Tuesday, 30 April 2013

मशविरे का नाटक बंद करो 30-4-2013

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मशविरे का नाटक बंद करो

Author: 
विमल भाई
Source: 
माटू जनसंगठन
आईएफसी द्वारा वित्त पोषित जीएमआर कम्पनी के ताप परियोजना प्रभावित, पास्को से लेकर तमाम परियोजना प्रभावितों ने प्रदर्शन किया। मगर इसके बावजूद भी विश्व बैंक ने इस सारे विरोध को चर्चा का हिस्सा मानते हुए आगे बढ़ने की बात कही है जो फिर एक बार यह सिद्ध करता है कि विश्व बैंक तथा कथित विकास परियोजना के नाम पर पूंजीवादी देशों के हितों को साधने का ही औजार है। यह सब तौर तरीके बताते हैं कि वास्तव में विश्वबैंक की पर्यावरण और रक्षात्मक नीतियाँ उसकी वास्तविक कामों में कहीं कोई स्थान नहीं रखती है। मात्र एक सुंदर आवरण है।विश्वबैंक ने पर्यावरण और सामाजिक संदर्भ में अपनी कुछ नीतियाँ बनाई हुई। जिसे वो पर्यावरण और पुर्नवास रक्षात्मक नीतियों का नाम देता है। 1992 में नर्मदा घाटी से भगाए जाने के बाद जलविद्युत परियोजना में 15 वर्ष तक बैंक ने किसी बांध को पैसा नहीं दिया। अब कुछ वर्षों से धीरे-धीरे बांध परियोजनाओं में पैसा लगाना शुरू कर रहा है। उसकी दलील है कि उस पर भारत के निदेशक का दबाव है। विश्व बैंक में हर साझेदार देश का एक निदेशक होता है। हिमाचल में रामपुर जलविद्युत परियोजना के बाद अब उत्तराखंड में अलकनंदागंगा पर विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना में उधार दे रहा है। विश्वबैंक जिस भी परियोजना में पैसा उधार देता है वहां पर्यावरण व सामाजिक प्रभावों के तथाकथित ऊंचे मानकों को दिखाने की कोशिश करता है। पर्यावरण व सामाजिक प्रभावों के संदर्भ में विश्वबैंक समय-समय पर अपनी रक्षात्मक नीतियों को ऊंचा बनाने का दिखावा करता है। इस समय बैंक की यही प्रक्रिया चल रही है। इसमें आठ पर्यावरण और सामाजिक रक्षात्मक नीतियों पर पुनर्विचार में का प्रस्ताव है जिसमें पर्यावरण आकलन प्राकृतिक रहवास, रोग प्रबंध, आदिवासी लोग, भौतिक-सांस्कृतिक संसाधन, अनैक्षिक विस्थापन, वन, बांध सुरक्षा और पर्यावरण व समाजिक सुरक्षात्मक नीतियों के लिए एक प्रक्रिया बनाना शामिल है। यह बताया गया कि बैंक इन मशविरा बैठकों के बाद आंतरिक विमर्शों और मशविरों का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विमर्शों का दौर चलाएगा

5 अप्रैल को दिल्ली, 8 अप्रैल को बंगलोर और 10 अप्रैल भुवनेश्वर में बैंक ने इस संदर्भ में तीन मशविरा बैठकें बुलाई। जिसमें उसका इरादा ‘‘सिविल सोसाइटी‘‘ से चर्चा करने का था। इससे साफ झलकता है कि बैंक परियोजना प्रभावितों और उनके सहयोगी संगठनों को ना सुनना चाहता है ना ही समस्याओं के निदान के लिए गंभीर है। इसलिए बैंक पोषित विभिन्न परियोजनाओं के प्रभावितों और उनके सहयोगी संगठनों ने इन मशविरा बैठकों का विरोध किया। जिसकी शुरुआत दिल्ली में आयोजित भारत की पहली मशविरा बैठक से प्रारंभ हुई। जनआंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय और दिल्ली समर्थक समूह द्वारा आयोजित प्रदर्शन में आंदोलनकारी 5 अप्रैल को इंडिया हैबिटेट सेंटर के हाल में बैठक स्थल में घुस गए और नारे लगाए विश्व बैंक भारत छोड़ो, मशविदे का नाटक बंद करो, पुराना हिसाब साफ करो और साथ ही वे मंच के आगे जाकर खड़े हो गए। उन्होंने उपस्थित लोगों से निवेदन किया कि वे हाल छोड़ दें। जिसमें विश्वबैंक के कुछ सलाहकार व कुछ नए आमंत्रित और तथाकथित सभ्य समाज के प्रतिनिधियों थे। एक आमंत्रक ने कहा कि यह मर्यादा के खिलाफ है विश्वबैंक हमारा मेहमान है और हमें उनकी सुननी चाहिए। जिसका लेखक ने उत्तर दिया कि आततायी मेहमान नहीं होते हैं और जो उन्हें मेहमान समझते हैं वो अपना संबंध बनाए किंतु हमने बैंक की कारगुजारियों को देखा है।

इंडिया हैबिटेट सेंटर में विश्व बैंक के मीटिंग का विरोध करते जन आन्दोलनो का राष्ट्रीय समन्वय और दिल्ली समर्थक समूह  के कार्यकर्ता और माटू जनसंगठन के विमल भाई  
इंडिया हैबिटेट सेंटर में विश्व बैंक के मीटिंग का विरोध करते जन आन्दोलनो का राष्ट्रीय समन्वय और दिल्ली समर्थक समूह के कार्यकर्ता और माटू जनसंगठन के विमल भाई

बैंक की प्रारम्भिक आर्थिक मदद के कारण ही नर्मदा घाटी में आदिवासियों समाज की बर्बादी हुई है। विश्वबैंक एक तरफ गंगा के सफाई के लिए करोड़ों रुपया दे रहा है दूसरी तरफ गंगा पर ही बड़े बांधों के लिए पर्यावरण और आर्थिक लाभ-हानि के मूलभूत प्रश्नों को अपनी ही रक्षात्मक नीतियों का उल्लंघन करते हुए पैसा दे रहा है। उत्तर प्रदेश के सिंगरौली में एनटीपीसी की ताप विद्युत परियोजना से निकलने वाली राख को ठंडा करने के लिए जो बांध बनाया उससे उजड़े मात्र आठ परिवारों का पुर्नवास विश्वबैंक नहीं कर पाया। इसके अलावा ऐसे अनेक उदाहरण हर उस परियोजना में मिलेंगे जहां विश्वबैंक ने पैसा लगाया है जैसे पूर्वी खदानें और एलाइन-दुहंगन, रामपुर, लुहरी, विष्णुगाड-पीपलकोटी जैसे बांध परियोजनाएं आदि।

