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विमल भाईज़मीन, संवैधानिक तरीकों और किसान-मज़दूर के अस्तित्व की लूट के खिलाफ देशभर में विरोध की लहर अब तेज हो चुकी है। 24 फरवरी को दिल्ली में हुई जन आन्दोलनों की रैली ने जो आगाज किया था, अब वह गाँव, जिला और राज्य स्तर तक पहुँच चुका है। जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम), अखिल भारतीय वन श्रम जीवी मंच, अखिल भारतीय किसान सभा (अजय भवन), अखिल भारतीय किसान सभा (केनिंग लेन), युवा क्रान्ति, जन संघर्ष समन्वय समिति, छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन, किसान संघर्ष समिति, संयुक्त किसान संघर्ष समिति, इंसाफ, दिल्ली समर्थक समूह, किसान मंच, भारतीय किसान यूनियनों के साथ शहरी गरीब, मछुआरे, आदिवासी, महिला संगठन, जनपक्षधर बुद्धिजीवियों ने मिलकर आगे की रणनीति तय की और इस आन्दोलन को ‘भूमि अधिकार आन्दोलन’ का नाम दिया। सभी ने मिलकर इस भूमि अधिकार आन्दोलन को और अधिक तीव्र करने का निर्णय लिया। इसके तहत देशभर में अलग-अलग जगहों पर विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं और अब सभी 5 मई को दिल्ली में एक विशाल रैली के रूप में आ रहे हैं। किसान-मज़दूर आन्दोलनों की सामूहिक ताकत दिखेगी जन्तर-मन्तर पर। वास्तव में 2104 में नई सरकार ने आते ही जिस तेजी से पर्यावरण की पूरी तरह से अनदेखी करके निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की नीति अपनाई वो बहुत ही अविश्वसनीय सी लगी। अच्छे दिनों का वादा करके आने वाली सरकार ने जिस तरह से बुरे दिनों की शुरुआत का आगाज़ किया वो कल्पना से भी बाहर लगता है। तथाकथित विकास, औद्योगिकीकरण, सार्वजनिक हित के नाम पर बाँधों, नए पोर्ट या शहर, खदानों, जंगलों का आरक्षण या राष्ट्रीय उद्यान व सेंचुरी, कारखानों, सेज आदि से लाखों को उजाड़कर, पहले से उजड़े लोगों को पुनर्वासित न करते हुए जो ‘लाभ’ निकल रहे हैं, वे अधिकांश पूँजीपतियों, सत्ताधीशों को ही मिलने वाले हैं। विस्थापन से समता-न्यायवादी परिवर्तन के बदले, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और गरीबों से लूट, गैरबराबरी और पूँजी-बाजार के कब्जे बढ़ रहे हैं। आज विकास नियोजन में स्थानीय इकाई -ग्रामसभा हो या वार्डसभा- का स्थान, सम्मान व सहभागिता खत्म है। पीढ़ियों की ज़मीन, जंगल, पानी और जीवन प्रणाली छीनने वाली राह पर संवैधानिक अधिकारों को कुचलने के लिये, पुनः अंग्रेजों के ही बनाए भूमि-अधिग्रहण कानून का सहारा लिया जा रहा है। सरकार के मन्त्री जी ने एक टीवी चैनल पर चर्चा में चार गुना मुआवजा देने की गारंटी दी। किन्तु जो अपनी ज़मीन नहीं देना चाहते हैं उनके संरक्षण की कोई बात नहीं कही। 1894 में अंग्रेजों के द्वारा बनाया गया भूमि-अधिग्रहण कानून के खिलाफ बरसों से जन-आन्दोलनों ने बरसों से लड़ाई की थी। ताकि पुराने क़ानूनों में पर्यावरण व जनहितकारी परिवर्तन आ सके। उनको केन्द्र सरकार ने एक ही झटके में लगभग समाप्त करने की कोशिश शुरू कर दी है। बरसों से जन आन्दोलनों की माँग थी कि संविधान के अनुच्छेद 24, पेसा 1996 और वन अधिकार कानून 2006 के आधार पर एक विकेन्द्रित विकास नियोजन कानून बने और सरकार तुरन्त भूमि-अधिग्रहण कानून रद्द करेे। आजादी के बाद भूमि-अधिग्रहण के कारण हुए विस्थापन और पुनर्वास पर एक श्वेत पत्र जारी करे। विस्थापितों एवं जन आन्दोलनों के साथ एक राष्ट्रीय विचार-विमर्श का आयोजन करे। विकेन्द्रित विकास नियोजन कानून पर चर्चा के लिये एक संयुक्त संसदीय स्थायी समिति का गठन करे। एनडीए-2 की सरकार ने ऐसा सारा कुछ तो नहीं पर काफी हद तक भूमि-अधिग्रहण कानून में जनहितकारी बदलाव लाया। यद्यपि यह पूरी तरह से नहीं हो पाया था। पर फिर भी भूमि-अधिग्रहण कानून में सकारात्मक बदलाव था। किन्तु नई सरकार ने देशी-विदेशी कम्पनियों के लिये रास्ता खोलते हुए पुनः अंग्रेजों का ही कानून ला रही है और एनडीए-2 सरकार के समय किए गए बदलाव को पूरी तरह से बदल दिया जा रहा है। भूमि अधिग्रहण के लिये किसानों से सहमति लेने में खतरा है इस बात को कम्पनियाँ बखूबी जानती हैं। दूसरी तरफ भारत ने कम्पनी राज की बेरहम दुनिया को बहुत ही करीब से देखा है, इसलिये कम्पनी राज की सच्चाई को भारतीय जनता से बेहतर और कौन जान सकता है? आज से करीब 300 साल पहले कुछ इसी तरह से एक कम्पनी जो ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के नाम से जानी जाती थी, अपना व्यापार करने के लिये भारत आई थी और 1757 में उसने यहीं पर अपना राज कायम कर लिया। इस कम्पनी ने अपने राज में मुनाफ़ा कमाने के मकसद से यहाँ की पंचायतों को ख़त्म कर दिया और उनकी जगह पर ज़मींदारी प्रथा कायम की। फिर ज़मींदारों के साथ मिलकर के इस देश की जनता पर बेइन्तहाँ जुल्म ढाए। कम्पनी शासन ने किसानों को लूटा, परम्परागत खेती और परम्परागत उद्योग धन्धों को तबाह किया, जंगलों पर से आदिवासियों के परम्परागत अधिकारों को छीना और वनों को काट कर बर्बाद कर डाला था। उस कम्पनी राज में सूखा व बाढ़ की स्थिति में फसलों के नष्ट हो जाने पर भी किसानों को अपना हाड़-माँस बेच कर, बेटी बहन बेच कर लगान चुकानी पड़ती थी। उस समय कम्पनी राज ने देश को दो बड़े अकाल दिए थे जिनमे लाखों के तादाद में लोग काल के गाल में समा गए थे और हजारों भारतीय महिलाएँ अंग्रेजों के भोग विलास की वस्तु बनाने के लिये इंग्लैंड भेज दी गईं थीं। उन अकालों में जहाँ एक ओर लोग भूख से मर रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ़ यहाँ से अनाज व कच्चा माल इंग्लैंड भेजा जा रहा था। भारत के कच्चे माल से ही बिलायत में तैयार कपड़ों व अन्य वस्तुओं को हमारे यहाँ बेचा जाने लगा था। इस वजह से देश से कपड़ा बुनने वाले जुलाहे व अन्य रोज़गार खत्म होते गए। इन सभी अन्याय व अत्याचारों के खिलाफ जब जनता ने आवाज उठाई तो कम्पनी ने गाँव-के-गाँव जलवा दिए थे और-तो-और महिलाओं तथा बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया। सरकार भी यह जानती है कि ज़मीन किसान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आजीविका मुहैया कराती है और मुआवज़ा कभी भी आजीविका का दूसरा विकल्प नहींं हो सकता। सभी यह भी जानते हैं कि जब भारत में कृषि योग्य ज़मीनें व किसान नहीं बचेंगें तो देश की खाद्य सम्प्रभुता भी ख़त्म हो जाएगी और देश खाद्यान्न के मामले ऑस्ट्रेलिया तथा अमेरिका जैसे देशों पर निर्भर हो जाएगा। और समानान्तर रूप में ज़मीन से जुड़े हुए भूमिहीन किसान और खेत मज़दूर, ग्रामीण दस्तकार, छोटे व्यापारी देश के नक़्शे से ही गायब हो जाएँगे। सरकार की कोशिश है कि हर कीमत पर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को ज़मीन पर उतारा जाए क्योंकि वर्तमान दौर में भूमि अधिग्रहण करना कम्पनियों का अस्तित्व बचाने की एक अनिवार्य शर्त है। 5 मई को होने वाली ‘भूमि अधिकार संघर्ष रैली’ इसके ही खिलाफ मजबूत कदम है। | ||||||||||
