Wednesday, 24 July 2013

Press Note 24 July, 2013


हिन्दी के लिये कृप्या नीचे देखें

 Yes! Uttarakhand is safe now.
Some recent pictures can be found here. http://goo.gl/oCHi1Z

Uttarakhand is safe now. Tourists can visit many places and break the myth of "Unsafe Uttarakhand". Yes, the disaster has damaged Uttarakhand. Its time to rebuild Uttarakhand. It is true that Uttarakhand lost links like roads and bridges, scarcity of food etc in remote villages, thousands became widows and orphan children, left houses broken and villages washed away. Relief work is going on for that. But in order to make the economy of Uttarakhand stand on its own feet, We feel it is most the need of the hour to invite common people, Pilgrims and Tourists which provides income generation to Hotels, Dharmshalas, Ashrams, Guest Houses, trek guides, porters, small shopkeepers, vendors, taxi owners etc on which lakhs of people depend directly or in directly.
The serenity of Himalayas in Uttarakhand is still intact. Every peak is green now, the mighty Ganga and its source rivers and tributaries are flowing like they always do during this time of monsoon. Road blocks on main roads are removed and occasional landslides are a common phenomenon in this season and the maintenance department takes care of them immediately. So thats not a problem too.
From Rishikesh to Badrinath, road until Govindghat is good and the buses are plying upto Joshimath regularly. One can go to Pandukeshwar, (where Badrinath ji idol is shifted during winter every year). Very few interior roads are still to be built which were broken due to Natural cum Man-made calamity recently. All the five prayags (confluence) namely Devprayag, Rudraprayag, Karnprayag, Nandprayag and Vishnuprayag are in good condition. Road from Rishikesh to Uttarkashi is also fine.
There are many more interesting places in Ganga, Bhagirathi and Alaknanda valleys like Haridwar, Rishikesh, Neelkant, Dehradun, Mussorrie, Almora, Auli, Nainital, Chopta, Karthikswamy, Ukhimath (Kedarnath idol is shifted here now), Tungnath, Gopeshwar, Saptakund, Tapovan, PeepalKoti, Malari, Pokhri, Meyali, Chirbatiya, Dhodital, Dhanolti, Narendranagar, Ranikhet (Almora), Lensdown, Sonprayag, Khirsu, Kanvashram, Guptkashi etc to visit. One can visit and stay nearby. One can also go for trekking. Many tourist organisations and trek guides, porters are waiting for work. They have become unemployed after the the calamity.
Electronic Media has been presenting grave pictures of the flood-time of building collapses etc. But its not the case any more. Cloudbursts are common in Uttarakhand like in all Himalayan regions and they occur in isolated areas. And "Heavy rains" do happens like in every part of the country. Cloudbursts and Heavy rains are not a 'Breaking News'.
We appeal to media to stop showing these old footages. Apart from focusing on relief and reconstruction works, showing the present situation would bring back the common people, Pilgrims and tourists and thus the economy is rebuilt quickly.
We appeal to the government to remove the fear for tourists by presenting the actual picture via Media etc. And keep local administration suitable situation.
We appeal to national and international mainly to comman people, Pilgrims and tourists to comeback again, visit destinations with pristine beauty still intact even after the floods.
Matu Jansangthan is communicating with government and civil society groups to concentrate on this issue along with the relief activities. This step will help in economic rebuilding of Uttarakhand.

Vimalbhai,            Puran Singh Rana,                Brihashraj Tadiyal,                       Krishna Yashwanth
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प्रैस विज्ञप्ति 24, जुलाई 2013
जय उत्तराखंड!!

उत्तराखंड अब सुरक्षित है
ताजातरीन फोटो यहंा देखे http://goo.gl/oCHi1Z

उत्तराखंड अब सुरक्षित है। पर्यटन अब सब जगह घूम सकते हैं और ‘‘असुरक्षित उत्तराखंड‘‘ के भ्रम को तोड़ सकते हैं। आपदा ने उत्तराखंड में बहुत नुकसान किया है। पर अब समय आ गया है उत्तराखंड के पुनर्निर्माण का।
यह सही है कि उत्तराखंड में अन्दरूनी गांवों में पुल सड़कें टूटी है, भोजन की कमी है। हजारों विधवायें हुई हैं, बच्चे अनाथ हुये हैं, घर टूट है, गांव पूरी तरह बह गए। राहतकार्य जारी है। किन्तु उत्तराखंड की आर्थिकी को अपने पैरों खड़ा करने के लिए हमें लगता है कि यह बहुत जरूरी है कि लोग आये, तीर्थयात्री आये, पर्यटक आये। उत्तराखंड के 80 प्रतिशत लोग किसी ना किसी तरह से पर्यटन से जुड़े हैं। इस समय की जरूरत है कि लोगो के आने को बढ़ावा दिया जाए जिससे कि होटलों, धर्मशालाओं, आश्रमों, गेस्ट हाउसों, ट्रैकर्स को, गाडि़यों भारवाहकों, छोटे दुकानदारों, खोमचे वाले, टैक्सी वाले को प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रोजगार मिले।
हिमालय की शांति सुंदरता अभी वैसे ही सुरक्षित है। इन दिनों, हर पहाड़ी चोटी हरी-भरी है। गंगा और उसकी सभी सहायक नादियां हर बार के मानसून मौसमों की तरह ही बह रही है मुख्य सड़कांे से अवरोध हट गये हैं। मानसून में जैसा प्रायः होता भी है की कही थोड़ा अवरोध आता है किन्तु तुरंत रास्ता साफ कर दिया जाता है। जे.सी.बी. रास्ता साफ करने के लिए हर जगह मुस्तैद है। तो वहंा अब कोई समस्या नहीं है।
ऋषिकेश से बद्रीनाथ की सड़क गोविंद घाट तक खुल गई है। जोशीमठ तक बसे चालू है। प्राचीन पांडुकेश्वर गांव भी बहुत सुंदर है। आप वहां जा सकते हैं। इस गांव मंे बद्रीनाथजी सार्दियों में 6 महीने आकर रहते हैं। बहुत थोड़ी सी अंदरूनी सड़के अभी बननी बाकी है। सभी पांचों प्रयाग, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और विष्णुप्रयाग सही स्थिति में है। ऋषिकेश से उत्तरकाशी तक ही सड़क भी अच्छी है। बीच के रास्ते में बहुत स्थान है जहां जाकर रहा जा सकता है। गंगा, भागीरथी व अलकनंदाघाटी में बहुत सारे स्थान ऐसे हैं जहां सुरक्षित रूप से जा कर रहा जा सकता है जैसे हरिद्वार, ऋषिकेश, नीलकंठ, देहरादून, मंसूरी, अल्मोडा, औली, नैनीताल, चोपता, कार्तिकस्वामी, ऊखीमठ (केदारनाथ जी की पूजा आजकल यहीं हो रही है) तुगंनाथ, गोपेश्वर, सप्तकुंड तपोवन, पीपलकोटी, मलारी पोखरी, म्याली चिरबटियां, डोडीताल, धनोल्टी, नरेन्द्रनगर, रानीखेत (अल्मोड़ा) लैंसडाउन, सोनप्रयाग, र्खीसू, कण्वआश्राम, गुप्तकाशी आदि इन सब स्थानों में हिमालय की शांति संुदरता को महसूस करने के लिए जाया जा सकता है। टैªकिंग के लिए भी जा सकते हैं। बहुत सारी पयर्टक ऐजेंसी और टैªकिंग करवाने वाले लोग काम के लिए इंतज़ार कर रहे हैं। ये सब आपदा के बाद बेरोगार हो गये हैं।
विभिन्न चैनल आज भी बाढ़ के समय की फुटेज-फोटो आदि दिखा रहे हैं। जो ताज़ा परिस्थितियों से अलग है आज स्थिति बहुत बदली है उत्तराखंड मंे बादल फटना हिमालय के दूसरे हिस्सों की तरह आम बात है। वो एक छोटे हिस्से में होता है ना कि पूरे उत्तराखंड में। ‘‘भारी वर्षा‘‘ देश के दूसरे हिस्से की तरह ही होती है। बादल फटना और भारी वर्षा कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं है।