इसलिए बैंक का रक्षात्मक नीतियों पर चर्चा करना पूरी तरह बेईमानी है। बैंक की हिम्मत नहीं है कि प्रभावितों से सीधे जाकर बात कर सके। बैंक ने उसके द्वारा समर्थित परियोजनाओं में पुनर्वास और पर्यावरण की अब तक की समस्याओं को अनदेखा किया है और दूसरी तरफ इस तरह की मशविरा बैठकें आयोजित करने का ढोंग करता है। कार्यकर्ताओं ने 4 घंटे तक बैठक में कब्ज़ा जमाए रखा और इस तरह की बैठकों की पोल खोली। साथ चेतावनी भी दी की हम अगली मशविरा बैठकों में भी ऐसा ही करेंगे। कब्ज़े के दौरान मधुरेश कुमार ने देश भर के साथी आंदोलनों की ओर से एक पर्चा पढ़ा जिसमें बताया आंदोलनों का पक्ष क्या है बताया गया।

वास्तव में इस तरह की पहले आयोजित बैठकों/चर्चाओं में हजारों समूहों और व्यक्तियों ने हिस्सा लिया है और मगर सब बेनतीजा। चूंकि विश्वबैंक के बड़े साझेदार फ्रांस, जर्मनी, जापान, इंग्लैंड और अमेरिका जो कि बहुत ही गंभीर आर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रहे हैं उनका दबाव है कि पर्यावरण पुनर्वास के मुद्दों को एक तरफ रखकर वैश्विक निवेश की संभावना को खोजा जाए।



बैंक टिहरी जल विद्युत निगम जैसी आपराधिक कंपनियों को बिना उनके इतिहास देखे पैसा दे रहा है। विश्वबैंक का एक दूसरा हाथ अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम आईएफसी है जो निजी कंपनियों को पैसा देता है। आईएफसी ने ‘‘मध्यवर्ती वित्त ऋण‘‘ की जो नई प्रक्रिया शुरू की है उसमें तो सभी पर्यावरण और सामाजिक दायित्वों की रक्षात्मक नीतियों से बरी कर दिया है। गुजरात में संवेदनशील परिस्थिति वाले कच्छ क्षेत्र में 4000 मेगावाट की टाटा मुंदरा परियोजना को 4 बिलियन पैसा दिया। ऐसे ही एक बिलियन का ऋण और अन्य ऋण टाटा मुंदरा से जुड़ी परियोजनाओं को दिए। इसके बाद भी बैंक कैसे दावा कर सकता है कि वो पर्यावरण व पुनर्वास के मसलों पर लोगों से चर्चा करना चाहता है? वास्तव में बैंक सिर्फ बड़े पूंजीवादी देशों का एक औजार है जो कि भारत जैसे देशों के बाजारों को इन बड़े देशों के लिए खोलना चाहते हैं। एक दशक पहले पर्यावरण एवं वनमंत्रालय के लिए कार्यकुशलता निर्माण के लिए पैसा दिया था। यह बताने की जरूरत नहीं है कि इस मंत्रालय की कार्यकुशलता में किस तरह कि वृद्धि की है। देश का बिगड़ता पर्यावरण, बर्बाद होती नदी घाटियां इस गैर जिम्मेदार मंत्रालय की बढ़ी हुई कार्यकुशलता को बताता है।

8 अप्रैल को बंगलौर की मशविदा बैठक में भी आंदोलनकारियों ने बैठक में घुसकर अपनी बात रखी। बंगलौर के वकील ने सरदार सरोवर में सोलह वर्षीय रेहमल वसावे की पुलिस द्वारा गोली मारे जाने से हुई हत्या के संदर्भ में दो मिनट का मौन रखवाया। 10 अप्रैल को भवुनेश्वर में विश्वबैंक को पुलिस की घेराबंदी में बैठक करनी पड़ी। आईएफसी द्वारा वित्त पोषित जीएमआर कम्पनी के ताप परियोजना प्रभावित, पास्को से लेकर तमाम परियोजना प्रभावितों ने प्रदर्शन किया। मगर इसके बावजूद भी विश्व बैंक ने इस सारे विरोध को चर्चा का हिस्सा मानते हुए आगे बढ़ने की बात कही है जो फिर एक बार यह सिद्ध करता है कि विश्व बैंक जैसी तथा कथित विकास परियोजना के नाम पर पूंजीवादी देशों के हितों को साधने का ही औजार है। यह सब तौर तरीके बताते हैं कि वास्तव में विश्वबैंक की पर्यावरण और रक्षात्मक नीतियाँ उसकी वास्तविक कामों में कहीं कोई स्थान नहीं रखती है। मात्र एक सुंदर आवरण है।

Thursday, 18 April 2013

प्रैस विज्ञप्तिः- 19.4.2013




Hindi Press Release given below--Matu Jansanghatan  released its 15th Dastavez (Hindi) on 15th April  “Aapda mey fayada” (Benefit in calamity) to highlight  that the calamity was much due to Hydro Electric Power project in Assiganga and in Bhagirathiganga. HEPs proponent "Uttarakhand Jalvidhut Nigam" is relible for this. Report also mention large-scale irregularities in relief works done for those affected by the cloudburst in Uttarkashi 3 August, 2012. A summary of the report in English will be upload on our blog soon. Just send us a mail if u want.      ---Vimalbhai and Puran Singh Rana



''आपदा में फायदा'' का विमोचन
नुकसान बादल फटने से इतना नही वरन् जलविद्युत परियोजनाओं के कारण हुआ

उत्तराखंड में उत्तरकाशी में अस्सीगंगा व भागीरथी गंगा के संगम पर 15 अप्रैल को आपदा प्रभावितों के बीच माटू जनसंगठन के पंद्रहवें दस्तावेज़ ‘‘आपदा में फायदा‘‘ का विमोचन किया गया। इस अवसर पर सभा में वक्ताओं ने आपदा प्रंबध की पोल खोलने के साथ मुआवज़ा वितरण में हो रही धांधली की आलोचना की। एकमत से अस्सीगंगा के बांधो का विरोध किया गया।

क्षेत्र पंचायत सदस्य श्री कमलसिंह ने कहा की हम अस्सी गंगा के बांधों का प्रारंभ से विरोध कर रहे है। हमारी बात सही सिद्ध हुई। आपदा प्रबंधन के दिशानिर्देशों के अनुसार तो आपदा आते ही यहंा सभी समस्याओं के समाधान के लिये कैम्प लगना चाहिये था जो नही लगा और समस्यायें आज भी मौजूद है। अभी संगम चट्टी पर मलबा पड़ा है। सैकड़ो पेड़ गिरे पड़े है। पहले  उस क्षेत्र का उपचार होना चाहिये था नाकि 25 किलोमीटर नीचे गंगोरीगाड में पुश्ते लगाने का काम चालू होता।

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता व इस दस्तावेज़ के सहयोगी श्री नागेंद्र जगूड़ी
ने कहा की हमें लम्बा संघर्ष करना पड़ेगा जिसके लिये तैयारी जारी है। हम लोगो को ऐसे ही नही छोड़ सकते है।

