Thursday, 14 March 2013

Press Note: 14 March International Anti Big Dam day


14th March
Anti Big Dam Day 
Vishnugad-Peepalkoti
opposed by people




We want out river should flow freely.
हमारी नदियों को अविरल बहने दो  

 

‘अंतराष्ट्रीय बड़े बाँध विरोधदिवस‘ पर विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध का विरोध
आज 14 मार्च को अलकनंदागंगा घाटी में ‘अंतराष्ट्रीय बड़े बंाध विरोध दिवस‘ के दिन बड़े बांधो के खिलाफ प्रर्दशन हुआ। देशभर में बड़े बांधो से उजड़े लोगो का पुनर्वास तक नही हो पाया है। पर्यावरण के मानको का पूर्ण उलंघन हुआ है वही इन बांधो से घोषित बिजली उत्पादन तक नही हुआ है। उत्तराखंड में ही बन चुके बांधो की स्थिति खराब हैै। बांधो से आज ना केवल नदियंा खतरे में है बल्किी यह भी सिद्ध हो गया है कि राज्य को आने वाले समय में केवल नुकसान ही मिलेगा। टिहरी बांध के विस्थापितों के लिये उच्चतम् न्यायालय तक जाना पड़ा तब जाकर कुछ पुनर्वास हो पाया है। पिछले 21 वर्षो से एन0डी0 जुयाल व शेखर सिंह बनाम भारत सरकार केस चालू है। बांध विरोधियों ने ही पुनर्वास की लड़ाई लड़ी है। सरकारों का ध्यान मात्र बांध बनाने में है। पर्यावरण और लोगो पर पड़ रहे नुकसानों की ओर नही है। 


उत्तराखंड में अलकनंदागंगा पर निर्माणाधीन विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध क्षेत्र में विभिन्न प्रभावित गांव कौडि़या, दुर्गानगर, हरसारी, नौरख टंगरी आदि से आयी महिलाआंे व पुरुषों ने माटू जनसंगठन के बैनर तले विरोध प्रदर्शन किया। हरसारी गंाव के नीचे जहंा बांध के    विद्युतघर के लिये सुरंग निर्माणाधीन है, लोग वहंा इकट्ठे हुये और सुरंग काम बंद किया व बांध कंपनी टीएचडीसी के कर्मचारियों का     घेराव किया। बाद में जुलुस ने गंगा को अविरल बहने दो, बड़े बांध धोखा है आदि नारे लगाते हुये सियासेण में टीएचडीसी के कार्यालय पर जाकर प्रदर्शन किया। संघर्ष को आगे ले जाने का ऐलान किया।
 
सभा में नौरख के वन सरपंच बृहषराज तडि़याल ने कहा की हमारे भविष्य की बर्बादी हम नही सहेंगे। हमें बांध नही चाहिये। हमने आज तक लड़ाई लड़ी है आगे भी हमारा संघर्ष जारी रहेगा।                                                                          
नरेन्द्र पोखरियाल ने कहा की हम पिछले 9 वर्षाे से विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध के असरों को झेल रहे है किन्तु बांध कंपनी को कोई परवाह नही है। हाटगांव के लोग भी अधूरे आश्वासनों में लटक रहे है।
रामलाल का कहना था की अभी बांध का काम भी चालू नही हुआ है। टीएचडीसी ने बांध के सर्वे के लिये जो नुकसान किये है उनकी भरपाई नही कर सकी तो आगे क्या करेगी? यह बात आज सबकी समझ में आ रही है। 


गीता देवी ने कहा की हम दुर्गापुर वालो की स्थिति भी हरसारी वालो की तरह होने वाली है। हम बांध नही बनने देंगे।
हरसारी की बिंदी देवी ने कहा की  रात को विस्फोटकों के कारण हम सो नही पाते और सरकार चैन की नींद सो रही है। विभिन्न गांवों से आई महिलाओं मसूरी देवी, नंदी देवी, भादी देवी आदि ने भी नदियों पर बांधों का विरोध किया।    