Friday, 1 May 2015
5 May-2015 भूमि अधिकार संघर्ष रैली
Tuesday, 7 April 2015
Recipe of Environmental Laws
Recipe
of Environmental Laws
Last
year, just after the change in central government, under the blanket
of Ministry of Environment, Forest Climate Change (MOEFCC
- the new name of MOEF makes no difefrence but only speed up
in giving Environment and Forest clearances) a “HIGH LEVEL
COMMITTEE” under the chairmanship of former Cabinet Secretary T.S.R
Subramanian was constituted. Other members of the HCL were Former
Secretary to Government of India Vishwanath Anand, former
Judge of
the High Court, Justice A.K Srivastava and former Additional
Solicitor General of India K.N Bhat.
HCL
review 5 environment laws as Environment (Protection) Act, 1986, the
Forest (Conservation) Act, 1980, the Wildlife (Protection) Act,
1972,
the Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974, and
the
Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981. The Indian
Forest
Act, 1927 was added subsequently to this list.
Amazingly from the day of its constituted 29th August 2014, only in
83 days HCL on 20th November 2014 High Level Committee
submitted its report to the government.
Advocate
Ritwick Dutta
, Shri Manoj Mishra
and Shri Himanshu Thakkar made a
very good critique of
this so called HCL. On 26th March, 2015 “Legal
Initiative for Forest and Environment” was
released the critique ‘High Level
Committee: A recipe for silencing people’s voice and climate
disaster’
Leading
environmental Lawyers like Sanjay Parikh, Raj Panjvani, Rahul Chowdhry with
some environment
activists and others were present in
the meeting.
Ritwick
Dutta: Environmental Lawyer, Legal Initiative for Forest and
Environment, Prof William Lockhart: Emeritus Professor of Law,
University of Utah, Salt Lake City, USA and Manoj Misra:
Yamuna Jiye Abhiyan, New Delhi gave brife presentation on the report
and others were also took part in the discussion. Every one totally
reject this SPEEDY WORK of MOEFCC.
If
the government follow the report then implications will be very bad on environment as well as people of the country.
Now People's Movements have to take the issue as they are agitating on
land Bill 2015.
Vimalbhai
Advocate
Ritwick Dutta presented a pin-point critique of the report which are
give below.
Advocate
Ritwick Dutta presentation:-
The
report liberally quotes from the Isha Upanishad and highlights the
need for ‘transparency’, ‘accountability’, ‘inter
generational equity’ and ‘sustainable development’ one finds
that there is little connection between the stated philosophy and the
recommendations
Consultation?
The
HLC report claims that it had a total of 35 to 40 meetings. This
itself reveals that the HLC itself is not aware of the actual number
of meetings conducted and reflects a casual approach.
RTI
Response shows 30 meetings took place Only 7 meeting with 'civil
society, non-governmental organizations (NGO) in Delhi, Bangalore,
Mangalore, Bhubaneswar and Patna. No meetings in key states such as
Maharashtra, Rajasthan, Chhattisgarh, West Bengal skipped the
environmentally sensitive north-eastern region No records of any
meeting in any form
Introduction
of high-sounding concepts such as ‘utmost good faith’, ‘tree
land trading’, ‘unique identification’ does not hide away from
the fact that the only thrust of the report is to dilute the existing
environmental laws.
Beyond
its Terms of Reference
the
HLC failed to follow its Terms of Reference and in its over
enthusiasm to speedily submit its report has gone over board and
recommended amendments in the Scheduled Tribes and Other Traditional
Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006 and the
National Green Tribunal Act, 2010 – which were not even included in
its Terms of Reference
One
of the specific Terms of Reference for the HLC was to to examine and
take into account various Court orders and judicial pronouncements
with regard to these Acts. The HLC Report does not contain any such
analysis. ..only lists a few environmental cases decided by the
Supreme Court more than 20 years ago.
Where
are the people?
As
you continue reading through the lucid prose, you get that strange
feeling of missing the elephant in the room. Where are the people?
Where are the millions of people who live in forests or mountains or
river valleys and islands or far-flung villages, who are most
affected by shoddy environmental governance?
Missing
impacts
There
is hardly any mention of impacts of destructive projects on forests,
communities and wildlife. The lines are clearly drawn at compensatory
afforestation, raised NPV, monitised afforestation, web-based
monitoring, priced databases, etc.
Speedy
Clearances
In
the 113 page report, the word “speed” in context of speedy
clearances gets repeated thirteen times. As we move from initial
sagacious pages, the emphasis swiftly shifts from concern for
environment to “time consuming clearance processes”.