हम मीडिया से अपील करते हैं कि वो पुरानी ऐसी फुटेज दिखाना बंद करें। राहत और पुननिर्माण की खबरांे के साथ ताज़ा स्थिति को भी दिखाया जाए ताकि देश की जनता के मन से भय निकले। तीर्थयात्री और पर्यटक भी उत्तराखंड आये। इससे राज्य की आर्थिक स्थिति को तुरंत मजबूती मिल पायेगी।
हम सरकार से अपील करते हैं कि वो भी आज की ताज़ा परिस्थिति को मीडिया के माध्यम से रखें ताकि देश में उत्तराखंड के लिए डर दूर हो।
हम देश-विदेश के लोग खासकर पर्यटकोें व तीर्थयात्रियों से अपील करते हैं कि वो आये। उत्तराखंड की शांत सौंर्दय आपदा के बाद भी सुरक्षित है।
माटू जनसंगठन इस विषय में सरकार और सभी अन्य सामाजिक संगठनों के साथ संपर्क कर रहा है ताकि उत्तराखंड को मात्र राहत की नही वरन् वहंा की आर्थिकी को स्वंय स्फूर्त और मजबूत बनाया जा सके।

विमलभाई,                पूरण सिंह,                    
 बृहर्षराज तडि़याल,                        कृष्ण यशवंत

Monday, 15 July 2013

गंगा को कब्जियायें नहीं 15-7-2013


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Author: 
 विमल भाई

Source: 
 माटू जनसंगठन

उत्तराखंड में आई आपदा ने, जिसे मेधापाटकर जी ने ‘काफी हद तक शासन निर्मित’ करार दिया है, उत्तराखंड का नक्शा बदल दिया है। नदियों पर बने पुल टूटे और रास्ते बदले हैं। अब उत्तराखंड के पुननिर्माण में पिछली सब गलतियों को ध्यान में रखना होगा। दिल्ली जैसे तथाकथित विकास को एक तरफ करके ग्राम आधारित विकास की रणनीति बनानी होगी। केदारनाथ मंदिर निर्माण के साथ उत्तराखंड निर्माण पर ध्यान देना होगा। केदारनाथ मंदिर की स्थापत्य कला को देखे तो मालूम पड़ेगा कि पुराने समय में इंजिनीयरिंग हमसे कहीं आगे थी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री जी का कहना है कि भू-वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की सलाह मंदिर बनाने के लिए ली जाएगी साथ में केदारनाथ यमुनोत्री के लिए पंजीकरण कराने का प्रस्ताव है। पर गंगोत्री और बद्रीनाथ के लिए हमें किसी आपदा का इंतजार नहीं करना चाहिए वहां भी इस समय काफी बर्बादी हुई है। पंजीकरण चारोधाम के लिए अनिर्वाय करना चाहिए।

हमें सरकार के साथ अपनी लापरवाहियों व गलतियों को भी देखना चाहिए। जिस तरह हमने तीर्थयात्रा को पर्यटन और रोमांचकारी पर्यटन में बदला है वो पहाड़ के लिए तो विनाशकारी सिद्ध हुआ है बल्कि तीर्थयात्रियों के लिए स्वयं भी बहुत जोखिम भरा सिद्ध हुआ है। जैसे पर्यटक वैसे ही उनके लिए सुविधाजनक रहन-सहन और बाजार-होटल बनते गए जिसके निर्माण में किसी नियम को नहीं देखा गया। बस रोजगार और विकास के लिए आज खंडहरों में तब्दील हुए किनारे अंधाधुंध निर्माण के रूप में शेष है। इसके लिए किसी नियम का ना होना और सरकार के लोक निर्माण विभाग की पूरी तरह अनुपस्थिति भी इसके लिए दोषी है।

इस त्रासदी के बाद यह बहस भी उठाने का प्रयास हुआ है कि केदारनाथ तक सड़क बनी होती तो सही रहता किंतु जहां सड़कें थी वहां क्या हाल हुआ है? गंगोत्री-बद्रीनाथ में केदारनाथ जैसी तबाही नहीं हुई। बड़ी सड़कों से ही लोग वहां खूब पहुंचे और वही सड़के टूटने के कारण ही दसियों हजार यात्रियों को फंसे रहना पड़ा उनके बचाव की बारी भी केदारनाथ से सब यात्रियों को निकाल लेने के बाद ही आई।

उत्तरकाशी का मर्णिकर्णिका घाट

चारधामों में भी जिस तरह से वहां की पारिस्थितिकी की अनदेखी करके बड़ी-बड़ी संख्या में भक्तों को बुलाकर धार्मिक प्रवचनों, कथाओं आदि का आयोजन किया जाता है वह भी एक बड़ा कारण बना है। गंगोत्री में ज्यादा लोगो के फंसने का कारण वहां एक कथावाचक द्वारा कथा का आयोजन था। इन सबको आस्था से जोड़कर अपने व्यवयाय को बढ़ाने का तरीका है। पायलट बाबा के आश्रम का बड़ा हिस्सा टूटा, भागीरथी घाटी में उत्तरकाशी से ऊपर आश्रम को गंगा जी की छाती पर बनाया गया था। गंगा जी ने इस सब को नकारा है।

चारधाम तीर्थ यात्राओं को पर्यटन में बदलने हवाई जहाज की शुरुआत ने और भी तेज किया है। जिसने स्थानीय लोगों के रोजगार पर भी बहुत बुरा असर डाला है। ध्यान देने की बात है कि केदारनाथ जी में आई आपदा के दिन यात्रियों की संख्या बहुत ज्यादा थी। कारण था की घोड़े-खच्चर वालों की इसके विरोध में दो दिन की हड़ताल थी जो उसी दिन खुली थी।

हेमकुंड की यात्रा को रोमांचकारी यात्रा के रूप में लिया जा रहा है। तीर्थ का भाव कम दिखता है मस्ती का ज्यादा। तेज गति से मोटरसाइकिलों पर जाना इसमें रोमांच की धमक ही दिखती है पर तीर्थयात्रा का भान नजर नहीं आता है। बहुत जल्दी में तीर्थ करने की जरुरत क्यों है? गोविंद घाट पर बहुत सी कारें-मोटरसाइकिले-बसें बही है और काफी अटकी है जिन्हें अब बाद में निकाला गया।

गंगा को पर्यटन का प्रतीक बनाना महज पहाड़ में नहीं बल्कि ऋषिकेश और हरिद्वार में भी दीखता है। यहां होटलों जैसी सुविधाओं वाले आश्रमों की भरमार हो गई है। प्रश्न है कि क्या सफेद धन से इतना कुछ बन सकता है? यहां दोनों तीर्थनगरियों में कुछ आश्रमों और साधु संतो को छोड़ कर शेष आत्मप्रसार वैभव तथा साधारण गृहस्थ से ज्यादा भोग विलासिता के आडम्बर के साथ गंगा जी को शोकेस में रखकर अपने आश्रम में की श्री वृद्धि में लगे हैं। 

उत्तरकाशी में गंगा ने किया तबाही

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेशों में गंगा के किनारों को छोड़ने की 500 मीटर दोनों तरफ बात थी। पहाड़ में 500 मीटर छोड़ना या हटना बहुत ही मुश्किल काम है। पहाड़ में छोटे बाजार जैसे अगस्त्यमुनि, चंद्रापुरी, नारायणबगड़ आदि स्थानीय छोटे व्यापारियों के जीवनयापन का सहारा है। किंतु यहां इन आश्रमों की ऐसी कौन सी मजबूरी है की वे गंगा जी के किनारों से हटने के बजाए नदी के और अंदर अपने आश्रमों को, ईश्वर की मूर्तियों को बना रहे हैं। यदि आप नदी के रास्ते को छोड़ दें तो गंगा से इतना विनाश नहीं होता।

बड़े हो या छोटे सभी जगह नदी नालों ने फिर से सिद्ध कर दिया कि उनको नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। आपको नदियों के लिए रास्ता छोड़ना ही होगा। उन पर कब्जा करना भी गलत होगा। चाहे वो बड़ा-छोटा बांध हो, होटल हो या गुमटी या कोई भी धार्मिक आश्रम। 

पिछले कुछ वर्षों में कावड़ यात्रा, चारधाम यात्रा हेमकुंड सहित की यात्रा में अप्रत्याषित वृद्धि हुई है। जिन धार्मिक संगठनों ने इन्हें बढ़ावा दिया है। उन्होंने भी कभी गंगा जी के स्वास्थ्य को इन यात्राओं से जोड़कर नहीं देखा। आस्था के नाम पर, जिसमें आस्था है उसे ही रौंद दिया। ना यात्रियों की सुरक्षा पर कोई ध्यान दिया गया। सरकार को तो आज हम सब दोष दे ही रहे थे। वैसे सरकार अपने इस गैर जिम्मेदार व्यवहार के लिए, यात्रियों की इतनी परेशिानियों और मौंतों के दोष से सरकार बच नहीं सकती। ठीक है कि अब यात्रियों के पंजीकरण की बात सरकार अधूरे रूप में स्वीकार कर रही है। किंतु क्या लोग भी सोचेंगे करेंगे कि तीर्थों को पर्यटन की दृष्टि से ना देखें ना गंगा को कब्जियायें।