विश्वबैंक के अघ्यक्ष भारत आकर गंगा जी में गंदगी पर चिंता व्यक्त करते है और दूसरी तरफ गंगा की हत्या करने वाली बांध परियोजनाओं को पैसा देते है। हम उनके मगरमच्छी आसुंओ को समझते है यह एक तरीका है गंगा सफाई के लिये और कर्ज देने का। यदि उन्हे वास्तव में गंगा की इतनी चिंता है तो वे विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध के लिये कर्जा क्यों दे रहे है?
24 जुलाई व 3 अगस्त 2012 को अस्सी गंगा नदी में बादल फटने के कारण निमार्णाधीन कल्दीगाड व अस्सी गंगा चरण एक व दो जलविद्युत परियोजनाओं ने तबाही मचाई और भागीरथीगंगा में मनेरी भाली चरण दो के कारण बहुत नुकसान हुआ। मारे गये मजदूरों का कोई रिकार्ड भी नही मिला। अस्सीगंगा के गांव बुरी तरह से प्रभावित हुये, छोटे-छोटे रास्ते टूटे, अस्सीगंगा घाटी का पर्यावरण तबाह हुआ जिसकी भरपाई में कई दशक लगेंगे। मनेरी भाली चरण दो के प्रभावितों का भी पुनर्वास नही हुआ। ऐसा ही केदार घाटी में भी बादल फटने से ज्यादा वहंा बन रहे बांधो के कारण नुकसान हुआ। ‘उत्तराखंड जल विद्युत निगम‘ भी पर कोई कार्यवाही नही हुई। बल्कि उनकी सारी गलतियों को बाढ़ के साथ बहा दिया गया। सरकारी हो या निजी, दोनो ही तरह की बांध कंपनियंा व्यवहार में एक सी है।

राज्य के बांधों में, सुरंगंे पहाड़ों को 1500 कि0मी0 लम्बाई में खोखला कर रही है। पहाड़ी क्षेत्र मंे मात्र 7 प्रतिशत भूमि खेती योग्य शेष बच रही है। इन पर भी डूब और अन्य बांध कार्यो का खतरा है। खेती कम होने से भविष्य में खाद्य सुरक्षा बड़ा प्रश्न खड़ा होने वाला है। पूरे राज्य में नदी किनारे असुरक्षित हो रहे है। नदी में पानी की भी अनिश्चितता हुई हैै। नदी का पानी अचानक से पानी छोड़ा जाता है। धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यों जैसे स्नानपर्व, दाह-संस्कार, नदी-पूजन आदि के लिए भी नदी में पानी नहीं रहा है। जिससे भूस्खलन बढ़े है। पहाड़ की संस्कृति पर बुरा असर पड़ रहा है। सबसे बुरा असर महिलाओं की स्वतंत्रता पर पड़ता है। देवभूमि उत्तराखंड में नदी किनारे के सभी प्रयाग या तो डूब रहे है या सूख रहे हैै।
इन सबके बाद भी यदि सरकारे नही समझती है तो भविष्य में राज्य की तबाही कि वे जिम्मेदार होंगी। पर्यावरण सुरक्षा और जनहक के लिये बड़े बांधों के खिलाफ हमारा संघर्ष जारी रहेगा।

नरेन्द्र पोखरियाल         मसूरी देवी      रामलाल       बिंदी देवी         विमलभाई

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14th March International Anti Big Dam day

People oppose Vishnugad-Peepalkoti HEP in 

Ganga valley

Today on 14th march in Alaknandaganga valley, on the occasion of international Anti Big Dam day demonstration held .on one hand , across the country, there has been no rehabilitation of the people displaced by big dams ,the environmental norms have been grossly violated ,on the other side the proposed power generation has not happened .In Uttrakhand itself the situation of the Dams constructed so far , is very dismal .the dams pose a danger not only for the river but also spell doom for the state. For seeking their rights , Tehri Dam displaced people had to go up to the supreme court only then some semblance of rehabilitation has happened. For the last 21 years litigation has been going on in the case between N.D. Juyal and shekhar singh V/s GoI. The struggle for rehabilitation has been spearheaded by the anti dam campaigners .
In uttrakhand on Alaknandaganga under construction Vishnugad–Peepalkoti HEP area ,under the banner of Matu Jansangthan, men and women of the affected villages of kaudiya ,Durgapur ,Harsari ,Naurakh ,Tagari etc. protested .In Harsari village people gathered at the Dam site where the construction of tunnel is under way ,the work was stalled and THDC officials were gheroed .After this the procession proceeded to the THDC office at Siyasedh ,shouting slogans like Ganga ko aviral Bahene do ,Badhe bandh Dhoka hai ,and vowed to continued their struggle .
In the meeting Naurakha Vansarpanch Brihashraj Tadial said that destruction of our future would not be tolerated, we do not want Dams .We have fought till today and the struggle would continue.
Narinder Pokhariyal said that for the last 9 years our village peopel are facing the consequences of this proposed Dam but the company has not shown any concern . Even Hatt village people are hanging on to mere assurances only.
Ramlal said that the company has not been able to compensate for the damages done during the survey so the people can well gauge the future .Geeta devi said that due to site blasting at night while the people have lost their sleep the government is sound asleep . Women at various villages Masuri Devi ,Nandi Devi ,Bhadi Devi all protested daming of the river.
Impact of even samll Hydro Electric Project are in bad in Uttrakhand. For example on July 24 and 3rd aug 2012 ,in Assi ganga river valley due to cloud burst under construction Kaldigahat and Assi ganga Phase-I and II Hydro electric project caused disaster and Bhagirathi ganaga in Maneri Chal phase II caused lots of destruction. There is no account or record of the deaths of the workers . The villages along Assiganga have been badly affected. The pathways have been eroded . But no action, no enquary has been setup on the dam builder.
Under this situation our struggle is on against dams to save our rivers and our rights over on natural resouces.
Narendra Pokhriyal, Bindadevi, Ramlal, Keshridevi, Vimalbhai