HLC
is Climate blind
Except
the mention in the name of the commissioning ministry (Ministry of
Environment, Forests & Climate Change), the phrase appears only
twice in the whole report – once in the preamble chapter [where it
says: “We need to take heed of the very recent intergovernmental
Panel on Climate Change (IPCC) call from Copenhagen that the earth is
flirting with danger – the alarm flag has been hoisted”] (para
1.3), and once in the main report (para 7.10.4 (e)), which has
nothing to do with climate change.
Utmost
good faith
No
physical / field verification involving ground truthing and
enumeration needs to be done till stage I approval under Forest
(Conservation) Act, 1980 is obtained. Site visits by the Expert
Appraisal Committee and the Forest Advisory Committees puts
‘unnecessary stress’ on both user agency and official at field
level
The
High Level Committee is truly ‘high level’ - it has displayed a
high level of ignorance about environmental laws, environmental
issues and a high level of disdain for local democratic institutions,
people’s voices and the very values of the environment it says are
“sacrosanct.”
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Friday, 20 February 2015
माटू जनसंगठन का सत्रहवां दस्तावेज़
माटू जनसंगठन का सत्रहवां दस्तावेज़ आपके समक्ष है।
"देवप्रयाग:गंगा जी एक चिंतन"
संक्षेप मे रंगीन चित्रों सहित गंगा के संम्पूर्ण उद्गम स्वरुप को बताने वाले इस दस्तावेज़ के लिये हम ‘’जाह्नवी परिषद्’’ के देवप्रयाग विशेंषाक के ‘जाह्नवी दर्शन‘ के संपादक मंडल के आभारी है।
नई सरकार जो 2014 में गंगा जी के नाम से आई, वह भी गंगा वाली है। अदालतों से परे उसका तो परम कार्य भी गंगा रक्षण होना चाहिये।
गंगाजी का तात्पर्य उत्तराखंड में भागीरथीगंगा व विष्णुपदीगंगा अलकनंदा के पंच प्रयागों में मिलनेवाली पांचों धाराओं के देवप्रयाग में मिलन के साथ पूरा होता है। पंचप्रयाग हैः-
1-विष्णुप्रयाग (अलकनंदा-धौली),
2-नन्दप्रयाग (नंदाकिनी-अलकनंदा),
3-कर्णप्रयाग (पिंडर-अलकनंदा),
4-रूद्रप्रयाग (मंदाकिनी-अलकनंदा),
5-देवप्रयाग (अलकनंदा-भागीरथी)
कही गलती हो तो सुधी पाठक क्षमा करें और बताये।
जय गंगे
दस्तावेज़ छोटा है पर मेहनत से तैयार किया गया है
पुस्तक का आकार- 5.5’’ 8.5 है।
पृष्ठ संख्या-कवर सहित 36
"देवप्रयाग:गंगा जी एक चिंतन"
संक्षेप मे रंगीन चित्रों सहित गंगा के संम्पूर्ण उद्गम स्वरुप को बताने वाले इस दस्तावेज़ के लिये हम ‘’जाह्नवी परिषद्’’ के देवप्रयाग विशेंषाक के ‘जाह्नवी दर्शन‘ के संपादक मंडल के आभारी है।
नई सरकार जो 2014 में गंगा जी के नाम से आई, वह भी गंगा वाली है। अदालतों से परे उसका तो परम कार्य भी गंगा रक्षण होना चाहिये।
गंगाजी का तात्पर्य उत्तराखंड में भागीरथीगंगा व विष्णुपदीगंगा अलकनंदा के पंच प्रयागों में मिलनेवाली पांचों धाराओं के देवप्रयाग में मिलन के साथ पूरा होता है। पंचप्रयाग हैः-
1-विष्णुप्रयाग (अलकनंदा-धौली),
2-नन्दप्रयाग (नंदाकिनी-अलकनंदा),
3-कर्णप्रयाग (पिंडर-अलकनंदा),
4-रूद्रप्रयाग (मंदाकिनी-अलकनंदा),
5-देवप्रयाग (अलकनंदा-भागीरथी)
कही गलती हो तो सुधी पाठक क्षमा करें और बताये।
जय गंगे
दस्तावेज़ छोटा है पर मेहनत से तैयार किया गया है
पुस्तक का आकार- 5.5’’ 8.5 है।
पृष्ठ संख्या-कवर सहित 36
Friday, 12 September 2014
Press Note 12-9-2014-Permission to fill Tehri Dam is completely unjustified
Press
Note 12-9-2014
Permission
to fill Tehri Dam is completely unjustified
We got to know some days before that State Government of Uttarakhand
has given permission to Tehri Hydro Development Corporation with
respect to filling of Tehri Dam is immoral in all forms. We believe,
since the bridges to connect the both side of reservoir of Tehri dam
are not yet constructed and also the basic facilities that were
supposed to be provided at rehabilitation site have also not
completed, in such circumstance, the state government whose
responsibility is to protect rights of displaced population should
not take this step.
Only
after complete rehabilitation should such permission be given by
State Government to any such authority. Matu Jansangathan has been
raising these issues over a long time now. We got to know that in
2002, Central Government gave a letter to the state Government
according to which land in the area of Pathari Part 1, 2, 3, 4 can be
transferred from forest land to peoples land. 12 years since then,
people have faced difficulties due to delay in availability of land
rights is because of the State Government in which all the political
parties are responsible. In such circumstances, the permission of
state government to give THDC permission to fill Tehri Dam is
completely unjustified.
Only
recently, Chinyalisoad bridge drowned because of which 40-50
villages got affected in their regular daily chores of ration,
livelihood, school which is a massive problem. It is a request to
state government to take back this letter from THDC because by this
THDC has got the permission to fully fill the Tehri Dam which is
wrong. It is can be understood that the dam is made to get filed but
without proper rehabilitation, unregulated freedom to Dam Companies
is extremely unjustified.
After
the clearance letter, THDC has no obligation to care anything but of
filling the dam. Since 2006, Honorable Supreme Court has not giving
permission to filling of Tehri Dam to full capacity due to lack of
full rehabilitation facility. Environmental issues have been
completely ignored by authorities, the consequence of which we can
see since 2010.
All
these work are unethical. Tehri Dam is huge HEP not just for
Uttarakhand but for the entire India. Ignoring problems of displaced
population and only concentrating on electricity generation is
completely immoral.
The
state governments first responsibility is to ensure basic facilities
to all cut of area residents and assurance of land rights of all
those people who have been displaced and rehabilitated. Tehri Dam
should be allowed to fill only after above arrangement are made.
Till
every displaced person is given land rights, and all people suffered
due to non-construction of bridges dams and all these issues are
adequately taken care of and resolved, Tehri dam should not be
allowed to fill in full capacity.
