we met with the member secretary of the Pollution Control Board in Dehradun, he said that he will not do anything beyond the jurisdiction of the board, nor will he make personal suggestions.

The Notification 2006 does not prevent the translation of any government document from English to local languages. This step ensures that documents like the Environment Impact Assessment Report, Management Plan and Social Assessment Report are accessible to everyone. However, in spite of these issues being raised to the Uttarakhand Government for the past 15 years, it has done nothing to make it simpler for its own people. The state government has taken no steps to arm people with information that will make them informed decision-makers.

We have also sent a letter to the Central Environment Ministry along with the District Collector, Uttarkashi District Collector, Pollution Control Board, to register certain demands for the sake of the people and the environment:

  1. All affected village and helmets should be provided the Environment Impact Assessment Report, Management Planning and Social Assessment Report in Hindi. Official and experts should help them understand the documents and the consequences of the dam.
  2. After the above is carried out a minimum of 1 month should be given before the public hearing is organised.
  3. The processes of the Forest Rights Act 2006 should be put into action in the affected areas immediately. They should receive forest rights effective immediately.
  4. The public hearing should be cancelled till further notice in the interest of the people.

Rajpal Rawat, Prahlad Pawar, Kesar Singh Pawar, Vimal Bhai. 


प्रश्न बांध के विरोध या समर्थन का नहीं
बिना कोई जानकारी दिए बांध की जनसुनवाई का कोई अर्थ नहीं, बांध कंपनी नहीं चाहती लोग सच्चाई जाने। एक बार जनसुनवाई हो गई फिर लोगो को बात रखने का कोई क़ानूनी प्रावधान नहीं