Tuesday, 12 March 2013

प्रैस विज्ञप्तिः 12 मार्च 2013

टिहरी बांध प्रभावितों की नई सम्पशार्विक नीति पुराने अनुभवो के आधार पर बने

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने श्री एन. डी. जुयाल व शेखर सिंह बनाम भारत सरकार और दूसरे चल रहे  मुकद्दमों में 5 मार्च 2013 को दिये गये आदेश में कहा है कि राज्य सरकार के पुनर्वास निदेशालय के अधिकारी व टीएचडीसी के अधिकारी राज्य उर्जा सचिव की अध्यक्षता में बैठें और सम्पाशर््िवक नीति में उठ रहे मतभेदों को दूर करें ताकि टिहरी जलाशय के चारों तरफ भिलंगना व भागीरथी घाटी में जलाशय के कारण हो रही क्षति से प्रभावित व्यक्ति/परिवारों का समुचित पुनर्वास हो सके।

19-10-2010 को राज्य सरकार की समिति ने स्थलीय निरीक्षण किया और उसके बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 30 जनवरी 2013 के आदेश के बाद 14 जनवरी को सम्पाशर््िवक नीति अधिसूचित हुई। अधिसूचना में जमीनी सच्चाईयों का पूरी तरह अभाव है। टिहरी और कोटेश्वर बांधों के जलाशय की डूब से हुये विस्थापित लोगों की पुनर्वास की समस्याये आज तक नही सुलझ पाई है। नीति को देखने के बाद मालूम पड़ता है कि इससे कोई सबक नहीं लिया गया है।

13 मार्च को उर्जा सचिव उत्तराखंड की अध्यक्षता में पुनर्वास निदेशालय के अधिकारी व टीएचडीसी के अधिकारियों की बैठक होने वाली है। 1989 से टिहरी बांध की समस्या और प्रभावितों के बीच काम के आधार पर प्रभावितों की ओर से हमने उर्जा सचिव और पुनर्वास निदेशक को सुझाव भेजे है।

नई सम्पाशर््िवक नीति बहुत ही सीमित अर्थों में बनाई गई है जिसमें सिर्फ जलाशय से व्यक्तिगत परिवारों पर होने वाले प्रभावों को देखा जा रहा है। नीति में नुकसान को व्यक्तिगत तौर पर लिया गया है। इस बात को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है कि यह नुकसान व्यक्तिगत नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र में होगा।

पत्र के कुछ खास बिन्दु हैः- भूस्खलन रुकता नही, सामकेतिक योजना का आभाव है, भूमिहीनों का भी पुनर्वास हो,बेनाप/कब्जाधारी भूस्वामियों का पुनर्वास हो, फ्री स्टाम्प ड्यूटी हो, भवन निर्माण के लिये कर्ज, पुनर्वास स्थलों पर सामुदायिक सुविधाये, पुनर्वास सामुदायिक होना चाहिए न कि व्यक्तिगत इकाई के रूप में। विस्थापितों को पूर्व में बने पुनर्वास स्थलों के आस-पास ही स्थान दिया जाये ताकि उनकी अपनी पहचान बरकरार रह सके। विस्थापितों को चुनने का अधिकार हो। 1. पहाड़ में; 2. मैदानी क्षेत्र में; 3. अपनी मनचाही स्थल पर जमीन खरीदने का। तीसरी दशा में सरकार उनको जगह खरीदने में मद्द व मूल्य राशि उपलब्ध करानी होगी। नई सम्पाशर््िवक नीति में लिखे गये पुनर्वास व मुआवजे के लिये तौर-तरीके व दिशा-निर्देश स्पष्ट नहीं है। जोकि आने चाहिये।