‘सूर्योदय लोक हितकारी सेवा समिति‘ के अध्यक्ष श्री केसरसिंह पंवार ने कहा की खेती की जमीनों का नुकसान बहुत हुआ है। हमारे सिंचित खेत बह गये और सरकार एक नाली खेत का मुआवजा सिर्फ 2500/- दे रही है। हम उत्तरौं गांव के लोगो ने ये मुआवजा ना लेने का निर्णय लिया है। जो मुआवजा बांटा भी गया है। उसमें तमाम धांधलियां है। अनेक अपात्रों को मुआवजा दिया गया है। इसमें भी भाई-भतीजावाद हुआ है। जिनके मकान बहे है उन्हे 180 वर्गमीटर जमीन देने की बात चली थी किन्तु बाद में कुछ नही। भ्रष्टाचार और प्रशासन की मनमानी का नमूना है कि स्वंय मेरी जमीन बह गई किन्तु विधायक सहित अनेक जनप्रतिनिधियों के शपथपत्र के बावजूद मुझे जमीन नही मिल रही है।

समिति के सचिव श्री विकास उप्पल ने कहा कि मुख्यमंत्री जी ने अभी पुलांे और पुश्तांे के लिये 2 अरब 22 करोड़ रु0 की   घोषणा की है। पर प्रभावितों के बारे में अभी जांच करायेंगे। हम सात महीनों से लगातार शासन-प्रशासन के सामने समस्याओं को रख रहे है। पर आश्वासन ही मिले है। अब जो पुश्तो को काम चालू भी हुआ है तो वो मांनदंडो के उलट है। अभी नदी भरी है और दिवारें उसके साथ ही बनाई जा रही है। ये कितनी टिकेगी? यानि नया घपला चालू हो गया है।

गंगोरी के श्री विकास अग्रवाल
ने कहा की इन बांधो के कारण ही हमारा ज्यादा नुकसान हुआ है। प्रभावितों को आपदा प्रमाण पत्र तक नही मिला है। कुछ दिन पहले एक बीमा कंपनी आई थी बंाधों के नुकसान का आकलन करके चली गई। किन्तु लोगो के नुकसानों का आकलन कौन करेगा? रामपाल चैहान, मुकेश नेगी आदि ने भी अपने विचार रखे। टौंस घाटी से केसर पंवार व रमेश नौटियाल भी इस कार्यक्रम में शामिल हुये। सभा ने एकमत से रिपोर्ट में लिखी मांगो का समर्थन किया और पुनः इस बात को दोहराया किः-
अस्सीगंगा पर बांध तुरंत रोके जाये और अस्सीगंगा को लोक आधारित पर्यटन के लिए सुरक्षित किया जाये। पर्यावरणीय व मानवीय हानि पर एक गहन और विस्तृत जांच होनी चाहिये। इस हादसे की दोषी उत्तराखण्ड जल विद्युत निगम व उसके अधिकारियों पर तुंरत कार्रवाई हो।

माटू जनसंगठन की इस रिपोर्ट से यह मालूम पड़ता है कि गंगा की दोनो मुख्य धाराओं भागीरथीगंगा की अस्सीगंगा घाटी और अलकनंदागंगा की केदारघाटी में जुलाई, अगस्त और सितंबर महिने 2012 में जो भयानक तबाही हुई उसका कारण बादल फटने से ज्यादा जलविद्युत परियोजनाये थी। अस्सी गंगा नदी में बादल फटने के बाद एशियन विकास बैंक पोषित निमार्णाधीन कल्दीगाड व अस्सी गंगा चरण एक व दो जलविद्युत और भागीरथीगंगा में मनेरी भाली चरण दो परियोजनाआंे के कारण बहुत नुकसान हुआ। मारे गये मजदूरों का कोई रिकार्ड नही, अस्सीगंगा व केदार घाटी के गांव बुरी तरह से प्रभावित हुये, पर्यावरण तबाह हुआ जिसकी भरपाई में कई दशक लगेंगे। इसकी कोई समुचित निगरानी नही हुई। ‘उत्तराखंड जल विद्युत निगम‘ पर भी कोई कार्यवाही नही हुई। बल्कि उनकी सारी गलतियों को बाढ़ के साथ बहा दिया गया। बीमा कंपनियों से उनका नुकसान तो पूरा होगा साथ ही भ्रष्टाचार के लिये और पैसा मिल जायेगा। हम इस पर आगे कार्यवाही करेंगे।

जो सरकारें 4.5 और 9 मेगावाट की परियोजनाये नही संभाल सकती वो बड़े बांध की बात कैसे कर सकती है? उत्तराखंड सरकार बांधों को जिस तरह से आगे बढ़ा रही है वो आने वाले समय के लिये बहुत ही घातक है। बड़े बांधों में ही नही वरन् छोटी-2 जलविद्युत परियोजनाओं के कारण जो पर्यावरण व जनहक की अवहेलना हो रही हैं उसे भी नजरअंदाज किया जा रहा है।  

माटू जनसंगठन के इस पंद्रहवें दस्तावेज़ ‘‘आपदा में फायदा‘‘ में क्षेत्रीय भ्रमण, प्रभावितों से बातचीत और कई वर्षो की प्रेस रिपोर्टो के आधार पर यही बताने की कोशिश है कि बादल फटने के कारण नही वरन् वहंा जलविद्युत परियोजनाओं के कारण ज्यादा तबाही हुई। साथ ही बांध कंपनियों का भ्रष्टाचार, सरकार की लापरवाही और पर्यावरण की बर्बादी की पोल खोलने की भी कोशिश है।     

विमलभाई                                                 पूरण सिंह राणा

पुस्तक का आकार- 5.5’’ 8.5
मूल्य- 20/- (डाक खर्च अलग से)
पृष्ठ संख्या-कवर सहित 36


Friday, 5 April 2013

Press Note: World Bank Go Back-5-4-2013


PEOPLE'S MOVEMENTS AND ENVIRONMENTAL AND SOCIAL ACTION GROUPS SLAM WORLD BANK’S SHAM CONSULTATIONS ON ENVIRONMENTAL AND SOCIAL SAFEGUARDS POLICIES 