Vimalbhai,
Puransingh Rana, Balwantsingh Panwar
Thursday, 21 August 2014
Press Note- 21 अगस्त, 2014
(English translation is after Hindi)
पंचेश्वर बांध परियोजनाः हिमालय में नये खतरे की शुरुआत
नेपाल ने 15.95 करोड़ रुपये पंचेश्वर बांध परियोजना की शुरुआत व्यवस्था के लिये दिये है। अगले एक साल में इस बांध की सारी बाधायें दूर करके शुरुआत कर दी जायेगी ऐसा नेपाल सरकार का कहना है। नेपाल स्थित कंचनपुर के पहले कार्यालय में 6 भारतीय व 6 नेपाली अधिकारी होंगे। क्षतिग्रस्त और नाजुक परिस्थिति वाले हिमालय में यह एक नये खतरे की शुरुआत है।
नेपाल ने यह हिम्मत जुटाई है हमारे प्रधानमंत्री जी कि पहली नेपाल यात्रा के बाद। अपनी पहली नेपाल यात्रा में प्रधानमंत्री जी ने पंचेश्वर बांध परियोजना की शुरुआत का तोहफा नेपाल को दिया। याद रखना चाहिये की माओंवादी सरकार बनने के बाद जब नेपाल के तात्कालिक प्रधानमंत्री श्री प्रचण्ड दहल भारत आये थे तो टिहरी बाँध देखकर बहुत खुश हुए थे और नेपाल में बड़ें बांधों की हिमायत कर बैठे थे। उन्होनंे सिर्फ टिहरी बांध देखा था वे उसमें डूबे शहर और गांवों के लोगों से ना तो मिले, ना ही उनकी समस्याओं से परिचित हुये थेे। इस बार हिमालय के सुंदर देश नेपाल में जब हमारे नये चुने गये प्रधानमंत्रीजी गए तो उन्हंे बड़े बांध बना कर बिजली बेचने की सलाह के साथ, पंचेश्वर बांध परियोजना की शुरुआत की घोषणा भी कर आये है।
किसी छोटे देश में बड़े देश के राष्ट्राध्यक्ष का जाना कोई बड़ी परियोजना की सौगात देना जरुरी जैसा माना जाता है। 1986 में जब रूस के राष्ट्राध्यक्ष र्गोबाचोव जब भारत आये थे तो टिहरी बाँध में उनके देश द्वारा तकनीकी और आर्थिकीय दोनो सहयोग की बात की गई। उत्तराखंड के निवासी, विस्थापितों का पुनर्वास सभंव नही हो पाया है। पर्यावरण की तो अपूर्णीय क्षति हाल में 2013 की आपदा में हम देख ही चुके है।
टिहरी बांध परियोजना के सन्दर्भों में ही इस परियोजना को अगर समझें तो 280 मीटर ऊँची यह बाँध परियोजना मध्य हिमालय का बड़ा हिस्सा डुबाएगी। यहाँ कुछ प्रश्न विचारणीय हैं। टिहरी बाँध जैसी विस्थापन की अनुत्तरित समस्याएं और पर्यावरण का कभी सही नहीं होने वाला विनाश जिसमें हजारों, लाखों पेड़ काटेंगे और डूबेंगे यहंा भी होगा। इसके बारे में प्रकृति को समझने वाले वैज्ञानिक और पर्यावरणविद्ों सहित लोग आंदोंलनकारी करते भी रहे है।
यहाँ विस्थापन और पर्यावरण की उपजने वाली समस्याओं की लम्बी सूची दोहराने की कोई जरुरत नहीं लगती है न जाने कितने टन विस्फोटकों का उपयोग होगा जिससे हिमालय का यह हिस्सा और कमजोर होने वाला है। हमारी समझ यह क्यों नहीं समेट पाती कि एक वर्ष पहले उत्तराखंड में जो त्रासदी हुई उसमे बांधों का बड़ा योगदान रहा है। जहाँ आज भी अलकनंदा पर बने विष्णुप्रयाग बाँध की सुरक्षा दीवारें बहती जा रहीं हैं। जिसमे गुणवत्ता का प्रश्न तो है ही किन्तु किसी न किसी तरह बाँध को पूरा करना और उससे बिजली उत्पादन की जिद्द भी है।
हम सब जानते है कि हिमालय नया पर्वत है इसके पहाड़-पहाड़ियां कच्चें हैं। पंचेश्वर बांध परियोजना भी भूकम्पीय क्षेत्र के अंतर्गत है जो कि खतरे से भरपूर है। बड़े बांधो की पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिपोर्ट बहुत कमजोर बनाई जाती है। नियमों कानूनों की अवहेलना कर मात्र किसी तरह बांध को आगे बढाना की उनका प्रमुख सोच हैं। परियोजना वाले चाहे कोई भी कम्पनी/निगम हो वो जानकारी छुपाते है और परियोजनाओं को विकास के लिये, नये शहरों की बिजली की जरुरतों जबरन लादा जा रहा हेै।
पंचेश्वर बांध परियोजना जिसमें 280 मीटर ऊँचा बाँध प्रस्तावित है क्या-क्या समस्याएं पैदा होंगी उनकी गिनती टिहरी बाँध की समस्याओं का उदाहरण देखकर की जा सकती है। जुलाई 2006 में टिहरी बाँध का उद्घाटन हुआ किन्तु सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश के कारण आज भी टिहरी बाँध पूरी तरह नहीं भरा सका है। टिहरी बाँध के जलाशय के सब ओर के गांव धसक रहे हैं। जिनका भू-गर्भीय परीक्षण कभी ईमानदारी से पूरा नहीं किया गया था। यदि पंचेश्वर बाँध में ऐसा सबकुछ ईमानदारी से किया भी जाने वाला है तो यह बाँध अपने में एक बहुत बड़ा अकल्पनीय समस्याआंे का जनक रहेगा। क्यों इस तथ्य को भूला दिया जा रहा है कि पंचेश्वर बाँध जिस महाकाली नदी पर प्रस्तावित है उसकी प्रमुख सहायक धौली गंगा पर पिछले वर्ष जून 2013 में एनएचपीसी का बाँध बनने के बाद भी आज बर्बाद पड़ा है। साथ ही ऐला तोक जैसे ना जाने कितने रिहायशी इलाकों को भी बर्बाद कर चुका है। सरकारें या नेता बदलने के बाद बातें भी बदल जाती है। टिहरी बांध की समस्याओं को देखते हुये ये तत्तकालीन सरकार ने ये कहा की अब हम टिहरी जैसा बांध और नही बनायेंगे। माटू जनसंगठन ने तब भी यह बात उठाई थी की क्या वे पंचेश्वर बांध परियोजना, यमुना पर किसाउ आदि परियोजना को हमेशा के लिये छोड़ देने की बात कर रहे है? पर इन शब्दों की गारंटी क्या होती है मालूम पड़ गई।
हम क्यों भूल जाते हैं कि प्रकृति सन्देश बार बार देती है और फिर उसके बाद भीषण तबाही लाती है।
हमारे देश का जल संसाधन मंत्रालय बखूबी जानता है कि आजतक किसी भी बाँध में जब प्राकृर्तिक और ंमनुष्य जनित समस्याआंे का समाधान नहीं हुआ तो फिर नए बाँध में कैसे संभव होगा? फिर चूंकि पंचेश्वर बाँध इसी मध्य हिमालय में स्थापित है। इसलिये टिहरी और धौलीगंगा जलविद्युत परियोजनाओं के उदाहरणों को सामने रखना होगा।
हमें नही भूलना चाहियें कि हिमालय में ‘‘विस्थापनहीन-पर्यावरण संरक्षण वाला विकास‘‘ सही व स्थायी विकास मंत्र सिद्ध होगा।
विमलभाई, पूरण सिंह राणा आलोक पंवार