ज्ञातव्य है कि नवम्बर 2011 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कारण ही टीएचडीसी ने पुनर्वास कार्यो को पूरा करने के लिये एक अरब से ज्यादा पैसा दिया। यह बताता है कि टिहरी बांध परियोजना की पुनर्वास नीति और उसके क्रियान्वयन में कितनी खामियां हैं। आज टिहरी बांध से बिजली उत्पादन चालू हुए लगभग 7 वर्ष होने वाले हैं किन्तु आज तक जलाशय स्तर 835 मीटर के नीचे के प्रभावितों का पुनर्वास भी नहीं हो पाया। जिस कारण सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्ण जलाशय भरने की अनुमति नहीं प्रदान की है। यह बैठक भी इसीलिये ही हो रही है।

सर्वोच्च न्यायालय में श्री एन. डी. जुयाल व शेखर सिंह बनाम भारत सरकार केस में टीएचडीसी द्वारा उठाये गये प्रश्नों के संदर्भ में हमारा मानना है कि     जनप्रतिनिधि का समिति में होना जरुरी है साथ समिति में बांध प्रभावितों का भी एक प्रतिनिधी होना चाहिये। जलाशय से प्रभावित होने वाले भी बांध परियोजना से ही प्रभावित माने जाने चाहिए इसलिए उनको टिहरी बांध परियोजना की पुनर्वास नीति 1998 के अनुसार 2 एकड़ भूमि मिलनी चाहिए। टीएचडीसी का कहना है कि जलाशय के चारों तरफ आठ गांवों में 453.15 हेक्टयेर भूमी उपलब्ध है।  इस संदर्भ में पहला प्रश्न यह है कि टीएचडीस ने यह भूमि अन्य विस्थापितों को उपलब्ध क्यों नहीं कराई। दूसरा प्रश्न की यह ज्यादातर भूिम भी उसी प्रभावित क्षेत्र में आ रही है। तीसरा प्रश्न यह सभी विस्थापितों के लिए पूर्ण नहीं होगी। इसलिए इस भूमि को मात्र एक विकल्प के रूप में रखा जाये न कि अंतिम विकल्प में। जिसके लिये विस्थापितों की सहमति आवश्यक हो।
आजतक के अनुभवों के आधार पर टिहरी बांध के विस्थापितों के मानवीय पुनर्वास के लिए जरूरी है-
1-विस्थापन भूमिअधिग्रहण कानून के तहत होना चाहिये।2-भूमिअधिग्रहण की प्रक्रिया समयबद्ध हो- 3-विस्थापन की प्रक्रिया के बीच किसी पात्र कि मृत्यु होने पर उसके आश्रितों को पात्र माना जाए।4-धारा 4 लगने के समय 18 वर्ष के व्यक्तियों को पात्र माना जाए-5-जमीन दो एकड़ से कम नही हो-6-मकान के मुआवजे से पहले जमीन दी जाये-7-रोजगार सम्बन्धित शासनादेश को तुरन्त क्रियान्वित किया जाये-8-जमीन का भूअधिकार दो, फिर जमीन लो-9-गांव को बुनियादी सुविधाओ के साथ सामूहिक रूप से बसाया जाए-10-पुनर्वास के लिए दूसरो का विस्थापन नही हो-11- पुनर्वास महायोजना-टिहरी बांध की पर्यावरण स्वीकृति 19 जुलाई 1990 को दी गई थी जिसमें पुर्नवास की महायोजना बनाना एक शर्त थी। जो आजतक पूरी नही हो पाई। नतीजा है कि पुनर्वास में इतनी समस्यायें है। इसलिये अब जो विस्थापन हो रहा है कम से कम उसके लिये एक महायोजना जिसमें सभी पात्र विस्थापितों के लिए जमीन और संसाधन की बात हो साथ ही उसकी एक कार्य योजना भी। 12-जानकारी-लोगांे को उनके अधिकारों की जानकारी प्रशासन द्वारा ग्राम स्तर पर प्रदान की जाये। 13-पुनर्वास विभाग के शिविर गांव स्तर पर लगे-प्रभावितों के खर्च, समय व साधन बचाने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिये यह जरुरी है। 14-घाटे में चल रहें उद्यान, आलू फार्म चाय बगान व इस तरह के क्षेत्र मालूम करके विस्थापितों को दिये जा सकते है।-15-उद्यानकृर्षि के फार्म वाली सरकारी योजनाओं में विस्थापितों को शामिल किये जायें।