New Delhi, April 5 : Activists of the Matu Jan Sangathan, Domestic Workers Union, Delhi Mahila Shahri Kaamgar Sangathan, National Alliance of People's Movements (NAPM), Delhi Solidarity Group, SRUTI, Delhi Forum, Programme for Social Action and others today stormed the 'civil society consultation' on review and update of the World Bank's environmental and social safeguard policies organised by World Bank at India Habitat Centre in New Delhi. Terming these consultations as eyewash activists didn't allow the consultations to proceed since World Bank continues to hide behind thecentral and state governments in India or other government agencies in different countries and shriek responsibility for any environmental and social damage.
Vimal Bhai, Matu Jan Sangathan – NAPM, said, “the way these consultations are organised are no different from what has been going on for decades. Many such reviews have been conducted, thousands of groups and individuals have participated with the intent of seeing genuine reform of the institution, and possibly its democratization, only to be utterly disappointed. The current exercise, therefore, is nothing but a charade to mask the true intentions of its major ‘shareholders’: France, Germany, Japan, the United Kingdom and the United States, who are grappling with serious economic downturns and are conveniently using the Bank to force open global investment opportunities with scant regard to environmental and social impacts. Bank continues to own up to its responsibility for social and environmental damages it did in Narmada Valley, Singapur, East Parej Mines, Allain Duhangan, Rampur, Luhri and Vishungad Pipalkoti. On several occasions these have been brought to the notice of World Bank but they have refused to take notice of and continue to work with criminal companies like Tehri hydro Development Corporation and other consultants. If such is the case then why hold these stake holders consultations ?”
Madhuresh Kumar, NAPM, added that if indeed the World Bank was seriously concerned about the impacts of its investments, then the best test would have been the sensitivity demonstrated in the investments made by its various lending operations. In India, the International Finance Corporation (IFC), the Bank’s private sector lending arm, is complicit in massive human rights and environmental violations that form the basis of the super-mega $4 billion Tata-Mundra 4000 MW power project in the ecologically sensitive Kutch region of Gujarat. The World Bank, in its wisdom, has further endorsed such environmental crimes by offering a $1 billion loan to the building of the Fifth Power System Development Project, which essentially is a transmission line for Tata-Mundra and three other large coastal power projects. Participating in such manner, the Bank conveniently escapes any blame for the disaster, and yet benefits from financing such ‘development projects’.”
Umesh Babu, Delhi Forum, said “the Bank’s Policy on piloting the use of borrower systems for Environmental and Social Safeguards has in the past decade been a mantra to pave the way for promoting investment at any cost. Over a decade ago the World Bank funded the Indian Ministry of Environment and Forests’ Environmental Management Capacity Building Project. The result was a massive dilution of India’s environmental and social safeguard norms. What’s worse, the processes that resulted lent voice to those within administration and industry who were crying hoarse that the carefully evolved rigour of “forest” and “environmental” clearance standards in India was thwarting economic growth.”
Lakshmi Premkumar, PSA, said, “it took the movement groups and people's organisations across the globe 30+ years to pressurise the World Bank Group to formulate, re-formulate and have in place mechanisms that would safeguard social-environmental-cultural-traditional interests of communities and people affected by the Group's financing of so called 'Development projects' across the World and in India. However, it took the Bank, in particular International Finance Corporation (IFC), only one stroke of destructive imagination to bring in the new model of 'Financial Intermediary Lending' that wiped out all mandatory requirements posed by environmental and social safeguard principles on lending, as they are not bound by such standards. At a time when the FI model of lending in India by IFC and the World Bank at large are expected to cross the halfway mark of their collective investments, it does not make any sense at all for the World Bank to be holding such reviews of their environmental and social safeguards; they simply do not matter at all to the actual practice of the World Bank and its agencies.”
Activists urged the members of the civil society who had come for the consultation to leave the meeting, if they really felt the pain of the people of this country. World Bank has pushed for policies which have undermined the sovereignty of India and its people, privatised services, opened up market for loot and plunder of natural resources by the private corporations and very fundamentally changed the policies of this country in favour of capitalists forces.
Shouting slogans of “World Bank ! Quit India !”, “World Bank ! Down Down !” activists refused to budge from the venue until the World Bank Country Director Mr. Onno Ruhl, left the hall at 2 pm followed by Stephen F Lintner, Senior Advisor, Sanjay Srivastava, Regional Safeguards Advisor and other Bank officials along with few CSO members and Bank consultants who stayed till last.
Activists warned that these sham consultations will not be tolerated unless Bank owned upto damages, compensated communities and stopped funding the environmentally and socially destructive projects in name of 'development'. People's Movements have been struggling across the country against its own governments demanding justice and challenging their nefarious capitalist designs but that doesn't mean World Bank can hide behind them. They are part of the larger design of the global financial systems and we will continue to challenge it.
The current ‘consultations’ are therefore a sham and must be denounced by anyone deeply concerned about the nature of democracy and are keen to ensure that all peoples of the world benefit from human activity that is based on deep appreciation and adherence to the Principle of Prior and Informed Consent and the Principle of Intergenerational Equity.
Rajendra Ravi, Anita Kapoor, Seela Manaswanee, Sanjeev Kumar, Satyam Srivastava, Sunita Rani, Anil Tharyath Varghese, Nishank, Manisha Lath, Gopal, Santosh Kumar.

Thursday, 4 April 2013

गंगा चिंतन

गंगा चिंतन-1

Author: 
विमल भाई
जहां बांध बनने के समय चेतना नही थी वहां पर अब लोग खड़े हो रहे है। हां कहीं-कहीं पर प्रभावित बांध के पक्ष में भी खड़े हुए हैं और फिर भुगत रहे हैं। किंतु यह स्पष्ट है कि बांधों से कोई रोज़गार नहीं बढ़ा है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की स्वीकृतियों के अनुसार बांध कंपनियां ही अपनी रिपोर्ट बना कर भेज देती हैं। बाकी पर्यावरणीय और पुनर्वास के पक्ष की किसी शर्त का पालन होता है या नहीं इसकी कोई निगरानी नहीं। बस सरकारी कागजात के पुलिंदे बढ़ते जा रहे हैं। करोड़ों लोगों की आस्था का केन्द्र गंगा को मात्र बिजली बनाने का हेतु मान लिया जाए? गंगा के शरीर पर बांध बनाकर गंगा के प्राकृतिक स्वरूप को समाप्त किया जा रहा है। कच्चे हिमालय को खोद कर सुरंगे बनाई जा रही हैं। जिससे पहाड़ी जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। गंगा नदी नहीं अपितु एक संस्कृति है। पावन, पतितपावनी, पापतारिणी गंगा को मां का स्थान ना केवल हमारे पुराणों में दिया गया है वरन् गंगाजी हमारी सभ्यता की भी परिचायक हैं। वैसे तो गंगा का पूरा आधार-विस्तार अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार करता है। भारत देश में भी गंगा उत्तराखंड से उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सागर से मिलती है। हम यदि गंगा की उपत्याकाओं और उनके जल संग्रहण क्षेत्र को भी समेटे तो हरियाणा-मध्य प्रदेश और उत्तर-पूर्व राज्यों को भी जोड़ना होगा। गंगा का उद्गम उत्तराखंड से होता है। इसलिए उत्तराखंड को गंगा का मायका भी कहा जाता है। मुश्किल है गंगा को उसके मायके में ही हत्या की स्थिति में लाया जा रहा है। गंगा क्षत-विक्षत हो रही है। कन्या भ्रूण हत्या पर कानून है। पर संस्कृति की पालक नदियों के रक्षण के लिए हमारे पास कोई सोच नहीं है।

ऐसे में हमें हम सबकी गंगा के उद्गम से लेकर ऋषिकेश-हरिद्वार तक की सीधी, सच्ची, साफ बेबाक पहाड़ से निकली सच्चाईयां समझने की आवश्यकता है और उसके लिए कदम उठाने की जरुरत है। गंगा के मायके में ही गंगा की दुर्दशा को समझने के लिये हमें गंगा के आधार को भी जानना होगा। उत्तराखंड में गंगा एक तरफ गंगोत्री ग्लेशियर से निकलकर भागीरथी गंगा कहलाती है, दूसरी तरफ श्री बद्रीनाथ जी के पास से निकलकर विष्णुपदी अलकनन्दा गंगा कहलाती है। गंगा का तात्पर्य, उत्तराखंड में भागीरथी गंगा व विष्णुपदीगंगा अलकनंदा के पंच प्रयागों में मिलने वाली पांचों धाराओं के देवप्रयाग में मिलन के साथ पूरा होता है। ये पंचप्रयाग हैः- विष्णुप्रयाग (धौली-अलकनंदा) नन्दप्रयाग (नंदाकिनी-अलकनंदा) कर्णप्रयाग (पिंडर-अलकनंदा) रूद्रप्रयाग (मंदाकिनी-अलकनंदा) देवप्रयाग (अलकनंदा-भागीरथी)