Sunday, 14 July 2013

प्रैस नोटः-14 जुलाई 2013

          जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय
6/6, जंगपुरा बी, मथुरा रोड, नई दिल्ली-14,☏- 011-24374535,

  9818411417,9718479517 jansansad@napm-india.org |



napmindia@gmail.com 1 www.napm-india.org www.jansansad.tumblr.com

फेसबुक और ट्वीटर पर मिले @napmindia

उर्जा की चमक दिखाकर उत्तराखंड को अंधेरे में धकेलना अपराध है।
आतंक प्रकृति का कम, शासक निर्मित अधिक! जरूरी है सही नेतृत्व

(जनआंदोलनों का राष्ट्रीय समंवय (एन0ए0पी0एम0) की ओर से गंगा घाटी में दौरा करने के बाद)

उत्तराखंड ‘देवभूमि‘ को जो तबाही भुगतनी पड़ी है उसकी नींव में जाकर कारण मीमंासा करने वाले किसी को भी विकास के नाम पर हो रही प्राकृतिक के साथ खिलवाड़ और छेड़छाड़ समझे बिना कोई निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।

अपना सबकुछ खो चुके, अलकनंदा के किनारे के, श्रीनगर हो या गोविंदघाट-जोशीमठ के परिवारों ने, न केवल भाई किन्तु बहनों ने भी बताई हमें कहानी कि कैसे बांध परियोजनाओं के लिये बनाई गई सुरंग या बैराजों ने और उसके लिए हो रहे ब्लास्ंिटग और पहाड़ी चट्टान खदाई ने तथा इन निर्माणकार्यो से निकलता मलबा सीधे अलकनंदा-भागीरथी या किसी छोटी-बड़ी उपनदी में फेंकने से और हिमालय से आयी मुलायम गाद से भरकर नदीतल उंचा उठता जा रहा है। इसमें हिमालय से ग्लेशियर के पिघलकर आगे पानी को कई सारे बांधों में पानी होकर छोड़ने से पानी की मात्रा दुगुनी चैगुनी होकर तूफानी बाढ़ आई है।

हिमालय घाटी में एक नहीं, 70 बड़ी जलविद्युत परियोंजनाओं में भागीरथी और अलकनंदा व उसकी सहायक नदियों को एक इंच भी पर्यावरणीय प्रवाह के रूप में न छोड़ना अवैज्ञानिक तो है ही बल्कि नदी को नाले में परिवर्तित करना है इनमें नदी को बांधना चाहने वाली सरकार ने न ही अेकेक परियोजना का पूरा पर्यावरणीय असर अध्ययन किया है। न ही जंगल तथा खेतीपर इन सभी परियोजनाओं के अेकत्रित असर का। जो परियोजनाएं 25 मेगावाट से कम क्षमता की है उनके लिए पर्यावरणीय कानून के तहत् पर्यावरण प्रभाव आंकलन और पर्यावरण प्रबंध योजना भी जरूरी ही नहीं है। यह सब हिमालय की घाटियों से निकली नदियों के लिए बिल्कुल असमर्थनीय है।

माटू जनसंगठन जैसे कानूनी निगरानी एवम् उत्तराखंड की पहाड़ी मेहनतकश जनता के हकों की रक्षा करने में लगे संगठनों ने इन परियोजनाओं पर यहां के लोगों का आक्रोश उजागर किया तो इन जनतांत्रिक, जनवादी विकास के समर्थकों को विकास विरोधी घोषित करने से उन्हीके खिलाफ अपराधी प्रकरण दखिल करने का काम कभी शासन ने कभी ठेकेदारों ने किया। लेकिन पिछले सालों में, गये साल भी और इस साल विशेषतः इनमें से कई जलविद्युत परियोजनाओं पर गंभीर असर हुआ है तथा इन बांधों की सुरंगांे का असर नदी का प्रवाह मोड़ने के, नदी में प्राकृतिक के साथ बांध निर्मित (पानी छोड़ने से) बाढ़ लाने के कारण गाद और मलबा बहाने के कारण मंदाकिनी-अलकनंदा-भागीरथी सहित कई नदी घाटियों में हाहाकर मचाया है। विष्णुप्रयाग परियोजना में जेपी कंपनी ने अपने टरबाईन्स बचाये किन्तु लेकिन गोविंदघाट, पाण्डुकेशर, लाम्बगड़, पिलोना आदि गांवों के घर, होटेल्स, पुल और काॅफी कुछ खेती आदि ध्वस्त कर दिए। बद्रीनाथ व हेमकुंड साहेब के यात्रियों की सैंकड़ों गाडि़यां तक बह गई। साथ ही स्थानीय परिवार हजारों खच्चरों पर, पर्यटन पर जीनेवाले परिवार बेघर बेरोजगार हो गये।

19 छोटी परियोंजनाऐं, अस्सीगंगा की तीन, धौली गंगा पर बनी परियोजना का बड़ा हिस्सा बर्बाद हुआ। विष्णुप्रयाग योजना का बैराज टूट गया। श्रीनगर परियोजना (330 मेगावाट), मनेरीभाली चरण-2, फाटा ब्योंग, सिंगोली-भटवाड़ी आदि जलविद्युत परियोजनाऐं स्वंय प्रभावित हुई और इनसे पर्यावरण और लोगो की बड़ी हानि भी हुई। इसके लिये बांध कंपनियों को जिम्मेदार ठहराना जरूरी है।

एशियाई विकास बैंक की बड़ी सहायता उत्तराखंड के उर्जा क्षेत्र को मिलने पर; उत्तराखंड राज्य बनाने के लिए संघर्ष में रहे लारवों लोगो का सपना ही नहीं, सत्ता से जुड़े नेता, अधिकारी, तंत्रज्ञ, सरकार, कंपनियों की चमकधमक की चाहत ‘उर्जा प्रदेश‘ में प्रतिबिंबित हुई है। इसी का असर आपदा के रूप में आया है। इस बार टिहरी बांध में कुछ पानी समाया लेकिन इसी साल अगली बाढ़ आने पर क्या होगा? इसका जवाब प्रकृति ही दे सकेगी।

देश के 4600 बांधों में आपदा प्रबंध योजना नहीं बनी हैं।                     
देश में एक भी नदी घाटी में निगरानी की योजना नहीं बनी है। यही स्थिति गंगा-भागीरथी-अलकनंदा में और नर्मदा में भी है। साथ ही उत्तराखंड की उर्जा की जरूरत नहीं, तो दिल्ली सहित शहरों- कंपनियों की प्राथमिकता और जरूरत के लिये उत्तराखंड के पहाड़-जंगल-खेती और नदियांे की शोषण करे, यह अन्याय है। उत्तर पर्व भारत में भी इसी प्रकार के अन्याय के खिलाफ संघर्ष जारी है।                              

इस आपदा के बाद जरूरी हैः-                                                                 

1. उत्तराखंड की विकास अवधारण पर संपूर्ण पुनर्विचार करना।                                             
2. उर्जा के प्राकृतिक स्रोतों का विकास सही तकनीक से करना।                                            
3. नदियों को बांधना रोककर, आज तक की योजनाओं के असर और आपदा में योगदान की पूरी जांच।  
4. गंगा, भागीरथी, अलकनंदा घाटियों को संवेदनशील क्षेत्र घोषित करना।                                        
5 उत्तराख्ंाड में वन अधिकार कानून के साथ, विकेंद्रित विकास नियोजन की दिशा में, गांव सभाओं के प्रधिकार को केंद्र में रखकर स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का विकास करना।
6. विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक जैसी विदेशी सहायता को दूर रखना।                                7. स्थानीय तरीके से रोजगार निर्माण।                                                                        
8. पर्यटन और यात्रा पर जीविका पानेे व लोगों को पुनर्वास में जब तक यात्राऐं शुरू नहीं होती तबतक आर्थिक सुरक्षा की योजना केवल परिवारवाद नहीं गांववाद बनाना।                                        
9. राहत में न केवल आज ध्वस्त हुए किन्तु आने वाले दिनों में ध्वस्त होंगे ऐसे मकान खेती व्यवसाय वाले परिवारों को सम्मलित करना।
10. प्रभावित मकानों आदि के ढ़ाचागत स्थायित्व का अध्ययन करना।

इस सबके लिए जरूरी है अस्सल देसी, उत्तराखंडीय नेतृत्व।

-उत्तराखंड के लिए लड़े हुए साथियों ने इसी वक्त डोर सम्हालना जरूरी है। 
-उत्तराखंड की विकास-दिशा व नियोजन पर त्वरित चर्चा-बहस श्रमजीवी तथा बुद्धिजीवीयों में भी होना। 
-पर्यटन विकास भी प्राकृतिक संपदा की रक्षा के साथ संस्था और मात्रा पर अंकुश रखकर, यात्रा करू एंवम् -स्थानिय प्रवृति का ख्याल रखने की क्षमता के अनुरूप ही होना।                                          
-राहत में लगे गैर सरकारी संगठन संस्थाओं में समन्वय के साथ उनकी निगरानी और राहत-पुनर्वास के नियमों का भी ग्राम स्तरीय कार्य के रूप में ही होना।                                                 
-क्या इसके लिए जरूरी नहीं है कि उत्तराखंड का नेतृत्व (राजनीतिक) भी सही जनवादी प्रकृतिप्रेमी-पूंजीवाद-भ्रष्टाचार से मुक्त व्यक्ति और समूह के हाथ में सौंपा जाये?