वास्तव में जरुरत तो टिहरी बांध परियोजना जिसमें कोटेश्वर बांध भी आता है, विस्थापितों/प्रभावितों के लिये बनी 1998 की नीति की कमियों को नयी परिस्थितियों व अबतक के विस्थापन में आई समस्याओं को देखते हुये उच्चीकृत करना चाहिये। ताकि नये विस्थापितों को भी वही सब नहीं झेलना पड़े जो पूर्व में विस्थापित लोग झेल रहे हैं। वास्तव में सम्पाशर््िवक नीति की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। पुनर्वास नीति 1998 को ही नये संशोधनों के साथ नवीनीकृत करने की जरूरत थी। किन्तु यदि यह सरकार पुनः सम्पाशर््िवक नीति के नाम पर पुनर्वास नीति बना रही है तो उसे यह सब तो करना ही चाहिये। नीति बार-बार नही बनती है। यह एक मौका है कि टिहरी बांध विस्थापितों के साथ न्याय हो। मुख्यमंत्री जी बार-बार अदालत में बांध विस्थापितों के हक के लिये जाने की घोषणा करते रहे है। यह मौका है कि वो अपना कथन पूर्ण कर सकते है।


विमलभाई               
(समंवयक)

पूरण सिहं राणा


Tuesday, 5 March 2013

Releasing new Dam Story on youtube-- Bandh Katha 12 हमारी नई बांध कथा-12

(English message given below)

प्रिय साथी

जिंदाबाद

हमारी नई बांध कथा 12 देखे
। भागीरथीगंगा की सहायक अस्सीगंगा में 3 अगस्त 2012 को बादल फटा। अस्सी गंगा में तीन जलविद्युत परियोजनायंे निमार्णाधीन है। एक और भी चालू हो रही है। लोगो का विरोध जारी है। पर्यटन और ट्राउट मछली के लिये प्रसिद्ध लगभग 25 किलोमीटर लम्बी सुंदर नदी घाटी की तबाही और 50 से ज्यादा मजदूरों की हत्या की जिम्मेदार है, उत्तराखंड जलविद्युत निगम की ये छोटी जलविद्युत परियोजनायें। भागीरथीगंगा में अस्सी गंगा के मिलने के बाद मनेरी भाली चरण-2 जलविद्युत परियोजना के कारण भी तबाही आई। यही सब इस देखे बांध कथा-12

http://youtu.be/N6PevEbI4m8

जल्दी ही इसी विषय पर हमारे 1 5 वें दस्तावेज़  का, बस थोडा इंतजार कीजिये।
विमलभाई



Dear Friends

Jindabad

Have a look of our new Bandh Katha 12 ( Dam story-12) On 3rd August 2012 there was a cloud burst in Assiganga, a tributary of Bhagirathiganga. In Assiganga, three hydroelectric projects (HEP) are under construction. Another one is also starting. Peoples protest is going on. These 'small' HEP of Uttrakhand Jal Vidyut Nigam are responsible for the death of more than 50 workers and destruction of 25 km of beautiful river Valley famous for tourism and "Trout Fish". After the confluence of Assiganga with Bhagirathiganga there was destruction also due to Manari Bhali HEP phase-II. View all these in this Bandh Katha-12.
Soon we are going to bring out our 15th Dastavez (booklet) on the same issue, just wait.......

http://youtu.be/N6PevEbI4m8

Vimalbhai

Tuesday, 26 February 2013

27-2-2013 : स्वामी सानंद के उपवास को समर्थन क्यों?

 27-2-13

स्वामी सानंद के उपवास को समर्थन क्यों?

Author: 
विमलभाई, माटू जनसंगठन
सानंद जी का निर्णय भले ही एकल हो किन्तु वह सरकारी कार्यनीति पर कड़ा प्रहार है। कांग्रेस व भाजपा दोनों राजनैतिक दलों की गंगा के प्रति झूठी आस्था की भी पोल खोलने के साथ कुंभ में जुटे संत समाज और गंगा को लेकर होने वाले सेमिनारों की ओर भी कड़ा इशारा है। स्वामी सानंद 26 जनवरी 2013 से तपस्या में हैं। उन्होंने मध्य प्रदेश में शहडौल जिले के अमरकंटक स्थान से राष्ट्रीय नदी गंगा पर निर्माणाधीन बांधों को लेकर तपस्या शुरू की है। प्राप्त जानकारी के अनुसार वे अभी बनारस गये है। उनकी यह तपस्या सरकार के गंगा पर बांधों की ढुलमुल नीति को लेकर है। उनका कहना है कि उत्तराखंड में गंगा के पांचों प्रयागों के ऊपर सभी निर्माणधीन बांधों पर सरकार रोक लगाये। श्री जीडी अग्रवाल जी जो कि अब सन्यास लेकर स्वामी सानंद बन गये हैं।