देवप्रयाग से नीचे की तरफ मैदान में पहुंचने से पहले गंगा के किनारे रिवर राफ्टिंग के बहुत सारे पर्यटक कैंप होते हैं जो कि राज्य को राजस्व भी खूब देते हैं और पर्यटकों से स्थानीय लोगों को भी कुछ आमदनी हो जाती है। मगर इससे बड़ी आमदनी ऋषिकेश-हरिद्वार में गंगा के किनारे बने बड़े-बड़े मॉल रूपी आश्रमों व उसमें बैठे तथाकथित संतों की होती है। जो लोगों की गंगा के प्रति श्रद्धा और आस्था को स्वयं की पूजा अर्चना में बदलते हैं। इनमें ये भी होड़ होती है कि किसके पास कितने विदेशी अतिथि हैं। श्रद्धा से सम्मोहित आने वाले विदेशी आजकल इन गंगा संतों के साथ इंटरनेट पर ही जुड़ जाते हैं। कई आश्रमों मे तो बकायदा प्रचार विभाग को देखने वाली कोई गोरी बहन ही होती है। गंगा के किनारे से बढ़कर गंगा के बीच तक में अपने आश्रम का भव्य कब्ज़ा जमाए हुए हैं। ये आश्रम गंगामहाआरतियों का आयोजन करते हैं और राजनेताओं को बुलाकर क़ानूनों के उलंघन को सही ठहरवा लेते है। हां इन सब में गंगा के प्रति सच्चे समर्पण भाव से कार्य करने वाले संत नजर नहीं आते क्योंकि वो ना तो ढोंगी हैं और न प्रचार करते हैं।

आजकल गंगा पर होने वाले सेमिनारों, भजनों, एनजीओ के प्रोजेक्टों की भरमार हो रही है। सारे संतों-महंतों का गंगा के सवाल पर बोलना, ऋषिकेश में महाआरती का आयोजन करना एक खूब प्रचलित खेल बन गया है, किंतु गंगा की दुर्दशा में कोई परिवर्तन नहीं आया। सरकारें गंगा के नाम पर जम कर दुकानें चला रही हैं। केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय गंगा नदी प्राधिकरण बनाया और उत्तराखंड की पूर्ववर्ती सरकार ने निर्मल गंगा अभियान की दुकान चलाई। जिसमें विधायक निधियों का भी इस्तेमाल किया गया वो बात और है कि सारा पैसा किसी एक बांध के एक ठेके में समेट लिया होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंगा खूब बिक रही है। विश्वबैंक ने राष्ट्रीय नदी गंगा प्राधिकरण में अरबों रुपये गंगा सफाई के लिये दिया और साथ में ही गंगा की सबसे बड़ी हत्यारी बांध कंपनी टीएचडीसी को अलकनंदागंगा पर बांध बनाने के लिए भी करोड़ों रुपये का उधार दिया है। गंगा सफाई का धंधा मजे का है। निर्मलता की आड़ में भी खाओ और तथाकथित विकास के नाम पर बांध बना कर भी खाओ।

आइए गंगा पर बांधों की स्थिति देखते हैं। गंगोत्री से नीचे भागीरथी गंगा पर पहला बांध पड़ता है मनेरीभाली चरण एक फिर चरण दो फिर विशालकाय टिहरी बांध, फिर कोटेश्वर बांध और फिर कोटलीभेल चरण एक ‘अ‘ जो कि निर्माणाधीन है। इसके बाद अलकनंदागंगा से देवप्रयाग में भागीरथी गंगा का संगम होता है। जहां से आगे वो सिर्फ गंगा के ही नाम से जानी जाती है। आध्यात्म और धार्मिक कथा जो भी हो गढ़वाल में एक लोककथा के अनुसार भागीरथीगंगा को बहु तथा अलकनंदागंगा को सास कहा गया है। सास गंगा में जल का 70 प्रतिशत तथा बहु 30 प्रतिशत प्रवाह करती है। इसलिए कथा यह भी कहती है कि सास बहु को दबा कर रखती है।

अलकनंदागंगा की प्रमुख सहायक गंगाओं पर भी बांधों की श्रृखलाएं हैं। स्वयं अलकनंदागंगा पर पहला निजी बांध विष्णुप्रयाग है जयप्रकाश इंडस्ट्री ने बनाया है। अनूपशहर का रहने वाला यह जयप्रकाश गौड़ परिवार टिहरी बांध से उपजा और फैला है। अलकनंदागंगा पर पहला प्रयाग विष्णुप्रयाग है जो कि धौलीगंगा और अलकनंदागंगा के संगम से बनता है। अब संगम बांध के नाम से ही जाना जा रहा है। इसके बाद एनटीपीसी तपोवन विष्णुगाड परियोजना बना रही है। फिर नीचे आएं तो टीएचडीसी विष्णुगाड पीपलकोटी परियोजना बनाना चाहती है। उसके नीचे उत्तराखंड जल विद्युत की दो परियोजनाएं विचारणीय है और फिर श्रीनगर में आंध्र की जीवीके कम्पनी 330 मेगावाट की परियोजना बना रही है। इसके बाद एनएचपीसी की कोटलीभेल चरण 1 ‘ब‘ और देव प्रयाग से नीचे कोटलीभेल चरण दो परियोजना जिसकी वन स्वीकृति अभी रुकी हुई है।

धौलीगंगा पर बांध बन रहे है, नई योजनाओं पर भी काम चालू है। नंदाकिनी प्यारी सी नन्ही सी गंगा है पर पूरी बंध ही गई है। मंदाकिनी के तो और भी बुरे हाल हुये है, लंबा संघर्ष चला, दमन भी खूब हुआ है। बस एकमात्र पिंडरगंगा पर अभी तक कोई बांध नही है। पर बांध तैयारी चल रही है। लोगों का संघर्ष भी जारी है। इन सब गंगाओं पर बांधों की कथाएं अलग-अलग है। लोग बांध के खिलाफ लड़ रहे है। जहां बांध बनने के समय चेतना नही थी वहां पर अब लोग खड़े हो रहे है। हां कहीं-कहीं पर प्रभावित बांध के पक्ष में भी खड़े हुए हैं और फिर भुगत रहे हैं। किंतु यह स्पष्ट है कि बांधों से कोई रोज़गार नहीं बढ़ा है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की स्वीकृतियों के अनुसार बांध कंपनियां ही अपनी रिपोर्ट बना कर भेज देती हैं। बाकी पर्यावरणीय और पुनर्वास के पक्ष की किसी शर्त का पालन होता है या नहीं इसकी कोई निगरानी नहीं। बस सरकारी कागजात के पुलिंदे बढ़ते जा रहे हैं।