उत्तराखंड में यमुना घाटी में सुपिन नदी पर प्रस्तावित जखोल-साकरी जलविद्युत परियोजना, 44 मेगावाट, की जनसुनवाई 12 जून, 2018 को घोषित हुई है। इसमें वही कमियां, वही कानूनी उल्लंघन और नैतिक उल्लंघन की जा रहे हैं जो कि अगस्त 2017 में बहु प्रचारित पंचेश्वर बांध की जनसुनवाई में किये गए। यहां भी लोगों को जनसुनवाई क्यों हो रही है किन कागजो के आधार पर होती है ऐसी कोई जानकारी नहीं। पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, प्रबंध योजना व सामाजिक आकलन रिपोर्ट के बारे में किसी को भी कोई जानकारी नहीं।
वन अधिकार कानून 2006 के अंतर्गत उत्तराखंड में अभी कहीं भी लोगों को अधिकार नहीं दिया गया है। किंतु इस क्षेत्र में उप जिलाधिकारी महोदय ने गांव के प्रधानों को एक पत्र दिया तथा हिदायत भी दी की इसमें सभी गांव वालों के हस्ताक्षर आ जाने चाहिए।इस पत्र जिसमें सभी तरह की अनापत्तियां लोगों से ली जानी है।
प्रभावित ग्रामीणों को यह नहीं मालूम कि किसकी कितनी जमीन परियोजना में जा रही है।  सतलुज जल विद्युत निगम प्रभावित गांवो में कभी सिलाई मशीन बांटना, कभी कुछ और छोटे-मोटे काम "कम्पनी सामाजिक दायित्व" के अंतर्गत कर रही है।लोगों को लगता कि कंपनी हमारे हित में है। मगर उसके साथ ही कम्पनी वाले लोगों से सादे कागजो पर हस्ताक्षर करवाते रहें हैं उससे लोगों को डर है की इन हस्ताक्षरों को न जाने किन कामों में इस्तेमाल  किया जाएगा ? परियोजना के बारे में कोई और जानकारी नहीं है। 
पर्यावरण अधिसूचना 2006 के अनुसार, किसी भी जन सुनवाई से एक महीना पहले रिपोर्ट जनता को पढ़ने के लिए जिलाधीश कार्यालय, जिला उद्योग विभाग, जिला पंचायत कार्यालय, व पर्यावरण विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में रखी जानी होती है। ताकि जनता जनसुनवाई से पहले इन रिपोर्ट्स का अध्ययन करके जनसुनवाई में अपनी राय रख सके।
किंतु बिना बातों को पढ़े लोग अपनी क्या बात कर पाएंगे?
हमने पाया कि लोगों को, जनसुनवाई वास्तव में क्या होती है ? उसके नियम क्या होते हैं ? वो क्या कागजात होते हैं जिनके आधार पर जनसुनवाई होगी? इनके बारे में कुछ नहीं मालूम। इन गांवो में अखबार भी नहीं आता। गांव के प्रधानों को अगर कोई सूचना दे दी गई है तो उसका अर्थ नहीं समझ पाए हैं. फिर ये तमाम कागजात अंग्रेजी में लगभग 190 किलोमीटर दूर जिला कार्यालय में रखें हैं। ब्लॉक कार्यालय भी लगभग 30 किलोमीटर दूर है। यदि किसी तरह लोग सैकड़ों हजारों रुपये खर्च करके इतनी दूर चले भी जाएं तो अंग्रेजी के सैंकड़ों कागजात कैसे पढ़ पाएंगे ? इन कार्यालयों में भी इतनी अंग्रेजी  समझाने की कोई व्यवस्था नहीं है।
यह बहुत बड़ा प्रश्न है राज्य व केंद्र के सामने लाने के बावजूद सरकारे ध्यान नहीं दे रही है । जिला प्रशासन से लेकर राज्य और केंद्र सरकार भी इस मांग को बांध विरोधी गतिविधि मानती है।
 बिना जानकारी जनसुनवाई का मतलब होता है कि भविष्य में लोग अपनी छोटी छोटी मांगों के लिए संघर्ष करते रहते हैं । इसी परियोजना से नीचे निर्माणाधीन नैटवार मोरी परियोजना से प्रभावित आज धरने पर बैठे हैं।सरकारी लोगों को जानकारी देनी से क्यों डरती हैं?
हमने उत्तरकाशी के जिलाधीश को मिलकर पूरी परिस्थिति बताई उन्होंने आश्वासन दिया कि वे  प्रक्रियाओं का पालन करेंगे।  पहले अनापत्ति लेना सही नही। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नए सदस्य सचिव को देहरादून में जब मिले  तो उन्होंने कहा कि बोर्ड की जो जिम्मेदारी दी गई है उसके आगे वे कुछ नहीं करेंगे, ना ही कोई सुझाव अपनी ओर से आकर को देंगे।
2006 की अधिसूचना किसी भी सरकार को अंग्रेजी से स्थानीय भाषा में अनुवाद करने व लोगों को पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, प्रबंध योजना व सामाजिक आकलन रिपोर्ट  की जानकारी समझाने से नहीं रोकती है। किंतु उत्तराखंड सरकार  के साथ पिछले 15 वर्षों से लगातार इन बातों को उठाने और इन बिना जानकारी जनसुनवाई के गलत नतीजों को देखने के बावजूद भी राज्य सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है।
हमने जिलाधीश  हमने उत्तरकाशी जिलाधीश  वह प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के के साथ केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय  को भी  पत्र भेजा हैं और उनसे इन सब परिस्थितियों में जनहित और पर्यावरण हित में यह मांग कि है:--
1- सभी प्रभावित गांवों और तोंको में सक्षम अधिकारी द्वारा विशेषज्ञों द्वारा पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, प्रबंध योजना व सामाजिक आकलन रिपोर्ट हिंदी में उपलब्ध कराई व समझाई जाएं 
2-इस प्रक्रिया के होने के कम से कम 1 महीने बाद ही जनसुनवाई का आयोजन हो।
3- वन अधिकार कानून 2006 के अंतर्गत तुरंत क्षेत्र में प्रक्रिया चालू हो व खासकर प्रभावित क्षेत्र के लोगों को पहले वन अधिकार दिए जाएं।
4- फिलहाल जनहित में अगली सूचना तक जनसुनवाई रद्द की जाए।

राजपाल रावत, प्रहलाद पवार , केसर सिंह पवार , रामबीर,  विमल भाई
 

Monday, 26 March 2018

प्रेस नोट: 26-3-2018


                     पिंडर को अविरल बहने दो




"पिंडर को अविरल बहने दो हमें सुरक्षित रहने दो"  इस नारे के साथ पिंडर घाटी में लोगों ने प्रदर्शन किया । विभिन्न गांव से आए लोगों ने देवाल कस्बे में सरकार के सामने मजबूती से फिर से प्रदर्शन किया। पिंडर घाटी को जो राष्ट्रीय नदी गंगा की एकमात्र सहयोगिनी नदी बची है जिस पर कोई बांध नहीं है उसे वे ऐसे ही अविरल बहती देखना चाहते हैं।