17 अप्रैल 2012 में राष्ट्रीय नदी गंगा घाटी प्राधिकरण की अंतिम बैठक में यह तय हुआ था की गंगा और उसके सहायक नदियों के न्यूनतम प्रवाह पर एक समिति बने। .सरकार ने राष्ट्रीय नदी गंगा व उसकी सहायक नदियों में लगातार बहने वाला पानी कितना हो? यह तय करने के लिये योजना आयोग के सदस्य श्रीमान् बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता में विभिन्न मंत्रालयों की एक समिति बनाई है जिसकी रिपोर्ट मार्च 2013 में आने की संभावना है।

इसमें भी सरकार का रवैया बहुत ही घपले का रहा है क्योंकि बांधों पर कोई रोक लगाये बिना न्यूनतम प्रवाह की बात बेमानी सी लगती है। इस समिति की रिपोर्ट भी आगे सरकती जा रही है। सरकार ने बहुत चालाकी से रिपोर्ट निकालने का समय कुंभ के बाद का समय रखा है।

सानंद जी का निर्णय भले ही एकल हो किन्तु वह सरकारी कार्यनीति पर कड़ा प्रहार है। कांग्रेस व भाजपा दोनों राजनैतिक दलों की गंगा के प्रति झूठी आस्था की भी पोल खोलने के साथ कुंभ में जुटे संत समाज और गंगा को लेकर होने वाले सेमिनारों की ओर भी कड़ा इशारा है।

कांग्रेस ने भी शंकराचार्य जी के यहां अपने मंत्री भेजे, बैठकें करवाईं पर कोई सशक्त कदम नहीं उठाया। मजे की बात है कि 18 जून 2012 को दिल्ली में जंतर-मंतर पर उन्हीं शंकराचार्य जी धरना देते हैं, कांग्रेस के नेता आते हैं। किन्तु धरने से पहले ही सरकार ने बीके चतुर्वेदी समिति बना दी। धरने में जमकर गंगा की बात करने वाले प्राधिकरण के गैर सरकारी सदस्य 15 जून को बीके चतुर्वेदी समिति के सदस्य भी बना दिये गये थे। किन्तु धरने पर यह बात नहीं बताई गई। क्योंकि सानंदजी ने तपस्या का रास्ता चुना है। इसलिए यह भी देखना होगा की 2010 के कुंभ से अब तक संत समाज ने क्या-क्या किया। माटू जनसंगठन के साथियों ने जाकर पिछले कुंभ में बांधों की समस्त जानकारी भी दी। जानकारी के आधार पर विश्व हिन्दू परिषद ने भी मात्र हल्ला मचाया किन्तु ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे तत्कालीन भाजपा सरकार को कोई समस्या आये। बल्कि हर की पैड़ी पर बैठे अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष के उपवास को भी तुड़वा दिया। और कुछ संतों की 'गंगा पर बांध रोको वरना कुंभक्षेत्र नहीं छोड़ेगें' की घोषणा को भी खत्म करवाया गया।

बाबा रामदेव जी भी गंगा पर एक धरना देकर काले धन के सवाल पर चले गये। उत्तराखंड सरकार ने तो एक मंत्री को ही इस काम में लगा रखा था कि हल्ला होने दो पर कोई तार्किक परिणति ना होने पाये।

कांग्रेस ने भी शंकराचार्य जी के यहां अपने मंत्री भेजे, बैठकें करवाईं पर कोई सशक्त कदम नहीं उठाया। मजे की बात है कि 18 जून 2012 को दिल्ली में जंतर-मंतर पर उन्हीं शंकराचार्य जी धरना देते हैं, कांग्रेस के नेता आते हैं। किन्तु धरने से पहले ही सरकार ने बीके चतुर्वेदी समिति बना दी। धरने में जमकर गंगा की बात करने वाले प्राधिकरण के गैर सरकारी सदस्य 15 जून को बीके चतुर्वेदी समिति के सदस्य भी बना दिये गये थे। किन्तु धरने पर यह बात नहीं बताई गई।

यह भी बात ध्यान रखने वाली है कि ज्यादातर गैर सरकारी सदस्य गंगा पर बांधों के ज़मीनी संघर्ष से दूर और सेमिनारों में ज्यादा उलझे रहते हैं। और सरकारी समिति में क्या हुआ उसे गंगा पर चल रहे आंदोलनों के साथ बांटते भी नहीं हैं। दूसरी तरफ आंदोलनों के प्रतिफल सामने है। पिंडर घाटी में पूरा बांध विरोधी आंदोलन खड़ा है। अनेकों जगह धरने प्रदर्शन चालू हैं। अदालतों ने भी अनेक बांध विरोधी निर्णय दिये हैं।