जनजन से यह सवाल उठना जरूरी है! तत्काल! 

मेधा पाटकर (नर्मदा बचाओं आंदोलन व एन0ए0पी0एम0) विमलभाई एंव पूरण सिंह राणा (माटू जनसंगठन व एन0ए0पी0एम0)  आशुतोष सेन, प्रीती वर्मा, विजय कश्मकर, युवराज गटकल  (नर्मदा बचाओं आंदोलन)



Sunday, 30 June 2013

Press Note- 30-6-2013





The Alaknandaganga  has cleared it's path:
Vishnupyrag HEP (400 MW) collapsed
(see photos after the new)
In the recent flood in Alaknandaganga (near Badrinath Temple). When the waters rose, dam authorities failed to open all the gates of the dam. Due to this, a 2 K.M. long reservoir was formed upstream of the dam. Pressure from the water broke the dam and went on to wipe out the Lambagad Village market.

Some shops in the Lambagadh market were already washed away when water was released unannounced from the dam in 2012. When villagers asked for compensation from dam authorities, dam authorities threatened to file police cases against them.
This year, water from the upper reaches of Alaknandaganga came unannounced and demolished the Vishnupyrag HEP.
This was the first dam to be built under a Private Public Partnership on the Alaknandaganga. This dam has also destroyed Vishunupryag, the confluence of the Dhouliganga and Alaknandaganga. 

We have news that Dams on Mandakini River such as Phata-Buyong HEP and Singoli-Bhatwari HEP badly damaged. Small dams on Madhaymaheshwer and Kali river are also badly damaged. These small dams were funded by Asian Development Bank.

The construction of all these HEPs are responsible for big Damage in the whole Gangavalley.

This incident once again strengthens our argument that the Himalayas cannot support big HEPs or other big structures. The government and planners must understand the floods as an indication from nature and stop the madness of HEPs.

              Vimalbhai      and       Briharshraj Tadiyal
Earlier view of Vishnupryag HEP (400MW), View from downstream 5 June, 2008

Earlier view of Vishnupryag HEP (400MW), View from upstream 20 February, 2012
Destroyed Vishnupryag HEP (400MW), View from the downstream 26 June, 2013

Destroyed Vishnupryag HEP (400MW), View from the upstream 26 June, 2013

Destroyed Vishnupryag HEP (400MW), Alaknandaganga flowing on the left side, made new path for herself. View from the downstream of the dam. 26 June, 2013
Destroyed J. P. company  Vishnupryag HEP (400MW) dam compound, View from the downstream taken on 26 June, 2013

Wednesday, 26 June 2013

26-06-2013 उत्तराखंड से बर्बादी की रिर्पोट-1





श्रीनगर जल विद्युत परियोजना हुई तबाही

...............श्रीनगर से सीताराम बहुगुणा

अलकनन्दा नदी में आयी विनाशकारी बाढ़ ने श्रीनगर में भी अपना तांडव दिखाया। नगर के एक बड़े हिस्से को पूरी तरह से बर्वाद कर दिया। बाढ़ ने एसएसबी अकादमी का परिसर, आईटीआई परिसर बुरी तरह तबाह हो गया। 70 आवासीय भवनों में रहने वाले सौ से अधिक परिवार बेघर हो गये हैं। इन मकानों में दस से बारह फीट तक मिट्टी भर गयी है। घर का कोई भी सामान काम का नहीं रह गया है। 1970 में बेलाकूची की बाढ़़ की रिर्पोटिंग करने वाले वरिष्ठ पत्रकार डा0 उमाशंकर थपलियाल का कहना है कि उस समय भी श्रीनगर में अलकनंदा नदी में लगभग इतना ही उफान था लेकिन तबाही इतनी नहीं हुई थी।
श्रीनगर में मची भीषण तबाही के लिए निर्माणाधीन श्रीनगर जल विद्युत परियोजना जिम्मेदार है। परियोजना का निर्माण करवा रही जीवीके कंपनी ने  डैम साइट कोटेश्वर से किलकिलेश्वर तक नदी किनारे लाखों ट्रक मिट्टी डंप की। इस कारण इस क्षेत्र में नदी की चौड़ाई कम हो गयी। गत 16 एवं 17 जून को आयी बाढ़ ने इस मिट्टी को काटना शुरू किया। जिससेे नदी के जलस्तर में दो मीटर तक की बढ़ोतरी हो गयी। सीमा सुरक्षा बल के परिसर में जहां बाढ़ ने तांडव मचाया वहां श्रीयंत्र टापू से नदी अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर न् आकार में बहती है, और उससे आगे नदी की चैड़ाई अचानक कम हो जाती है। इस कारण उस दिन जब बाढ़ के साथ श्रीनगर परियोजना की मिट्टी आयी तो वह उतनी मात्रा में आगे नहीं जा पायी जितनी की बाढ़ प्रभावित क्षेत्र तक आयी थी। फलस्वरूप पानी के साथ आयी यह मिट्टी एसएसबी, आईटीआई तथा शक्ति विहार क्षेत्र में जमा होने लगी। क्षेत्र से जब बाढ़ का पानी उतरा तो लोगों के होश उड़ गये। इस क्षेत्र के 70 आवासीय भवन एसएसबी अकादमी का आधा क्षेत्र, आईटीआई, खाद्य गोदाम, गैस गोदाम, रेशम फार्म में 12 फीट तक मिट्टी जमा हो गयी। कई आवासीय भवन तो छत तक मिट्टी में समा गये हैं। इन घरों में रहने वाले लोगों की जीवन भर की पूंजी जमीदोज हो गयी।
एक प्रभावित विनोद उनियाल का कहना है कि इस बाढ़ में उनके घर के अंदर कमरों में आठ फीट तक मिट्टी जमा हो गयी है। जीवन भर की कमाई का सारा सामान बर्बाद हो चुका है। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि जीवन अब कैसे चलेगा। शक्ति विहार मोहल्ले में किराना की दुकान से आजीविका चलाने वाले संतोष चन्द्र नौटियाल पर तो इस आपदा की दोहरी मार पड़ी है। मकान के साथ साथ इनकी दुकान का सारा सामान मलबे में दफन हो गया है। जिससे उनके सामने रोजी-रोटी का संकट भी खड़ा हो गया है।
एससबी अकादमी के निदेशक एस0 बंदोपाध्याय की माने तो अकेले अकादमी को लगभग सौ करोड़ का नुकसान हुआ है। इस हिसाब से देखा जाय तो श्रीनगर क्षेत्र में कुल नुकसान का आंकड़ा तीन सौ करोड़ तक जा सकता है।
इसके अलावा देवप्रयाग में भी जलविद्युत परियोजनाओं की मिट्टी से कई सरकारी एवं आवसीय भवन अटे पड़े हैं। श्रीनगर जल विद्युत परियोजना द्वारा नदी किनारे अवैघ रूप डंप की गयी मिट्टी अब गायब है। और नदी क्षेत्र  पूर्व की तरह दिखायी देने लगा है। श्रीकोट में इस तरह की तबाही नहीं हुई वहां भी नदी किनारे बहुत से मकान हैं। दरअसल श्रीकोट के कुछ आगे चैरास झूला पुल से किलकिलेश्वर तक परियोजना की ज्यादातर मिट्टी डंप की गयी थी। इस कारण श्रीकोट इस तबाही से बच गया।
भू-वैज्ञानिक डा0 एस0पी0 सती का कहना है कि उत्तराखंड में बाढ़ से हुई तबाही मे यहां बन रही जल विद्युत परियोजनाओं का बहुत बड़ा हाथ है।
श्रीनगर जल विद्युत परियोजना की पांच लाख घनमीटर मिट्टी अलकनंदा के किनारे डंप की गयी। जब नदी में बाढ़ आयी तो उससे तेजी से यह मिट्टी पानी के संपर्क में आयी और इससे नदी का आकार एकाएक बढ़ गया। क्यों कि यह मिट्टी श्रीनगर के ठीक सामने थी इसलिए यह बाढ़ के कारण श्रीनगर के निचले इलाकों मेें जमा हो गयी और तबाही का कारण बनी।