Thursday, 14 March 2013

Press Note: 14 March International Anti Big Dam day


14th March
Anti Big Dam Day 
Vishnugad-Peepalkoti
opposed by people




We want out river should flow freely.
हमारी नदियों को अविरल बहने दो  

 

‘अंतराष्ट्रीय बड़े बाँध विरोधदिवस‘ पर विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध का विरोध
आज 14 मार्च को अलकनंदागंगा घाटी में ‘अंतराष्ट्रीय बड़े बंाध विरोध दिवस‘ के दिन बड़े बांधो के खिलाफ प्रर्दशन हुआ। देशभर में बड़े बांधो से उजड़े लोगो का पुनर्वास तक नही हो पाया है। पर्यावरण के मानको का पूर्ण उलंघन हुआ है वही इन बांधो से घोषित बिजली उत्पादन तक नही हुआ है। उत्तराखंड में ही बन चुके बांधो की स्थिति खराब हैै। बांधो से आज ना केवल नदियंा खतरे में है बल्किी यह भी सिद्ध हो गया है कि राज्य को आने वाले समय में केवल नुकसान ही मिलेगा। टिहरी बांध के विस्थापितों के लिये उच्चतम् न्यायालय तक जाना पड़ा तब जाकर कुछ पुनर्वास हो पाया है। पिछले 21 वर्षो से एन0डी0 जुयाल व शेखर सिंह बनाम भारत सरकार केस चालू है। बांध विरोधियों ने ही पुनर्वास की लड़ाई लड़ी है। सरकारों का ध्यान मात्र बांध बनाने में है। पर्यावरण और लोगो पर पड़ रहे नुकसानों की ओर नही है। 


उत्तराखंड में अलकनंदागंगा पर निर्माणाधीन विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध क्षेत्र में विभिन्न प्रभावित गांव कौडि़या, दुर्गानगर, हरसारी, नौरख टंगरी आदि से आयी महिलाआंे व पुरुषों ने माटू जनसंगठन के बैनर तले विरोध प्रदर्शन किया। हरसारी गंाव के नीचे जहंा बांध के    विद्युतघर के लिये सुरंग निर्माणाधीन है, लोग वहंा इकट्ठे हुये और सुरंग काम बंद किया व बांध कंपनी टीएचडीसी के कर्मचारियों का     घेराव किया। बाद में जुलुस ने गंगा को अविरल बहने दो, बड़े बांध धोखा है आदि नारे लगाते हुये सियासेण में टीएचडीसी के कार्यालय पर जाकर प्रदर्शन किया। संघर्ष को आगे ले जाने का ऐलान किया।
 
सभा में नौरख के वन सरपंच बृहषराज तडि़याल ने कहा की हमारे भविष्य की बर्बादी हम नही सहेंगे। हमें बांध नही चाहिये। हमने आज तक लड़ाई लड़ी है आगे भी हमारा संघर्ष जारी रहेगा।                                                                          
नरेन्द्र पोखरियाल ने कहा की हम पिछले 9 वर्षाे से विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध के असरों को झेल रहे है किन्तु बांध कंपनी को कोई परवाह नही है। हाटगांव के लोग भी अधूरे आश्वासनों में लटक रहे है।
रामलाल का कहना था की अभी बांध का काम भी चालू नही हुआ है। टीएचडीसी ने बांध के सर्वे के लिये जो नुकसान किये है उनकी भरपाई नही कर सकी तो आगे क्या करेगी? यह बात आज सबकी समझ में आ रही है। 


गीता देवी ने कहा की हम दुर्गापुर वालो की स्थिति भी हरसारी वालो की तरह होने वाली है। हम बांध नही बनने देंगे।
हरसारी की बिंदी देवी ने कहा की  रात को विस्फोटकों के कारण हम सो नही पाते और सरकार चैन की नींद सो रही है। विभिन्न गांवों से आई महिलाओं मसूरी देवी, नंदी देवी, भादी देवी आदि ने भी नदियों पर बांधों का विरोध किया।    

विश्वबैंक के अघ्यक्ष भारत आकर गंगा जी में गंदगी पर चिंता व्यक्त करते है और दूसरी तरफ गंगा की हत्या करने वाली बांध परियोजनाओं को पैसा देते है। हम उनके मगरमच्छी आसुंओ को समझते है यह एक तरीका है गंगा सफाई के लिये और कर्ज देने का। यदि उन्हे वास्तव में गंगा की इतनी चिंता है तो वे विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध के लिये कर्जा क्यों दे रहे है?
24 जुलाई व 3 अगस्त 2012 को अस्सी गंगा नदी में बादल फटने के कारण निमार्णाधीन कल्दीगाड व अस्सी गंगा चरण एक व दो जलविद्युत परियोजनाओं ने तबाही मचाई और भागीरथीगंगा में मनेरी भाली चरण दो के कारण बहुत नुकसान हुआ। मारे गये मजदूरों का कोई रिकार्ड भी नही मिला। अस्सीगंगा के गांव बुरी तरह से प्रभावित हुये, छोटे-छोटे रास्ते टूटे, अस्सीगंगा घाटी का पर्यावरण तबाह हुआ जिसकी भरपाई में कई दशक लगेंगे। मनेरी भाली चरण दो के प्रभावितों का भी पुनर्वास नही हुआ। ऐसा ही केदार घाटी में भी बादल फटने से ज्यादा वहंा बन रहे बांधो के कारण नुकसान हुआ। ‘उत्तराखंड जल विद्युत निगम‘ भी पर कोई कार्यवाही नही हुई। बल्कि उनकी सारी गलतियों को बाढ़ के साथ बहा दिया गया। सरकारी हो या निजी, दोनो ही तरह की बांध कंपनियंा व्यवहार में एक सी है।

राज्य के बांधों में, सुरंगंे पहाड़ों को 1500 कि0मी0 लम्बाई में खोखला कर रही है। पहाड़ी क्षेत्र मंे मात्र 7 प्रतिशत भूमि खेती योग्य शेष बच रही है। इन पर भी डूब और अन्य बांध कार्यो का खतरा है। खेती कम होने से भविष्य में खाद्य सुरक्षा बड़ा प्रश्न खड़ा होने वाला है। पूरे राज्य में नदी किनारे असुरक्षित हो रहे है। नदी में पानी की भी अनिश्चितता हुई हैै। नदी का पानी अचानक से पानी छोड़ा जाता है। धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यों जैसे स्नानपर्व, दाह-संस्कार, नदी-पूजन आदि के लिए भी नदी में पानी नहीं रहा है। जिससे भूस्खलन बढ़े है। पहाड़ की संस्कृति पर बुरा असर पड़ रहा है। सबसे बुरा असर महिलाओं की स्वतंत्रता पर पड़ता है। देवभूमि उत्तराखंड में नदी किनारे के सभी प्रयाग या तो डूब रहे है या सूख रहे हैै।
इन सबके बाद भी यदि सरकारे नही समझती है तो भविष्य में राज्य की तबाही कि वे जिम्मेदार होंगी। पर्यावरण सुरक्षा और जनहक के लिये बड़े बांधों के खिलाफ हमारा संघर्ष जारी रहेगा।