इस बीच भाजपा की नेत्री उमा जी ने समग्र गंगा की बात उठाई, किंतु गंगा पर बन रहे बांध के बारे में उन्होंने कभी भी सार्थक विरोध नहीं किया। श्रीनगर में बन रहे बांध के संदर्भ में भी उन्होंने कहा कि उनका आंदोलन सिर्फ धारी देवी को बचाने तक का है। वो बात और है 2012 के मानसून में शासन-प्रशासन की मदद से बांध में पानी भरा। धारी देवी भी डूबीं। उमा जी मूलत: बांध के विरोध में नहीं है। कैसे हो सकती हैं भला? मध्यप्रदेश में उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में इंदिरा सागर में पानी भरा गया और हरसूद शहर को डुबाया गया जिसके विस्थापितों को नर्मदा बचाओ आंदोलन के प्रयासों से बाद में कुछ राहत मिल पाई है।

जरा टिहरी बांध आंदोलन के समय की स्थिति याद करें। सुंदरलाल बहुगुणा जी के 45 दिन के उपवास को मई 1992 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल बोरा जी ने पुर्नसमीक्षा का झूठा आश्वासन देकर तुड़वाया था। किंतु कांग्रेस सरकार ने किया नहीं। बाद में जनता दल की सरकार ने भूकंप के संदर्भ में बांध की पुर्नसमीक्षा तो की। किन्तु बात भूकंपवेत्ताओं की नहीं वरन् अफसरों की मानी गयी। यही हाल पुनर्वास और पर्यावरण पर बनाई समिति का हुआ।की रपोर्ट आई तो उसको नहीं माना और वही किया जो अफसरों ने कहा। नजीता सामने है। टिहरी बांध के पर्यावरण और पुनर्वास के सवाल आज तक हल नहीं हो पाए हैं, और बढ़ते ही जा रहे है।

अब प्रधानमंत्री का गंगा के प्रति तथाकथित समर्पण होने के बावजूद भी समिति बैठाओ, मामला आगे टालो वाली नीति रही है बिना दाँत-नाखून का गंगा प्राधिकरण बना दिया।

संभवतः सांनद जी यही सब समझते है अब संत बने है और सच्चा संत किसी की आलोचना नहीं करता, बस अपने से ही कुछ करता है। हमारा उन्हें समर्थन है। और उम्मीद है कि शायद सरकार-समाज-अन्य संत यह समझेंगे की अविरल गंगा के बिना निर्मल गंगा नहीं हो सकती। जिनके हाथ में निर्णय है, जो निर्णय को प्रभावित कर सकते है और जो निर्णय लेने वालो के सामने या पीछे से साथ हैं उनसे किसी सही सार्थक कदम की अपेक्षा है। तभी सानंद जी को भी बचाया जा सकता है और गंगा को भी।