(देवप्रयाग से लगभग 30 किलोमीटर, अलकनंदागंगा पर बनी 330 मेगावाट की यह परियोजना तमाम पर्यावरणीय शर्तो को दरकिनार करके र्सिफ और र्सिफ राजनैतिक दवाब के कारण आगे बढ़ाई गई है। इसकी जानकारी हम दे सकते है। -विमलभाई)

Monday, 24 June 2013

Press Note:- 24-06-2013

प्रैस विज्ञप्ति                                                      24-6-2013
 प्रस्तावित लखवार बांध के क्षेत्र में उफनती यमुना
पहले ही था बर्बादी को निमंत्रण

15 जून के लगभग उत्तराखण्ड में मानसून के आगमन से पहले ही बर्बादी आई। तीन दिन लगातार बारिश होती रही, नदियां, नाले भयंकर रूप से उफने, पहाड़ सरके, जहां पर कभी मैदान था, जहां पर कभी हरियाली थी, वहां पर अचानक से नये स्त्रोत फूटें, और इन सब के बीच में उत्तराखण्ड में चल रही चार धाम की यात्रा की जोर-शोर की रौनक अचानक एकाएक रूक गयी। हजारों यात्री जगह-जगह फंसें। उनको लाने का काम भी उतनी तेजी से नहीं हो सकता था क्योंकि रास्ता बुरी तरह टूटे थे। किन्तु जितनी तेजी से हो भी सकता था वो नही हुआ। हैलीकॉप्टर ही एक साधन बनता है। किन्तु हर समय देहरादून में हैलिकॉपटरों के लिये तेल की उपलब्धता भी नही रही। 19 से 23 तक का जो सांस लेने का समय सरकार को मिला था उसका पूरा इस्तेमाल नही हो पाया है। अब वर्षा फिर शुरु हो गई है।

सैटेलाईट फोन, तापोलिन यानि प्लास्टिक के हल्की बड़ी चादरें आदि जंहा रास्ते टूटे है वहंा 19 से 23 तक पंहुचाने चाहिये थे जो नही पंहुचाये गये।   मोबाईल टॉवरों को बिजली ना होने की दशा में प्रचुर मात्रा में डीजल तक का प्रबंध सरकार ने नही किया हुआ था। लोगो को इस परिस्थिति में कैसे व्यवहार करना चाहिये ऐसी घोषणा-ब्यान तक सरकार लोगो को पर्चा, टी0वी0 आदि के माध्यम से नही पंहुचा पाई। जो कि राज्य और केन्द्र सरकार की आपदा प्रबंधन योजना की पूरी पोल खोल कर रख देता है।

प्राकृतिक आपदा को तो नही रोका जा सकता था। किन्तु यदि बांध ना होते और नदी का रास्ता हमने खाली छोड़ा होता तो आपदा के बाद हो रही तबाही को काफी कम किया जा सकता था। इस सारे प्रकरण से हमे प्रकृति के संकेत और अपनी गलतियों को समझना होगा। यह समय है हमें पूरी ईमानदारी से गलतियों को समझ कर आगे की योजना बनाने का। यह भी समझना चाहिये की आज जो नुकसान हुआ है उसकी तैयारी सरकार ने ही की थी।

नदी किनारों पर राज्य सरकार की कोई निगरानी नही है। होटलों से लेकर तमाम तरह के मकान आदि बनाने के लिये किसी तरह के किसी नियम का पालन नही किया गया मालूम पड़ता है। 4 से 5 भूकंप जोन वाले क्षेत्र में, नदी के किनारों पर मकान/होटल बनाने की इजाजत किसने दी?

आपदा की पूरी परिस्थिति में राज्य सरकार पंगु और अपने ही राज्य के नागरिको के सामने शर्मसार नजर आई है। ‘सरकार/प्रशासन नही नजर आया‘ यह वाक्य राज्य में आये तीर्थ यात्रियों से लेकर राज्य राज्य हर नागरिक की जबान पर आया है। सरकार जिस आपदा प्रबंधन पर सेमिनार-विदेश यात्रायें करती रही है उसके लिये जमीनी स्तर पर कुछ नही दिखा है। किसी तीर्थ स्थल पर कोई आपात्तकालिन परिस्थिति के मुकाबले गांवों में कोई ट्रेनिंग या बचाव के साधन नही उपलब्ध है। जिससे संपत्ति नुकसान कॉफी हुआ है। ऐसा कोई तंत्र भी विकसित नही किया गया। जबकि तीर्थयात्रियों की सख्ंया प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है।

मैदानी क्षेत्र जैसा ही ढांचागत विकास पहाड़ गलत साबित हुआ है। छोटे राज्य में सत्ता की धरपकड़, आत्मप्रचार और बांध से लेकर कोका कोला कंपनियों की तरफदारी से ही राजनेताओं को फुर्सत नही हो पा रही है कि वे राज्य के सही विकास की ओर ध्यान दें। वे विकास को बड़े ढ़ांचे बनाने तक ही सीमित मानते है।

राज्य के वन विभाग पर भी बड़ा प्रश्न है। बांधों के बनने के समय जलसंग्रहण क्षेत्र में होने वाले वनीकरण, चकबांध आदि का ना होना। भागीरथीगंगा व अलकनंदागंगा अधिक गाद वाली नदी के रुप में जानी जाती है।

चारों की तीर्थ बहुत संवेदनशील इलाको में है। वहंा जिस तरह से निर्माण हुआ है वो केदारनाथ में खतरनाक सिद्ध हुआ है। गंगोत्री-यमुनोत्री के रास्ते टूट गये हैं। हजारों लोग वहंा फंसे थे।

अभी गंगोत्री और बद्रीनाथ से यात्रियों को निकाला जा रहा है। भागीरथीगंगा में उत्तरकाशी शहर में खाने के लंगर लगे है। और उपर रास्ते में स्थानीय लोगो ने व भटवाड़ी से नीचे माटू जनसंगठन के साथियों ने भी यात्रियों को स्थानीय संसाधनों से खाद्य सामग्री मुहैया कराई।

दरअसल चारधाम की तीर्थयात्रा को यात्रा को धर्म के नाम पर पर्यटन में बदल दिया गया है। साधु संत वहंा कथाओं का आयोजन करते है। गंगोत्री में वही कथा सुनने वाले ज्यादा संख्या में फंसे थे। पिछले कुछ वर्षो में चारधाम तीर्थ यात्रा और  हेमकुण्ड साहिब की यात्रा को बढ़ावा खूब दिया गया है, जो लोगो की आमदनी का कुछ साधन भी बनी। किन्तु पर्यटन से आय के नाम पर जो अनियोजित निर्माण, सड़के बनी है उसके कारण यह नुकसान बहुत ज्यादा हुआ है। निर्माण स्वीकृति देने में हुये आर्थिक भ्रष्टाचार को भी नजरअंदाज नही किया जा सकता है। कुछ के फायदे के कारण आज हजारों की जान गई है, हजारों यात्री फंसे पड़े है। स्थानीय लोगो का भविष्य भी बहुत बिगड़ा है। पहले की पैदल यात्रा के स्थान पर हर तीर्थ पर सड़के ले जाना और भयंकर गति से निर्माण ने स्थिति को और बिगाड़ा है।

हिमालय की पारिस्थितिकी बहुत ही नाजुक है। भविष्यवाणी करना असंभव होता है। वैसे भी सरकार के पास इसकी कोई व्यवस्था तक नही है। इस दुर्घटना में यह निकल कर आया है। जो कि खतरनाक सिद्ध हुआ है। 2010 से लगातार उत्तराखंड में बादल फटना, भूस्खलन और बाढ़ आ रही है। किन्तु प्रकृति के इस संदेश को ना समझने की भूल का नतीजा आज सामने है। अभी भी समझना होगा।

विकास (जो कि वास्तव में कुछ ही लोगो का होता है) के नाम पर हम उत्तराखंड के निवासियों की जान और पर्यावरण को कब तक खतरें में डालेगें? और देखे कि लोकसभा के चुनाव का खर्चा इस आपदा में नही निकलना चाहिये।