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पंचेश्वर बांध परियोजनाः हिमालय में नये खतरे की शुरुआत
नेपाल ने 15.95 करोड़ रुपये पंचेश्वर बांध परियोजना की शुरुआत व्यवस्था के लिये दिये है। अगले एक साल में इस बांध की सारी बाधायें दूर करके शुरुआत कर दी जायेगी ऐसा नेपाल सरकार का कहना है। नेपाल स्थित कंचनपुर के पहले कार्यालय में 6 भारतीय व 6 नेपाली अधिकारी होंगे। क्षतिग्रस्त और नाजुक परिस्थिति वाले हिमालय में यह एक नये खतरे की शुरुआत है।
नेपाल ने यह हिम्मत जुटाई है हमारे प्रधानमंत्री जी कि पहली नेपाल यात्रा के बाद। अपनी पहली नेपाल यात्रा में प्रधानमंत्री जी ने पंचेश्वर बांध परियोजना की शुरुआत का तोहफा नेपाल को दिया। याद रखना चाहिये की माओंवादी सरकार बनने के बाद जब नेपाल के तात्कालिक प्रधानमंत्री श्री प्रचण्ड दहल भारत आये थे तो टिहरी बाँध देखकर बहुत खुश हुए थे और नेपाल में बड़ें बांधों की हिमायत कर बैठे थे। उन्होनंे सिर्फ टिहरी बांध देखा था वे उसमें डूबे शहर और गांवों के लोगों से ना तो मिले, ना ही उनकी समस्याओं से परिचित हुये थेे। इस बार हिमालय के सुंदर देश नेपाल में जब हमारे नये चुने गये प्रधानमंत्रीजी गए तो उन्हंे बड़े बांध बना कर बिजली बेचने की सलाह के साथ, पंचेश्वर बांध परियोजना की शुरुआत की घोषणा भी कर आये है।
किसी छोटे देश में बड़े देश के राष्ट्राध्यक्ष का जाना कोई बड़ी परियोजना की सौगात देना जरुरी जैसा माना जाता है। 1986 में जब रूस के राष्ट्राध्यक्ष र्गोबाचोव जब भारत आये थे तो टिहरी बाँध में उनके देश द्वारा तकनीकी और आर्थिकीय दोनो सहयोग की बात की गई। उत्तराखंड के निवासी, विस्थापितों का पुनर्वास सभंव नही हो पाया है। पर्यावरण की तो अपूर्णीय क्षति हाल में 2013 की आपदा में हम देख ही चुके है।
टिहरी बांध परियोजना के सन्दर्भों में ही इस परियोजना को अगर समझें तो 280 मीटर ऊँची यह बाँध परियोजना मध्य हिमालय का बड़ा हिस्सा डुबाएगी। यहाँ कुछ प्रश्न विचारणीय हैं। टिहरी बाँध जैसी विस्थापन की अनुत्तरित समस्याएं और पर्यावरण का कभी सही नहीं होने वाला विनाश जिसमें हजारों, लाखों पेड़ काटेंगे और डूबेंगे यहंा भी होगा। इसके बारे में प्रकृति को समझने वाले वैज्ञानिक और पर्यावरणविद्ों सहित लोग आंदोंलनकारी करते भी रहे है।
यहाँ विस्थापन और पर्यावरण की उपजने वाली समस्याओं की लम्बी सूची दोहराने की कोई जरुरत नहीं लगती है न जाने कितने टन विस्फोटकों का उपयोग होगा जिससे हिमालय का यह हिस्सा और कमजोर होने वाला है। हमारी समझ यह क्यों नहीं समेट पाती कि एक वर्ष पहले उत्तराखंड में जो त्रासदी हुई उसमे बांधों का बड़ा योगदान रहा है। जहाँ आज भी अलकनंदा पर बने विष्णुप्रयाग बाँध की सुरक्षा दीवारें बहती जा रहीं हैं। जिसमे गुणवत्ता का प्रश्न तो है ही किन्तु किसी न किसी तरह बाँध को पूरा करना और उससे बिजली उत्पादन की जिद्द भी है।
हम सब जानते है कि हिमालय नया पर्वत है इसके पहाड़-पहाड़ियां कच्चें हैं। पंचेश्वर बांध परियोजना भी भूकम्पीय क्षेत्र के अंतर्गत है जो कि खतरे से भरपूर है। बड़े बांधो की पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिपोर्ट बहुत कमजोर बनाई जाती है। नियमों कानूनों की अवहेलना कर मात्र किसी तरह बांध को आगे बढाना की उनका प्रमुख सोच हैं। परियोजना वाले चाहे कोई भी कम्पनी/निगम हो वो जानकारी छुपाते है और परियोजनाओं को विकास के लिये, नये शहरों की बिजली की जरुरतों जबरन लादा जा रहा हेै।
पंचेश्वर बांध परियोजना जिसमें 280 मीटर ऊँचा बाँध प्रस्तावित है क्या-क्या समस्याएं पैदा होंगी उनकी गिनती टिहरी बाँध की समस्याओं का उदाहरण देखकर की जा सकती है। जुलाई 2006 में टिहरी बाँध का उद्घाटन हुआ किन्तु सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश के कारण आज भी टिहरी बाँध पूरी तरह नहीं भरा सका है। टिहरी बाँध के जलाशय के सब ओर के गांव धसक रहे हैं। जिनका भू-गर्भीय परीक्षण कभी ईमानदारी से पूरा नहीं किया गया था। यदि पंचेश्वर बाँध में ऐसा सबकुछ ईमानदारी से किया भी जाने वाला है तो यह बाँध अपने में एक बहुत बड़ा अकल्पनीय समस्याआंे का जनक रहेगा। क्यों इस तथ्य को भूला दिया जा रहा है कि पंचेश्वर बाँध जिस महाकाली नदी पर प्रस्तावित है उसकी प्रमुख सहायक धौली गंगा पर पिछले वर्ष जून 2013 में एनएचपीसी का बाँध बनने के बाद भी आज बर्बाद पड़ा है। साथ ही ऐला तोक जैसे ना जाने कितने रिहायशी इलाकों को भी बर्बाद कर चुका है। सरकारें या नेता बदलने के बाद बातें भी बदल जाती है। टिहरी बांध की समस्याओं को देखते हुये ये तत्तकालीन सरकार ने ये कहा की अब हम टिहरी जैसा बांध और नही बनायेंगे। माटू जनसंगठन ने तब भी यह बात उठाई थी की क्या वे पंचेश्वर बांध परियोजना, यमुना पर किसाउ आदि परियोजना को हमेशा के लिये छोड़ देने की बात कर रहे है? पर इन शब्दों की गारंटी क्या होती है मालूम पड़ गई।
हम क्यों भूल जाते हैं कि प्रकृति सन्देश बार बार देती है और फिर उसके बाद भीषण तबाही लाती है।
हमारे देश का जल संसाधन मंत्रालय बखूबी जानता है कि आजतक किसी भी बाँध में जब प्राकृर्तिक और ंमनुष्य जनित समस्याआंे का समाधान नहीं हुआ तो फिर नए बाँध में कैसे संभव होगा? फिर चूंकि पंचेश्वर बाँध इसी मध्य हिमालय में स्थापित है। इसलिये टिहरी और धौलीगंगा जलविद्युत परियोजनाओं के उदाहरणों को सामने रखना होगा।
हमें नही भूलना चाहियें कि हिमालय में ‘‘विस्थापनहीन-पर्यावरण संरक्षण वाला विकास‘‘ सही व स्थायी विकास मंत्र सिद्ध होगा।
विमलभाई, पूरण सिंह राणा आलोक पंवार
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Pancheshwar
dam project:
Nepal
has granted an amount of 15.95 crore for starting the Pancheshwar dam
project and seeks to commission the project with all the defects
removed. Initially there will be 6 Indians and 6 Nepali officials in
the office. Office will be in Kanchanpur Nepal. This is nothing but
the start of a new danger in an already dilapidated and precarious
Himalayas.
Nepal
has been able muster this courage only after the visit of our Prime
Minister where he gifted this project to Nepal. It must be
remembered that after the Maoist government came to power in Nepal,
the then Prime minister visited India and having got impressed by the
Tihri dam, he advocated construction of such dams in Nepal as well.
The Nepali prime minister, only saw the dam never met the effected
people or the drowned villages. Recently when Indian prime minister
visited Nepal he advised building of such dams and sale of
electricity and announced the Pancheshwar dam project.
Whenever
the head of government of a big country visits a smaller country,
announcement of big projects is almost customary. Similar
announcement with respect to technical and economic support for Tehri
dam was also announced by Gorbachev from Russia when he visited in
1986. People from Uttarakhand and other displaced people have not yet
been rehabilitated and environment has been damaged beyond repair the
effects of which were already seen in 2013 disaster.
If
the this new project is understood in relation to the Tehri dam
project itself then this 280 meter high project will drown a big area
of central Himalaya. Here some questions must be deliberated.
Unanswered problems of displaced people and irreparable damage to the
environment because of large scale felling of trees will happen here
as well. In this regard environmentalists and other scientists have
been constantly protesting.
It
is not necessary to repeat the long list of damages which may be
caused to the Himalayas and the displaced people due to large scale
use of explosives which will weaken the said area of Himalaya. It is
baffling to see that why we cannot understand that dams had a huge
role to play in the disaster of 2013 in Uttarakhand where the
security walls at Alakhnanda river are flowing away even today where
apart from qualitative issues in the construction of such walls, the
insistence on construction of dams at the earliest and production of
electricity is also there.
We
all know that Himalaya is a new mountain and its rocks are not that
strong. Pancheshwar dam project is also located in the earthquake
prone area which further multiplies the risk. The environment impact
assessment report of such big dams project is also weakly drawn up
and rules are regularly flouted to constructed such dams. Whichever
company is awarded the contract, they hide the information to develop
the project and needs of electricity in towns is given as an excuse
for commissioning of such projects.
What
all problems may arise from the Pancheshwar dam project can be seen
from the damages inflicted by Tehri dam itself. Tehri dam was
inaugurated in July 2006 but because of the directives of the Hon’ble
Supreme Court of India, it has not yet filled to its capacity. All
villages around the reservoirs of Tehri dams are sinking. No
geological examination of these effects were never carried out. Even
if such assessments are examinations are made in the Pancheshwar dam
project, it will still be the cause of several monumental problems in
the region. Why is the fact that NHPC dam constructed in June 2013 on
the major tributary of Mahakali river (on which the project is
proposed) Dhauli Ganga is still lying unused, being ignored. Also it
has already devastated many residential areas like Ela Tok.
After
having seen the problems of Tehri dam, the state government said that
it will not be constructing such dams anymore. Matu Jansangathan had
even then raised the question that whether this should be taken to
mean that Pancheshwar dam project and other similar project will be
shelved forever. But the value of such words is now apparent.
Why
do we forget that fact that nature first gives signals and then
wreaks devastation?
Our
water ministry only knows it too well that if the environmental and
other related problems caused by previous dam project were not solved
then there is no reason to believe that the same will be done with
respect to Pancheshwar dam projects. Therefore since the Pancheshwar
dam project is situated in central Himalayas we will have to present
the examples of Tehri and Dhauliganga projects.
We must not forget
that in Himalayas only such developmental project will be appropriate
and correct which is not accompanied with displacement and
environmental damage.