नरेन्द्र पोखरियाल         मसूरी देवी      रामलाल       बिंदी देवी         विमलभाई

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14th March International Anti Big Dam day

People oppose Vishnugad-Peepalkoti HEP in 

Ganga valley

Today on 14th march in Alaknandaganga valley, on the occasion of international Anti Big Dam day demonstration held .on one hand , across the country, there has been no rehabilitation of the people displaced by big dams ,the environmental norms have been grossly violated ,on the other side the proposed power generation has not happened .In Uttrakhand itself the situation of the Dams constructed so far , is very dismal .the dams pose a danger not only for the river but also spell doom for the state. For seeking their rights , Tehri Dam displaced people had to go up to the supreme court only then some semblance of rehabilitation has happened. For the last 21 years litigation has been going on in the case between N.D. Juyal and shekhar singh V/s GoI. The struggle for rehabilitation has been spearheaded by the anti dam campaigners .
In uttrakhand on Alaknandaganga under construction Vishnugad–Peepalkoti HEP area ,under the banner of Matu Jansangthan, men and women of the affected villages of kaudiya ,Durgapur ,Harsari ,Naurakh ,Tagari etc. protested .In Harsari village people gathered at the Dam site where the construction of tunnel is under way ,the work was stalled and THDC officials were gheroed .After this the procession proceeded to the THDC office at Siyasedh ,shouting slogans like Ganga ko aviral Bahene do ,Badhe bandh Dhoka hai ,and vowed to continued their struggle .
In the meeting Naurakha Vansarpanch Brihashraj Tadial said that destruction of our future would not be tolerated, we do not want Dams .We have fought till today and the struggle would continue.
Narinder Pokhariyal said that for the last 9 years our village peopel are facing the consequences of this proposed Dam but the company has not shown any concern . Even Hatt village people are hanging on to mere assurances only.
Ramlal said that the company has not been able to compensate for the damages done during the survey so the people can well gauge the future .Geeta devi said that due to site blasting at night while the people have lost their sleep the government is sound asleep . Women at various villages Masuri Devi ,Nandi Devi ,Bhadi Devi all protested daming of the river.
Impact of even samll Hydro Electric Project are in bad in Uttrakhand. For example on July 24 and 3rd aug 2012 ,in Assi ganga river valley due to cloud burst under construction Kaldigahat and Assi ganga Phase-I and II Hydro electric project caused disaster and Bhagirathi ganaga in Maneri Chal phase II caused lots of destruction. There is no account or record of the deaths of the workers . The villages along Assiganga have been badly affected. The pathways have been eroded . But no action, no enquary has been setup on the dam builder.
Under this situation our struggle is on against dams to save our rivers and our rights over on natural resouces.
Narendra Pokhriyal, Bindadevi, Ramlal, Keshridevi, Vimalbhai

Tuesday, 12 March 2013

प्रैस विज्ञप्तिः 12 मार्च 2013

टिहरी बांध प्रभावितों की नई सम्पशार्विक नीति पुराने अनुभवो के आधार पर बने

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने श्री एन. डी. जुयाल व शेखर सिंह बनाम भारत सरकार और दूसरे चल रहे  मुकद्दमों में 5 मार्च 2013 को दिये गये आदेश में कहा है कि राज्य सरकार के पुनर्वास निदेशालय के अधिकारी व टीएचडीसी के अधिकारी राज्य उर्जा सचिव की अध्यक्षता में बैठें और सम्पाशर््िवक नीति में उठ रहे मतभेदों को दूर करें ताकि टिहरी जलाशय के चारों तरफ भिलंगना व भागीरथी घाटी में जलाशय के कारण हो रही क्षति से प्रभावित व्यक्ति/परिवारों का समुचित पुनर्वास हो सके।

19-10-2010 को राज्य सरकार की समिति ने स्थलीय निरीक्षण किया और उसके बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 30 जनवरी 2013 के आदेश के बाद 14 जनवरी को सम्पाशर््िवक नीति अधिसूचित हुई। अधिसूचना में जमीनी सच्चाईयों का पूरी तरह अभाव है। टिहरी और कोटेश्वर बांधों के जलाशय की डूब से हुये विस्थापित लोगों की पुनर्वास की समस्याये आज तक नही सुलझ पाई है। नीति को देखने के बाद मालूम पड़ता है कि इससे कोई सबक नहीं लिया गया है।

13 मार्च को उर्जा सचिव उत्तराखंड की अध्यक्षता में पुनर्वास निदेशालय के अधिकारी व टीएचडीसी के अधिकारियों की बैठक होने वाली है। 1989 से टिहरी बांध की समस्या और प्रभावितों के बीच काम के आधार पर प्रभावितों की ओर से हमने उर्जा सचिव और पुनर्वास निदेशक को सुझाव भेजे है।

नई सम्पाशर््िवक नीति बहुत ही सीमित अर्थों में बनाई गई है जिसमें सिर्फ जलाशय से व्यक्तिगत परिवारों पर होने वाले प्रभावों को देखा जा रहा है। नीति में नुकसान को व्यक्तिगत तौर पर लिया गया है। इस बात को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है कि यह नुकसान व्यक्तिगत नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र में होगा।

पत्र के कुछ खास बिन्दु हैः- भूस्खलन रुकता नही, सामकेतिक योजना का आभाव है, भूमिहीनों का भी पुनर्वास हो,बेनाप/कब्जाधारी भूस्वामियों का पुनर्वास हो, फ्री स्टाम्प ड्यूटी हो, भवन निर्माण के लिये कर्ज, पुनर्वास स्थलों पर सामुदायिक सुविधाये, पुनर्वास सामुदायिक होना चाहिए न कि व्यक्तिगत इकाई के रूप में। विस्थापितों को पूर्व में बने पुनर्वास स्थलों के आस-पास ही स्थान दिया जाये ताकि उनकी अपनी पहचान बरकरार रह सके। विस्थापितों को चुनने का अधिकार हो। 1. पहाड़ में; 2. मैदानी क्षेत्र में; 3. अपनी मनचाही स्थल पर जमीन खरीदने का। तीसरी दशा में सरकार उनको जगह खरीदने में मद्द व मूल्य राशि उपलब्ध करानी होगी। नई सम्पाशर््िवक नीति में लिखे गये पुनर्वास व मुआवजे के लिये तौर-तरीके व दिशा-निर्देश स्पष्ट नहीं है। जोकि आने चाहिये।

ज्ञातव्य है कि नवम्बर 2011 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कारण ही टीएचडीसी ने पुनर्वास कार्यो को पूरा करने के लिये एक अरब से ज्यादा पैसा दिया। यह बताता है कि टिहरी बांध परियोजना की पुनर्वास नीति और उसके क्रियान्वयन में कितनी खामियां हैं। आज टिहरी बांध से बिजली उत्पादन चालू हुए लगभग 7 वर्ष होने वाले हैं किन्तु आज तक जलाशय स्तर 835 मीटर के नीचे के प्रभावितों का पुनर्वास भी नहीं हो पाया। जिस कारण सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्ण जलाशय भरने की अनुमति नहीं प्रदान की है। यह बैठक भी इसीलिये ही हो रही है।