विमलभाई                                       पूरणसिंह राणा
समंवयक

संलग्नः-उत्तराखंड में 14 से 18 तक तेज वर्षा और बादल फटने पर रिपोर्ट
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तबाही की दांस्ता----


भागीरथीगंगा, अलकनंदागंगा और उनकी सहायक नदियों प्रमुख रुप से अस्सीगंगा, भिलंगना, बिरहीगंगा, मंदाकिनी, पिडंरगंगा नदियों के किनारे के होटल, दुकानें, घर आदि गिरे, पहाड़ दरके, सड़के टूटी जिससे हजारों की संख्या में वाहन बह गये, कई स्थानों पर नदी में तेजी से गाद की मात्रा आई जो बाढ़ के साथ बस्तियों में घुसी, अनियंत्रित तरह से बनी पहाड़ी बस्तियंा बही।
(चूंकि केदारघाटी की चर्चा बहुत आ रही है। इसलिये वहंा के बारे में यहंा नही लिखा है।)
 अलकनंदागंगा से--

बद्रीनाथ के लगभग 55 किलोमीटर नीचे जोशीमठ से अलकनंदा में एक के बाद एक तमाम होटल बह गये, कारें बह गयी गैस सिलैण्डर, टायर टयूब, गाड़ियां नदी में ऐसे बह रही थी जैसे की कागज के खिलौने। इस तरह जोशीमठ के पास में बहुत सारे होटल बह गये। कई-कई मंजिलों के होटल नदी में टूटकर बहते हुए नजर आये।
 बांध कम्पनियों के कारण भी काफी ज्यादा नुकसान हुआ। जैसे की जे0 पी0 की विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना (जविप) के जलाशय के पानी के बहने के कारण लामबगड़ गांव का बाज़ार बह गया।
 अपुष्ट समाचार तो यह भी है कि तपोवन विष्णुगाड जविप की निर्माणाधीन सुरंग में कार्यरत काफी मजदूर भी मारे गये है।
 इसके बाद नीचे विष्णुगाड पीपलकोटी जविप में जो टेस्टिंग सुरंग बनायी गयी थी, उसका समान पूरी तरह से बह गया और सुरंग के अंदर ढेर सारा पत्थर, मलबा रूक गया। इस तरह से सुरंग लगभग बंद हो गयी। हरसारी गांव के लोग जोकि इस सुरंग के उपर रहते हैं महीनों से इस बात को कह रहे थे कि इस ओर विस्फोट की आवाजें आती है, हमारा रहना दूभर हो गया हैं।
 रोज एस0 डी0 एम0 को, डी0 एम0 को बांध कम्पनी को चिटठ्ी फोन होते थे, विश्व बैंक के अधिकारी और बांध कंपनी के अधिकारी को कितनी बार आ चुके थें। मगर कोई नतीजा नहीं निकला। अब गंगा ने नतीजा निकाल दिया।
रुद्रप्रयाग से लेकर केदारनाथ धाम तक पूरी केदार घाटी बादल फटने से भयानक तरह से बर्बाद हुई। जिसका आकलन करना और भरपाई करना मुश्किल है। और सरकार के अब तक आपदा प्रंबधन और लोगो के पुनर्वास के इतिहास को देखते हुये तो असंभव ही लगता है। नदी किनारे बसे अगस्तमुनि, चंद्रापुरी जैसे छोटे पहाड़ी बाजार और शहर समाप्त प्रायः हो गये। मंदाकिनी नदी पर फाटा-ब्योंग और सिंगोली भटवाड़ी जविप को काफी नुकसान हुआ है। केदारघाटी में अन्य जल-विद्युत परियोजनाओं को भी नुकसान पहंुचा है।
पिंडरगंगा घाटी में 8 पैदल पुल बह गये है। चेपड़ो गांव में दलित बस्तियों में नुकसान सहित 12 के लगभग मकान/दुकान बह गये। थराली तहसील से लेकर थराली बजार तक सड़क खत्म हो गई है। थराली पुल के पास की 10 दुकाने समाप्त हो गई और अन्य 25 से 30 दुकानंे काम लायक नही बची है। थराली का मोटर पुल पैदल यात्रा के लायक भी नही बचा है। ज्ञातव्य है कि पिंडरगंगा में थराली प्रमुख बाजार है। पूरी पिडंरगंगा की सड़क बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई है।
अलकनंदागंगा पर बनी श्रीनगर जविप के मलबे ने श्रीनगर शहर में कहर ढाया है। पर्यावरण व वन मंत्रालय ने इस मलबे पर कोई कदम नही उठाया था। सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान में मामला है पर निणर्य सुरक्षित है। बांध बन गया किन्तु नगर जरुर असुरक्षित हो गया। इस बारिश में 70 मकानों समेत सीमा सुरक्षा बल और अनेक अन्य इमारतों में मलबा जम गया है।
देवप्रयाग में निचले हिस्से में कुछ इमारते बही है।
भागीरथीगंगा घाटी से--

भागीरथीगंगा में गंगोत्री से लेकर उत्तरकाशी तक के रास्ते पहले टूटे हुये थे अब और भी खत्म हो गये है। भटवाड़ीगांव पहले भूस्खलन की चपेट में आ चुका था। वहंा का पूरा बाजार समाप्त हो गया था। उनका पुनर्वास आजतक नही हो पाया है।

गंगोत्री से हर्षिल तक पैदल रास्ता बचा है, वहां से लोंगो को हैलिकोप्टर से चिन्यिाली सौड़ तक हैलिकोप्टर और उसके बाद सड़क मार्ग से नीचे रास्ता खुला है। हर्षिल से ऊपर जालन्ध्री गाड और तपोड़ा गाड में बहुत तेजी से पानी आया जिससे वहंा लक्ष्मी नारायण मंदिर के पीछे 30 मिनट की झील बनी और फिर पानी बहा जिससे हर्षिल में दो चार मकान बह गए।

झाला गाँव के पास पानी बहुत तेजी से बड़ा जसपुर व पुरोला की सड़क वह गयी सुक्की गाँव से पहले की सड़क कई किलोमीटर ध्वस्त हो गई। डबराणी से गंगनानी, सुनगर, भटवाड़ी रोड पूरी तरह ध्वस्त हो गया, चडे़ती बाजार में दुकाने व् भटवाड़ीगांव के निचे का हिस्सा बह गया। मल्ला, लता, सेज, गाँव के रास्ते पूरी तरह ध्वस्त हुये है। सेज गाँव के निचे नदी किनारे ‘दिल्ली वालों की धर्मशाला‘ बह गयी। नालोड़ा और डीडसारी का पुल बह गया।

उतरकाशी में राशन की कमी है क्योई कि बहुत सारी दुकाने वह गई लोंगो ने भविष्य की आशंका को देखते हुये राशन कुछ राशन ज्यादा खरीद लिया

उत्तरकाशी के बांई तरफ स्थित जोशियाड़ा क्षेत्र में लगभग 400 मीटर से ज्यादा सड़क से नदी के बीच की सभी इमारतंे भागीरथीगंगा में प्रवाहित हो गई। शेष बचे क्षेत्र में लोगो को मकान खाली करके भागना पड़ा है। जोशियाड़ा क्षेत्र की तबाही की ज्यादा जिम्मेदारी मनेरी-भाली चरण दो जविप की है। जिसके जलाशय के किनारों पर समय रहते कोई सुरक्षा दिवार नही बनाई गई थी।  (3 अगस्त 2012 को अस्सी गंगा में आई बाढ़ के कारण हुये नुकसानों के संदर्भ में भी माटू जनसंगठन ने जो रिपोर्ट ‘आपदा में फायदा‘ निकाली थी उसमें यह चेतावनी दी थी कि अगले मानसून में उत्तरकाशी में फिर नुकसान हो सकता है, जिसकी जिम्मेदार उत्तराखंड जलविद्युत निगम होगी। किन्तु सरकार ने कोई कार्यवाही नही की। अब यह नुकसान हो गया।)

धरासू तक का सारा मलबा टिहरी बांध की झील में समा गया है जिसका जलाशय स्तर 18 जून को 740 मीटर तक पंहुच गया था। पूर्ण जलाशय स्तर 835 मीटर है। मुख्यमंत्री ने टिहरी बांध से बाढ़ रोकने की खुशी प्रकट की। वे यह भूल गये की अभी 3 महीने मानसून और है तथा 2010 में सितंबर में बाढ़ आई थी तब टिहरी बांध का जलाशय केंद्रिय जल आयोग के मापदंडो को दरकिनार करके पूरा भरा हुआ था। कोटेश्वर बांध निर्माण का मलबा जरुर इस बाढ़ ने बहा दिया।