Vimalbhai, Puransingh Rana, Alok Panwar
Monday, 11 August 2014
गंगाघाटी से 11-08-2014
गंगाघाटी से
Author:
विमल भाई इसके बाद 13 अगस्त 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 15 अक्तूबर को श्री रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जिसका काम मूलतः जून आपदा में गंगा पर बांधों की भूमिका को देखना था। जबकि उच्चतम न्यायालय ने मात्र गंगा घाटी के बांधों के विषय में नहीं कहा था। 13 अगस्त 2013 के आदेश में साफ कहा गया था किः-
पहले से मौजूद, निर्माणाधीन और प्रस्तावित परियोजनाओं के क्षेत्र के पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले संभावित नकारात्मक प्रभावों का विस्तृत अध्ययन करने की आवश्यकता है। हम देख रहे हैं कि कोई उचित आपदा प्रबंधन योजना भी लागू नहीं की गई है, जिसके कारण जीवन और संपत्ति का नुकसान हुआ। इस स्थिति को मद्देनजर रखते हुए, हम निम्नलिखित निर्देश देते हैं -
“हम पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के साथ-साथ उत्तराखंड राज्य को आदेश देते हैं, कि वे इसके अगले आदेश तक, उत्तराखंड में किसी भी जल विद्युत परियोजना के लिए पर्यावरणीय या वन स्वीकृति न दें।’’
यमुना घाटी में, उत्तराखंड के कुमांऊ क्षेत्र में भी नदी घाटी में कार्यरत, बन रही व प्रस्तावित बांध परियोजनाओं के क्षेत्र में भयानक तबाही हुई थी। उत्तराखंड व केन्द्र सरकार ने क्रमशः अलकनंदा गंगा पर विष्णुगाड-पीपलकोटि और यमुना पर लखवार परियोजनाओं को स्वीकृति दी। दोनों पर काम चालू है। अलकनंदा की सहयोगिनी धौलीगंगा पर लाता-तपोवन जलविद्युत परियोजना पर भी चोरी छुपे काम चालू किया गया।
न्यायालय ने रवि चोपड़ा समिति की रिपोर्ट जल्दी मांगी। वन मंत्रालय को जब ये आभास हुआ की यह समिति कुछ सख्त सिफारिशें कर सकती है तो उसने एक नयी समिति बनाई। जबकि यह बात दीगर है कि रवि चोपड़ा समिति में ऐसे भी सदस्य थे जिन्होंने गंगा पर बांधों को स्वीकृति दी थी और बांध कंपनियों द्वारा पर्यावरण उलंघनों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया था।
सर्वाेच्च न्यायालय ने रवि चोपड़ा समिति की रिपोर्ट 28 अप्रैल को दाखिल हुई। मंत्रालय ने दूसरी समिति की भी रिपोर्ट सर्वाेच्च न्यायालय में दाखिल की। अब इसके बाद विभिन्न बांध कंपनियों ने भी उसमें अपनी याचिका दायर की।
इसी बीच भरत झुनझुनवाला ने सर्वाेच्च न्यायालय में लखवार और विष्णुगाड-पीपलकोटि के मामले में अवमानना याचिका दायर की। उच्चतम न्यायालय में मुकदमा चालू हैं। सरकारें बदल गईं मगर 24 मेें से ज्यादातर बांधों का काम माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही रुका।
बांध काम चालू रहने का नतीजा यह होता है कि यदि कोई बांध रोकने का अंतिम निर्णय होता भी है तो कंपनियां कह देती हैं कि अब तो बांध बहुत आगे तक बन गया है इसीलिए इसे रोकना संभव नहीं है।
हाल ही में आई आपदा में उत्तराखंड के लोगों की आर्थिक व्यवस्था को चरमरा दिया तिस पर चार धाम यात्रा भी बहुत कमजोर चल रही है। जून 2013 की आपदा से घबराई हुई सरकार थोड़ा-सा कुछ भी होने पर यात्रा रोक रही है ऐसे में बाँध कंपनियों द्वारा बांध मरम्मत के कामों में स्थानीय लोगों को ठेके मिलना बहुत बड़ी बात है। बांध कंपनियों के लिए थोड़े से ठेके देकर बांध का विरोध बंद करना बड़ी जीत है।
उदाहरण के लिए अलकनंदागंगा पर कार्यरत विष्णुप्रयाग बांध के दरवाजे 16-17 जून 2013 की रात न खुलना नीचे के कई गांवों में नुकसान और हेमकुंड साहेब जाने का रास्ता टूटने का कारण रहा है। अब बांध कंपनी ने मरम्मत के कामों में क्योंकि लामबगड़ और पांडुकेश्वर गांव के लोगों को कुछ काम दिया है इसीलिए गांव के लोग बांध कंपनी की किसी भी गलती पर नहीं बोल सकते। ये स्थिति अपने में बहुत भयानक है।
हाल ही में 12-13 जून 2014 की रात को जेपी कंपनी द्वारा बहाए गए मलबे के कारण पानी में जो भारीपन आया उससे गोविंदघाट पर बना नया पुल जो हेमकुंड साहेब की यात्रा के लिए महत्वपूर्ण है, बह गया किंतु इस बात को गांव के लोग कैसे बोलें?
विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना को सर्वाेच्च न्यायालय के 13 अगस्त 2013 के आदेश का उल्लंघन करते हुए राज्य सरकार ने वन स्वीकृति दी। नतीजा बांध कंपनी गांव में पुलिस के साथ घुसकर पुलिस के बल पर उनकी स्वीकृति लेने की कोशिश कर रही है जो बांध के खिलाफ उठते संघर्ष को कुचलने तरीका है।
इतिहास बताता है कि टिहरी बांध और दूसरे बांधों के उदाहरण हमारे सामने हैं जिनके मुकदमें अभी भी लोगों पर चालू हैं। अदालती आदेशों का उल्लंघन करते हुए स्वीकृतियां दी जाती हैं और कंपनियां बांध कार्य को आगे बढ़ाती हैं।
सरकार और बांध कंपनियों द्वारा साठ-गांठ से इंकार नहीं किया जा सकता। चूंकि बांध के रोकने की बात कहते ही ऊर्जा संकट का प्रश्न खड़ा कर दिया जाता है और फिर विकास और ऊर्जा के लिए सब जायज मान लिया जाता है। गंगा मंथन के इस दौर में बांध मंथन कब चालू होगा?