सर्वोच्च न्यायालय में श्री एन. डी. जुयाल व शेखर सिंह बनाम भारत सरकार केस में टीएचडीसी द्वारा उठाये गये प्रश्नों के संदर्भ में हमारा मानना है कि     जनप्रतिनिधि का समिति में होना जरुरी है साथ समिति में बांध प्रभावितों का भी एक प्रतिनिधी होना चाहिये। जलाशय से प्रभावित होने वाले भी बांध परियोजना से ही प्रभावित माने जाने चाहिए इसलिए उनको टिहरी बांध परियोजना की पुनर्वास नीति 1998 के अनुसार 2 एकड़ भूमि मिलनी चाहिए। टीएचडीसी का कहना है कि जलाशय के चारों तरफ आठ गांवों में 453.15 हेक्टयेर भूमी उपलब्ध है।  इस संदर्भ में पहला प्रश्न यह है कि टीएचडीस ने यह भूमि अन्य विस्थापितों को उपलब्ध क्यों नहीं कराई। दूसरा प्रश्न की यह ज्यादातर भूिम भी उसी प्रभावित क्षेत्र में आ रही है। तीसरा प्रश्न यह सभी विस्थापितों के लिए पूर्ण नहीं होगी। इसलिए इस भूमि को मात्र एक विकल्प के रूप में रखा जाये न कि अंतिम विकल्प में। जिसके लिये विस्थापितों की सहमति आवश्यक हो।
आजतक के अनुभवों के आधार पर टिहरी बांध के विस्थापितों के मानवीय पुनर्वास के लिए जरूरी है-
1-विस्थापन भूमिअधिग्रहण कानून के तहत होना चाहिये।2-भूमिअधिग्रहण की प्रक्रिया समयबद्ध हो- 3-विस्थापन की प्रक्रिया के बीच किसी पात्र कि मृत्यु होने पर उसके आश्रितों को पात्र माना जाए।4-धारा 4 लगने के समय 18 वर्ष के व्यक्तियों को पात्र माना जाए-5-जमीन दो एकड़ से कम नही हो-6-मकान के मुआवजे से पहले जमीन दी जाये-7-रोजगार सम्बन्धित शासनादेश को तुरन्त क्रियान्वित किया जाये-8-जमीन का भूअधिकार दो, फिर जमीन लो-9-गांव को बुनियादी सुविधाओ के साथ सामूहिक रूप से बसाया जाए-10-पुनर्वास के लिए दूसरो का विस्थापन नही हो-11- पुनर्वास महायोजना-टिहरी बांध की पर्यावरण स्वीकृति 19 जुलाई 1990 को दी गई थी जिसमें पुर्नवास की महायोजना बनाना एक शर्त थी। जो आजतक पूरी नही हो पाई। नतीजा है कि पुनर्वास में इतनी समस्यायें है। इसलिये अब जो विस्थापन हो रहा है कम से कम उसके लिये एक महायोजना जिसमें सभी पात्र विस्थापितों के लिए जमीन और संसाधन की बात हो साथ ही उसकी एक कार्य योजना भी। 12-जानकारी-लोगांे को उनके अधिकारों की जानकारी प्रशासन द्वारा ग्राम स्तर पर प्रदान की जाये। 13-पुनर्वास विभाग के शिविर गांव स्तर पर लगे-प्रभावितों के खर्च, समय व साधन बचाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिये यह जरुरी है। 14-घाटे में चल रहें उद्यान, आलू फार्म चाय बगान व इस तरह के क्षेत्र मालूम करके विस्थापितों को दिये जा सकते है।-15-उद्यानकृर्षि के फार्म वाली सरकारी योजनाओं में विस्थापितों को शामिल किये जायें।

वास्तव में जरुरत तो टिहरी बांध परियोजना जिसमें कोटेश्वर बांध भी आता है, विस्थापितों/प्रभावितों के लिये बनी 1998 की नीति की कमियों को नयी परिस्थितियों व अबतक के विस्थापन में आई समस्याओं को देखते हुये उच्चीकृत करना चाहिये। ताकि नये विस्थापितों को भी वही सब नहीं झेलना पड़े जो पूर्व में विस्थापित लोग झेल रहे हैं। वास्तव में सम्पाशर््िवक नीति की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। पुनर्वास नीति 1998 को ही नये संशोधनों के साथ नवीनीकृत करने की जरूरत थी। किन्तु यदि यह सरकार पुनः सम्पाशर््िवक नीति के नाम पर पुनर्वास नीति बना रही है तो उसे यह सब तो करना ही चाहिये। नीति बार-बार नही बनती है। यह एक मौका है कि टिहरी बांध विस्थापितों के साथ न्याय हो। मुख्यमंत्री जी बार-बार अदालत में बांध विस्थापितों के हक के लिये जाने की घोषणा करते रहे है। यह मौका है कि वो अपना कथन पूर्ण कर सकते है।


विमलभाई               
(समंवयक)

पूरण सिहं राणा


Tuesday, 5 March 2013

Releasing new Dam Story on youtube-- Bandh Katha 12 हमारी नई बांध कथा-12

(English message given below)

प्रिय साथी

जिंदाबाद

हमारी नई बांध कथा 12 देखे
। भागीरथीगंगा की सहायक अस्सीगंगा में 3 अगस्त 2012 को बादल फटा। अस्सी गंगा में तीन जलविद्युत परियोजनायंे निमार्णाधीन है। एक और भी चालू हो रही है। लोगो का विरोध जारी है। पर्यटन और ट्राउट मछली के लिये प्रसिद्ध लगभग 25 किलोमीटर लम्बी सुंदर नदी घाटी की तबाही और 50 से ज्यादा मजदूरों की हत्या की जिम्मेदार है, उत्तराखंड जलविद्युत निगम की ये छोटी जलविद्युत परियोजनायें। भागीरथीगंगा में अस्सी गंगा के मिलने के बाद मनेरी भाली चरण-2 जलविद्युत परियोजना के कारण भी तबाही आई। यही सब इस देखे बांध कथा-12

http://youtu.be/N6PevEbI4m8

जल्दी ही इसी विषय पर हमारे 1 5 वें दस्तावेज़  का, बस थोडा इंतजार कीजिये।
विमलभाई



Dear Friends

Jindabad

Have a look of our new Bandh Katha 12 ( Dam story-12) On 3rd August 2012 there was a cloud burst in Assiganga, a tributary of Bhagirathiganga. In Assiganga, three hydroelectric projects (HEP) are under construction. Another one is also starting. Peoples protest is going on. These 'small' HEP of Uttrakhand Jal Vidyut Nigam are responsible for the death of more than 50 workers and destruction of 25 km of beautiful river Valley famous for tourism and "Trout Fish". After the confluence of Assiganga with Bhagirathiganga there was destruction also due to Manari Bhali HEP phase-II. View all these in this Bandh Katha-12.
Soon we are going to bring out our 15th Dastavez (booklet) on the same issue, just wait.......

http://youtu.be/N6PevEbI4m8

Vimalbhai