पूरी गंगा घाटी और यमुना घाटी में तेज वर्षा के कारण किसानों के काफी खेत बहे है। यह मौसम धान की रोपाई का था। धान की रोपाई के लिये तैयार किया जाने वाला बीज भी कहीं-कहीं बह गया है। और कहीं-कहीं खेतों में साल भर से इक्टठी की गई गोबर की खाद बह गई है। जिससे उनकी साल भर के लिये चावल की फसल समाप्त हो गई है।
यमुना घाटी की खबरें ज्यादा नही आ पाई है। नुकसान भले की गंगाघाटी के मुकाबले बहुत कम हुआ है। किन्तु काफी लोग वहंा भी बेघर हुये है।

प्रस्तावित लखवार बांध के क्षेत्र में उफनती यमुना को मिलने वाली अगलाड़ नदी मंे तीन दिन की वर्षा ने पैदल पुल को बहा दिया है।

भागीरथीगंगा, अलकनंदागंगा व यमुनाघाटी से................................
 पूरण सिंह राणा, प्रकाश रावत, सीताराम बहुगुणा, बस्सीलाल, बृहषराज तड़ियाल, रमेश, बलवंत आगरी, सुदर्शनसाह असवाल और विमलभाई------------------------------------------------------------------------------------------------------------

आपको इसके बाद अपडेट माटू जनसंगठन के ब्लाग <matuganga.blogspot.in>भी मिलते रहेंगे।   -विमलभाई

Friday, 14 June 2013

गंगा को मारने की नई साज़िश 14-6-2013


Author: 
विमल भाईसैंड्रप द्वारा तैयार की गई आलोचनात्मक टिप्पणी, जिसे माटू के अलावा अन्य कई जन संगठनों ने अनुमोदित किया है, बिंदुवार समिति की रिपोर्ट की बदनीयत, चालाकी और गैरजानकारी का खुलासा करती है। जो जलविद्युत परियोजनाएं भागीरथीगंगा पर रोक दिए गए हैं उन्हें भी निर्माणाधीन की श्रेणी में दिखाया गया है। ऐसे कई उदाहरण इस रिपोर्ट में मिलेंगे जो बताते हैं की समिति ने बांध समर्थन की भूमिका ली है। बांधों की स्थिति बताने वाली सारिणी भी गलत आंकड़ों से भरी है। नदी की लम्बाई का अनुपात भी गलत लगाया गया है। समिति 81 प्रतिशत भागीरथी और 69 प्रतिशत अलकनन्दा को बांधों से प्रभावित कहती है जो कि पूरी तरह से गलत है। 
नापे सौ गज और काटे इंच भी नहीं। प्रधानमंत्री जी बार-बार गंगा के लिए प्रतिबद्धता जताते हैं उनकी पार्टी गंगा रक्षण का दम भरते हुए वोट भी मांगती है। किंतु ज़मीनी स्तर यह नहीं दिखाई देता है। जिसका उदाहरण है हाल ही में गंगाजी पर आई अंतरमंत्रालयी समिति की रिर्पोट। सरकार ने 17 अप्रैल, 2012 को स्वामी सानंद जी के उपवास के समय राष्ट्रीय गंगा नदी प्राधिकरण की बैठक बुलाई थी। तब सानंद जी को सरकार ने एम्स में रखा हुआ था। बैठक में वे नहीं गए उनकी ओर से कुछ संत प्रतिनिधि गए थे। प्रधानमंत्री ने उन्हें अलग से मिलने का वादा किया। बैठक में डब्ल्यू. आई. आई. और आई. आई. टी. आर. की रिपोर्ट के बारे में उठ रही तमाम शंकाओं पर विराम लगाते हुए इन रिर्पोटों को सही ठहराया। इन संत प्रतिनिधियों ने इस पर कुछ कहा हो ऐसी कोई खबर बाहर नहीं आई। बैठक शांति से निबट गई। 15 जून 2012 को सरकार ने चुपचाप से गंगा के लिए चिल्लाने वालों के मुंह में अंतरमंत्रालयी समिति का लड्डू रखा दिया गया। 15 सदस्यों में बिना किसी चयन प्रक्रिया के तीन गैर सरकारी सदस्यों को भी समिति में रखा गया। रिपोर्ट के बीच बांधों के कामों पर भी कोई रोक नहीं लगाई गई थी। समिति की रिपोर्ट आने की कोई समय सीमा नहीं रखी गई थी। समिति को भागीरथी, अलकनन्दा तथा गंगा की अन्य सहायक नदियों पर बांधों के असरों को जांचने और उनको दूर करने के उपाय सुझाने का काम दिया था। जिसका आधार डब्ल्यू. आई. आई. और आई. आई. आर. टी. की रिपोर्टे दी गई थी। इस अंतरमंत्रालयी समिति का माटू जनसंगठन व कुछ अन्य संगठनों ने विरोध किया था। इस बाबत पत्र भी प्रधानमंत्री को लिखा था। समिति के मात्र दो सरकारी सदस्यों ने विवादास्पद श्रीनगर परियोजना से प्रभावित धारी देवी तक की यात्रा की। गैर सरकारी सदस्यों ने इस बीच गंगाघाटी की ना कोई यात्रा की। ना ही इस बाबत कोई बैठक बुलाई। खैर समिति की रिपोर्ट 3-4 महीने में आने के बजाए लगभग 11 महीनों में आ पाई। इस बीच कितने ही बांधों की प्रक्रियाएं आगे बढ़ गई। श्रीनगर परियोजना तो बन भी गई।

रिर्पोट से मालूम पड़ता है कि बहुत तरीके से सरकार ने गंगा के विषय को दबाया है। पहले तो चुपचाप 15 जून 2013 को समिति बनाई और उसकी खबर भी बाहर नहीं की गई। समिति ना तो गंगाघाटी में ज़मीनी स्तर पर कार्यरत संगठनों से नहीं मिली ना ही गंगाघाटी का विस्तृत दौरा किया। समिति से माटू जनसंगठन ने 19 अगस्त को पत्र द्वारा मिलने का समय मांगा था, जो नहीं मिला। जबकि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने 17 जुलाई 2011 के अपने आदेश में समिति को यह निर्देश भी दिया था। समिति मात्र कुछ ही चुनिंदा लोगों से मिली। समिति की रिपोर्ट को भी कुंभ के बाद निकाला गया ताकि कुंभ के जमावड़े का कोई फायदा बांध विरोधियों को न मिल जाए। फिर रिपोर्ट भी जो निकली वो पूरी तरह से बांधों के पक्ष में आ रही बाधाओं को दूर करती है। पर्यावरणीय प्रवाह पर समिति ने किसी भी तरह की कोई परिभाषा नहीं दी है। अवैज्ञानिक व आधारहीन वक्तव्यों से भरी इस रिपोर्ट में जिन छोटी सहायक नदियों के बारे में कहा गया है कि उन पर आगे कोई नया बांध नहीं बनेगा। वे नदियां तो पहले से ही लगभग बांधी जा चुकी हैं या वहां बांध परियोजनाएं निमार्णाधीन हैं।

सरकार ने आज तक इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है। डॉ. भरत झुनझुनवाला के एक मुक़द्दमे में सर्वोच्च न्यायालय में सरकार ने यह रिपोर्ट ज़रूर दाखिल की है। इस तरह समिति के बनने से रिपोर्ट आने तक पूरी गोपनीयता का माहौल बनाए रखा गया है। हां समिति का हवाला देकर गंगा पर बांधों को आगे बढ़ाए जाने की पूरी उम्मीद है। सरकार ने डब्ल्यूआईआई और आईआईटीआर की रिपोर्ट के बाद इस समिति को बनाकर गंगा में पर्यावरणीय प्रवाह के मुद्दे को समाप्त करने की कोशिश की है। वैसे समिति के तीन गैर सरकारी सदस्यों में से वीरभद्र जी का देहावसान बीच में ही हो गया था। सुनीता नारायण जी और राजेन्द्र जी ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। राजेन्द्र जी ने असहमति का पत्र लिखा है। सुनिता जी ने भी एक नोट डाला है किंतु उन्होंने बांधों के वर्गीकरण पर समिति द्वारा अनजाने में सहमति दी है।