 2010 उसके बाद 2013 की आपदाओं ने घाटी का स्वरूप काफी बदल दिया। थराली कस्बे का एकमात्र पुल जो आर-पार को जोड़ता है वह भी टूट गया था। उस पर मरम्मत करके काम चलाया जा रहा है । देवालचेपड़ुसुनाऊ हो या नारायणबगड़ गांव होसभी जगह नदी का रास्ता बदल गया है।
लोगों का विरोध 2009 की पहली जनसुनवाई से चालू है सरकारों ने 2010 फिर 2011 में धोखे से जनसुनवाई करके परियोजना स्वीकृति की कोशिश की। किंतु अप्रैल 2011 की लोक जनसुनवाई में लोगों ने उसका उत्तर दिया हमें बांध नहीं बल्कि बहती पिंडर गंगा चाहिए।

27 दिसंबर 2011 को विशेषज्ञ आकलन समिति ने जिन मुद्दों को उठाया था उन पर कंपनी ने गंभीरता से न तो काम किया है ना ही उसमें लोगों की भागीदारी है जानकारी का ना दे ना तो बांध कंपनियों की सोची समझी साजिश ही है। हां गांवों में सिलाई मशीन बिजली के खंबे या सौर ऊर्जा के बल्ब बांट कर लोगों को इस भ्रम में डालना कि कंपनी बहुत अच्छा काम करती है। जबकि कंपनी सामाजिक दायित्व के तहत ऐसा करना उनकी जिम्मेदारी है।

सही सर्वे करना सही जानकारी निकालना और लोगों के साथ उसको सांझा करना इस काम में वह हमेशा पीछे हैं । क्योंकि वह जानते हैं कि सुरंग बनने की वजह से  ऊपर के गांवो को नुकसान होगा। देवसारी बांध में पंच प्रयाग डूबेगा पिंडर नदी और उसके लोगों का जीवन दुष्कर होगारोजगार के दावे झूठे सिद्ध होंगे,प्रभावितो का पुनर्वास भी असंभव ही है जमीन तो देंगे नहींजलवायु परिवर्तन के कारण नदियों में पानी की अनिश्चितता है पिछले वर्षों से बर्फ के ग्लेशियर कम हो रहे हैंदेश में ऊर्जा की अधिकता है देश के ऊर्जा मंत्री 2016 में इसकी घोषणा कर चुके हैं इससे संबंधित विद्युत नियामक बोर्ड की रिपोर्ट भी सामने आई है।

बांध की पर्यावरण संबंधी रिपोर्ट व सर्वे 10 वर्ष पुराने हैं जबकि इस बीच 2013 की आपदा के बाद तो खास करके नदी क्षेत्र की परिस्थिति काफी बदल गई है माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अगस्त 2013 के आदेश के बाद  किसी भी बांध की किसी भी तरह की स्वीकृति पर रोक लगी थी।सरकारी में बांध कंपनी इन सभी तथ्यों को नजरअंदाज करके बांध को आगे बढ़ाना चाहती है।

हम सरकार को चुनौती देते हैं कि बांध की पर्यावरण और संबंधी सर्वे दोबारा लोगों के साथ लोगों को साथ लेकर किए जाएं। जिसके बाद लोगों को हिंदी में पूरी जानकारी देकर पुनः खुली  जनसुनवाई का आयोजन किया जाए। 10वर्ष पुरानी आंकड़ों के आधार पर बांध को आगे बढ़ाना गलत होगा। यह भी मुख्य बात है कि अभी घाटी में वन अधिकार कानून 2006 के अंतर्गत किसी को भी वन अधिकार तक नहीं दिया गया है

हम इन सब का सामना करेंगे संघर्ष करेंगे।

दिनेश मिश्रा बलवंत आगरी,  दिनेश पुरोहित ,सुभाष पुरोहितजीवन मिश्रामदन मिश्राकेडी मिश्रामहिपत सिंह कठैतविमल भाई