Sunday, 3 August 2014
गंगा का बजट मंथन 8-8-2014
गंगा का बजट मंथन
Author:
विमल भाई
गंगा
की अविरलता और निर्मलता की ये कोई नई शुरुआत नहीं है। चूंकि गंगा सफाई का
मुद्दा बड़ी परियोजना और पूंजीगत निवेश का है। इसीलिए उस पर खूब योजना
बनेगी। परिवहन के लिए गंगा जी को खूब खोदा जाना भी एक अच्छा व्यवसाय है।
फिर हर सौ किलोमीटर पर बैराज बनना, उठने गिरने वाले पुलों का बनना ताकि
मालवाही जहाज आ-जा सके। यह सब एक नए व्यवसाय की शुरुआत है जिसे नितिन गडकरी
ने स्पष्ट तरीके से कहा है और उमा जी ने बहुत उत्साह के साथ इस विकास को
आंदोलन बनाए जाना स्वीकार किया है।
उमा जी ने बहुत आस्था और भावना के
साथ राष्ट्रीय गंगा मंथन का आयोजन किया और उनका कहना था मोदी जी का नारा है
हम विकास को आंदोलन बनाएंगे। किंतु नितिन गडकरी (केंद्रीय परिवहन मंत्री)
ने जो पूरे समय गंगा मंथन में उमा जी के साथ थे उन्होंने बार-बार कहा कि
गंगा पर हर सौ किलोमीटर पर बैराज होंगे। परिवहन के लिए नदी-रास्ता सस्ता है वे गंगा के पानी की सफाई और उसे वापस नदी में ना डालने पर जोर देते रहे। उनका बार-बार जोर था कि वे नीदरलैंड, हॉलैंड, रूस के विशेषज्ञों को बुला रहे हैं। गंगा की खुदाई होगी। सफाई का काम तेजी से शुरू होगा। उनकी कही बात सरकारी बजट में भी परिलक्षित हुई है।
मोदी सरकार ने आते ही गंगा पर नया मंत्रालय और बड़ा सम्मेलन और बजट में गंगा सफाई के लिए पैसे का आबंटन किया। यह सब जिस तेजी से हुआ है उसने गंगा को पुनः राष्ट्रीय एजेंडे पर ला दिया है बरसों से स्व. राजीव गांधी का चलने वाला गंगा एक्शन प्लान और यूपीए सरकार का गंगा प्राधिकरण भूली-सी बात लगने लगा।
किंतु उमा जी जो गंगा समग्र के साथ भाजपा में पुनः दाखिल हुई जिन्होंने गंगा के किनारे-किनारे पूरी यात्रा तक की। वे सभी इस पूरे गंगा मंथन में गंगा के स्रोत को लगभग भूल ही गईं। पूछने पर भी गंगा पर बन रहे बांधों के विषय में बात टाल गए।
एक पत्रकार को उन्होंने एक भोला सा जवाब दिया कि अब नई तकनीक सहारे गंगा पर बन रहे बांधों के साथ भी गंगा अविरल रह सकती है। उनकी समझ में यह क्यों नहीं आता कि गंगा पर बांध का प्रश्न मात्र थोड़े से गंगा जल को किसी पाइप लाइन के सहारे बहाना नहीं है। वरन गंगा घाटी की पूरी जैव विविधता, पर्यावास, पारिस्थितिकी, गंगा का जल संग्रहण क्षेत्र का रख रखाव, बांध से उजड़े लोगों का पुनर्वास, गंगा घाटी का भू-विज्ञान सब कुछ गंगा की अविरलता से जुड़ा है।
आप इसको एक भावनात्मक मुद्दा बनाकर साधू संतों और तमाम तरह के हजारों लोगों को एक ही दिन में एक साथ बिठाकर समझ नहीं सकते और देखा जाए तो वे गंगा से जुड़े विषयों को भली भांति जानती है। उसके लिए सिर्फ सच्ची राजनैतिक इच्छा शक्ति की जरुरत है। गंगा अविरलता शब्द की सरकारी नई परिभाषा समझ से परे है।
गंगा की अविरलता और निर्मलता की ये कोई नई शुरुआत नहीं है। चूंकि गंगा सफाई का मुद्दा बड़ी परियोजना और पूंजीगत निवेश का है। इसीलिए उस पर खूब योजना बनेगी। परिवहन के लिए गंगा जी को खूब खोदा जाना भी एक अच्छा व्यवसाय है। फिर हर सौ किलोमीटर पर बैराज बनना, उठने गिरने वाले पुलों का बनना ताकि मालवाही जहाज आ-जा सके। यह सब एक नए व्यवसाय की शुरुआत है जिसे नितिन गडकरी ने स्पष्ट तरीके से कहा है और उमा जी ने बहुत उत्साह के साथ इस विकास को आंदोलन बनाए जाना स्वीकार किया है।
इससे जाहिर है कि वे गंगा की आस्था को लेकर या तो स्वयं भ्रम में हैं या जनता को भ्रम में डाला जा रहा है। गंगा को बार-बार साबरमती नदी जैसा साफ करने का जो सपना दिखाया जा रहा है उसकी सच्चाई बहुत अलग है। साबरमती अहमदाबाद शहर की शुरुआत से अंत तक साढ़े दस किलोमीटर नर्मदा में बन रहे सरदार सरोवर बांध में लाखों को उजाड़कर बन रहे सरदार सरोवर से जो पानी कच्छ सौराष्ट्र जाना था वो पानी मात्र अहमदाबाद के किनारे साबरमती में बहाया जा रहा है।
शहर के बाद साबरमती वैसी ही है जैसी हमारी दिल्ली में बहती यमुना। जुलाई के पहले हफ्ते में जाहिर, तीन बरसों के अध्ययन के बाद केंद्रीय जल आयोग की रिर्पोट भी यह बताती है कि साबरमती सहित गुजरात की 16 नदियों में खतरनाक जहरीले तत्व बह रहे हैं।
नई सरकार के बजट में पर्यटन के नाम पर केदारनाथ का जिक्र है यह सरकारी अदूरदर्शिता को बताता है कि उत्तराखंड में आपदा अब 2014 में फिर आई है जब वहां तीर्थ यात्रियों की संख्या नगण्य है। गंगा घाटी से सदियों से रहते आए पुत्र पुत्रियों की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो रही है जिसका जिक्र अब कहीं नहीं है। गंगा घाटी के विकास की कोई योजना नही। मैदान के लोगों को इसकी कोई चिंता भी नही। किंतु हमारी अपेक्षा तो है।
बजट में एक नए हिमालय संस्थान की बात भी की गई है। किंतु जो आजतक विभिन्न संस्थानों पर्यावरणविदों ने हिमालय रक्षण की बातें कहीं हैं उनका अनुपालन ही हो जाए तो भी हिमालय काफी बच जाएगा। गंगा पर नए कानून की बात सरकार ने कही है। क्या पुराने पर्यावरणीय कानूनों पर कोई इच्छाशक्ति व्यक्त की गई? इसी संदर्भ में नए पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मंत्री बनते ही जो पहला काम किया उसमें परियोजनाओं को ऑनलाइन स्वीकृति देना शामिल है। किंतु क्या पर्यावरण का घोर उलंघन करते हुए स्थानीय जनता को पुलिस का भय दिखाकर बांध बनाने वाली कंपनियों की जांच के लिए एक भी शब्द कहा क्या?
बांधों के विषय पर सरकार बोलने से इतना डरती क्यों है? जैसे नए बैराज बनाने के लिए राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ बैठने का आयोजन अलग से करने की प्रतिबद्धता और क्रियान्वयन हो रहा है वैसा गंगा पर बांधों के संदर्भ में क्यों नहीं?
गंगा को अविरल और निर्मल रखने की घोषणा कोई भी करता है तो उसे सबसे पहले गंगा के मायके के पुत्र पुत्रियों की समस्या का निदान करना होगा बिना गंगा के स्रोत को संभालने और गंगा को प्राकृतिक रूप में छोड़े अविरलता निर्मलता थोथी साबित होंगी।
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