सैंड्रप द्वारा तैयार की गई आलोचनात्मक टिप्पणी, जिसे माटू के अलावा अन्य कई जन संगठनों ने अनुमोदित किया है, बिंदुवार समिति की रिपोर्ट की बदनीयत, चालाकी और गैरजानकारी का खुलासा करती है। आईए जरा विस्तृत रूप में इसे समझें। जो जलविद्युत परियोजनाएं (जविप) भागीरथीगंगा पर रोक दिए गए हैं उन्हें भी निर्माणाधीन की श्रेणी में दिखाया गया है। ऐसे कई उदाहरण इस रिपोर्ट में मिलेंगे जो बताते हैं की समिति ने बांध समर्थन की भूमिका ली है। बांधों की स्थिति बताने वाली सारिणी भी गलत आंकड़ों से भरी है। नदी की लम्बाई का अनुपात भी गलत लगाया गया है। समिति 81 प्रतिशत भागीरथी और 69 प्रतिशत अलकनन्दा को बांधों से प्रभावित कहती है जो कि पूरी तरह से गलत है। वास्तव में पूरी नदी या तो सुरंगों में होगी या जलाशयों में। तो समिति कौन से हिस्से के बचने की बात कर रही है? आकंड़ों के खेल ये हैं कि कोटली भेल-2 को बांधों में गिना ही नहीं है। जबकी वो मुख्य गंगा, भागीरथी व अलकनन्दा नदी को डुबाने वाली है। बांधों के बीच की दूरी पर भी दोमुंही बाते हैं। समिति या तो चालाकी पूर्ण या मूर्खता की बात कर रही है, या वो नदी विज्ञान की समझ से पूरी तरह अनजान है। जैसे समिति कहती है कि तकनीकी जरूरत के अनुसार बांधों के बीच की दूरी तय हो। इस तरह समिति ने सभी बांधों को छूट ही दे दी है। बांधों की श्रृंखला होने से जो प्रभाव होता है उनको पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया है। डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट में जिन 24 बांधों को रोकने की बात कही गई थी समिति ने उसे बिना कोई कारण दिए नकारा है। रिपोर्ट में जगह-जगह गंगा घाटी की जैवविविधता, सुंदरता, फूलों की घाटी, नंदादेवी राष्ट्रीय उद्यान आदि का जिक्र है किंतु वहां के बांधों पर रोक की बात नहीं की है।

कोटली भेल-2 की पर्यावरण स्वीकृति रद्द की गई है, और इसके साथ ही अलकनंदा जविप की भी वन स्वीकृति तीन बार रद्द की गई है उसे निर्माणधीन बताना गैरजानकारी नहीं बल्कि बद्नीयत की ओर इशारा करता है। 6 नदियों को अक्षुण्ण रखने की बात मज़ाक से कम नहीं है। इनमें से अस्सी गंगा, बिरही गंगा तो बंध ही चुकी हैं। इस तरह बड़े बांधों को हरी झंडी दी है। मात्र गंगा की बड़ी सहायक नदी पिंडर अभी तक अक्षुण्ण है। जिस पर अभी कोई बांध नहीं है ना ही कोई स्वीकृति मिली है। उस पर समिति का ध्यान नहीं गया। दूसरी 4 नदियों पर भी बांध बने हैं और बन रहे हैं। फिर कौन सी नदी को बचाने की बात समिति ने की है? समझ से परे हैं। फिर इन नदियों पर जविप ना बनने से बिना आधार दिए 400 मेगावाट के हानि की बात भी समिति ने कही है।

समिति साथ ही कहती है कि बांध मितव्ययी और चलाने लायक हो हर हालत में यानि पर्यावरणीय, सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक असरों को एकतरफ करते हुए बांध बनते रहे बस। समिति ने कहीं भी पर्यावरणीय प्रवाह की बात नहीं की है जो की उसका मुख्य काम था समिति कहती है की अविरल धारा पाईप लाईन में भी हो सकती है यानि नदी का अर्थ ही समिति ने नहीं समझा है। समिति रिपोर्ट में सामायिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्षों की बात लगातार कर रही है किंतु वो किन्हीं ऐसे समूहों से नहीं मिली। ना ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को भी देखा जो कहता है की किसी भी नदी को 50 प्रतिशत से ज्यादा नही मोड़ा जा सकता है समिति ने जो महीनेवार प्रवाह की बात कही है वो किसी प्रक्रिया तथ्य आदि पर आधारित नहीं है। पर्यावरणीय प्रवाह की निगरानी भी बांध कंपनी की ज़िम्मेदारी पर छोड़ दिया है और वो भी 25 मेगावाट से ज्यादा की जविप में ही। आप बाघ से बकरी की निगरानी करने को कह रहे हैं। बांधों के पक्ष में समिति ने नया आधारहीन तर्क गढ़ा है की हिमालयी नदियों में मछलियों को कम जलस्तर की जरूरत होती है। जिन परियोजनाओं को कोई पर्यावरणीय और वन स्वीकृति तक नहीं मिली उन्हें भी निमार्णाधीन बताया है। बांधों के पक्ष में यह गलत प्रस्तुतीकरण साज़िश जैसा ही लगता है।

बहुत सारे पर्यावरणीय प्रभावों को समिति ने छुआ तक नहीं है। जैसे पीकिंग पावर उत्पादन यानि आवश्यकता के अनुसार बिजली का उत्पादन जिससे नदी का पानी कभी भी ऊपर नीचे हो सकता है। हर बांध के नीचे नदी पर बड़े-बड़े बोर्डो में लिखा भी है कि नदी का जलस्तर कभी भी 5 से 15 मीटर तक ऊंचा हो सकता है। कृपया नदी किनारे नहीं जाएं। मगर समिति ने यदि क्षेत्र का दौरा किया होता तो ये तथ्य वो समझ पाती डब्ल्यू आई आई, आईआईटीआर की रिपोर्ट को सही सिद्ध करने का एक प्रयास में समिति कहती है की टिहरी को छोड़कर सभी रन ऑफ द रिवर जविप है टिहरी बांध के ठीक नीचे कोटेश्वर उन्हें नहीं दिखा और जिन्हें ऑफ द रीवर कहा गया है उन कोटली भेल की तीनों जविप आदि के जलाशय 33 कि.मी. तक के हैं इस प्रकार के हर बांध के नीचे स्लूस गेट बने हैं जो रेत निकालने के लिए हैं। जबकि डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट भी कहती है की 69 जविप में से 13 जविप जलाशय वाली है। समिति को अलकनन्दा जविप के धारी देवी मंदिर पर असरों को भी देखना था। राजेन्द्र सिंह जी और वीरभद्र मिश्रा जी ने परियोजना में परिवर्तन सुझाए किंतु बिना कोई कारण दिए वे सुझाव अमान्य कर दिए गए। समिति बांधों को सामाजिक असरों पर मौन है जबकि देवसारी व विष्णुगाड पीपलकोटी बांधों में विरोध जारी है।

पर्यावरणीय प्रवाह वर्तमान में कार्यरत जविप के लिए भी समिति ने मान्य करने को कहा है किंतु उसकी कोई प्रक्रिया नहीं बताई है। समिति ने प्रदूषण के प्रमुख विषयों जैसे सहकारिता का अभाव, शहरी पानी और प्रदूषण नियंत्रण में प्रजातांत्रिक सत्ता आदि के बारे में कहा है कि नदी के सभी हिस्सों में प्रवाह लगातार रहना चाहिए। किंतु मात्र यह कह देने से उद्देश्य पूरा नहीं होता। समिति की रिपोर्ट में आपसी चर्चा को कहीं नहीं बताया गया है। बांधों की सूची तक पूरी और सही नहीं है। गंगा के पांचों प्रयागों को सुरक्षित रखने के बारे में भी समिति मौन है। राजेन्द्र सिंह की नोट छोड़ दे तो समिति की रिपोर्ट पूरी तरह बांधों के पक्ष में ही है। बल्कि पर्यावरण मंत्रालय के वर्तमान में स्थापित दिशा निर्देश ज्यादा सही नजर आते हैं। समिति ने यह दिखाने के लिए की उसने कुछ काम किया है। इन दिशा निर्देशों की एक सूची बनाई है। यह समिति बनाना अपने में बहुत बड़ी बात हो सकती थी किंतु गंगा के स्वास्थ्य व पर्यावरण और स्थानीय विकास को निरूपित करने का मौका समिति में गँवा दिया है। यह रिर्पोट मात्र और मात्र गंगा को मारने की नई साज़िश का हिस्सा है। इसे स्वीकार करना मात्र गंगा के लिए ही शर्मनाक बात नहीं होगी वरन यह अन्य नदियों के लिए भी एक खतरनाक मापदंड होगी। मगर शर्म उन्हें नहीं आती।