Saturday, 2 February 2013

Press Note: February 2, 2013

हिन्दी प्रैस नोट के लिये कृप्या नीचे देख


Vishnugad-PipalKoti Dam project does not have 2nd Phase environmental clearance
Proposed Vishnugad-Pipalkoti Dam project on Alaknanda River in Uttarakhand has been stopped and environmental clearance has not been given yet. On 25th of January 2013 some English newspaper wrongly reported about the clearance of this project purporting it as an order of Supreme Court.
Challenges and outcome of environmental clearance of Vishnugad-Pipalkoti Dam in Supreme Court:
There is nothing with regards to environmental clearance in Supreme Court’s order and this vicious propaganda is set up to built a pressure in favour of the Dam. Order just says "Civil Appeal is dismissed". The copy of the judgement is attached which can make clear sense.
The environmental clearance is not yet given for 2nd phase of work and the work cannot start without this permission. Ministry of Environment and Forest gave instruction on National Green Tribunal (NGTs) order on 14th November 2011
The Tribunal also directed the Ministry of Environment and Forest (MoEF) to setup an appropriate committee of experts drawn from IITR and WII in the preparation of CIA report of the five projects considered in WII report to integrate the physical, biological and social impacts in making comprehensive cumulative impact assessment report and frame appropriate conclusions and recommendations within a reasonable timeframe for consideration and final review by the Ministry of Environment and Forest to avoid any unforeseen environmental and ecological threat in the study area.
To ensure sound evaluation of forestland diversion proposals MoEF was asked to prepare the guidelines for cost benefit analysis, may be updated/modified to provide clear instructions regarding the various cost and benefit elements to be incorporated for the purpose of arriving at cost benefit ratio and applications for Forest Diversion will be done following the prescribed procedure.
In interest of future of the people and environment activists Vimalbhai and bharat Jhunjhunwala filed a petition to implement the same order in Vishnugad-Pipalkoti project, which was rejected by Court. Still without environmental clearance for 2nd phase THDC can’t start work.
And it is also relevent here tell that Government of Inida has established a committee under r. B.K. Chaturvedi (member, Planning Commission) which consist different Ministries, to decide the water level in Ganga and its tributaries. The report is expected in March 2013.
Later, this rumour was taken by one NGO who is working with World Bank and various other state schemes/projects, and published in various other newspapers. We want to clarify that all these news are baseless and not true. Disconnected from the impact of the dam on affected communities, it is clear that only those people speak in favor of the Dam whose own interests are closely linked with it, who never fought for the rights of the affected people and has nothing to do with sustainable development of the state and environmental justice. The realty of those people who expressed opposition for the Dam at the time of public hearing, are exposed when they sees the contracts and benefits given by the authorities to them.
The case of the failure to rehabilitate the displaced people is still pending in Supreme Court (N.D. Juyal and Shekhar et al Vs State of India and others), but the orders are still not followed properly by the authorities. The Court has slammed the authorities (T.H.D.C. and state Govt. of Uttarakhand) for failure of action. If not for this pressure from the Court even what little has been done in the name of rehabilitation would not have been done.
People are protesting due to this environmental lose and failure to rehabilitate the displaced.
Local Condition of affected area:
The protest continues at local level, it is to remember that due to petition by local people, World Bank was not consider funds this project in July 2010.
One tunnel for the Dam’s power house is being extracted from the bottom of Harsari Village, resulting crack in people’s houses, loss to present crop. Affected people stopped the work. In March 2012 the affected village was visited by District Magistrate and later by the World Bank officials. Till date compensation for these losses not yet received despite seeing all the problems occurred. Affected villagers from Harsari were assured that the direction of tunnel will diverted, but THDC started building another tunnel in July 2012 just 10 meters away without even consulting the villagers. THDC frequently misleads the affected people and administration.
Now, THDC claims to give further space for negotiation with affected people, but so far have been avoiding talking about earlier losses. The Dam affected people are in constant pressure first to give consent to the Dam before talking about their earlier losses, but gives no guarantee of compensation. The remaining water level is on the verge of drying due to current explosions in Harsari village.
Same is going to happen in Durgapur village. Gulabkoti and una villages are also falling into same problems. The road is being built in Naurakh village without approval by Forest Department and the local contractor left by just paying fines to the Sarpanch. The THDC have not taken any responsibility for this as well as for the local employment.
We are not affected by rumors thaqt are being spread. We will continue our fight to keep Uttarakhand environment better, which is improtant for the country and fight for the people's right over on natural resources and better rehabilitation for already affected by dams.
Vimalbhai
Puran Singh Rana

विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध को अभी द्वितीय चरण की वन स्वीकृति नही है।

उत्तराख्ंाड में अलकनंदागंगा पर प्रस्तावित विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध परियोजना पर अभी रोक जारी है। 25 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय के हवाले से जारी अंग्रेजी के एक अखबार में भ्रामक खबर आई और उसके बाद विश्वबैंक व अन्य सरकारी परियोजनाओं से जुड़ी देहरादून स्थित एक एनजीओ वक्तव्य जारी किया गया जिसे कई अन्य अखबारों ने छाना है। हम बताना चाहेगें की इस तरह से फैलाई गई बातें भ्रामक, तथ्यहीन, आधारहीन है।

विष्णुगाड-पीपलकोटी की वन स्वीकृति को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौति और परिणामः-
सर्वोच्च न्यायालय के 24 जनवरी, 2013 के आदेश में ऐसा कही कुछ नही लिखा है। जिसे प्रचारित किया जा रहा है। सब सही नही है और बांध के पक्ष में हवा बनाने के लिये यह दुष्प्रचार है। आदेश में सिर्फ याचिका को निरस्त करने के बारे में लिखा है केस आदेश की प्रति संलग्न है। जिसे पढ़कर सही स्थिति मालूम होती है।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के 14 नवंबर 2011 के आदेश में पर्यावरण एंव वन मंत्रालय को निर्देश दिया गया था कि वो विभिन्न बांध परियोजनाओं में भौतिक, जैविक और सामाजिक दृष्टि से एक-दूसरे पर पड़ने वाले असरो पर एक उचित समिति बनाये जिसके निणर्य व सिफारिशे निश्चित समय पर आये ताकि लाभ-लागत का अनुपात निकालने में पर्यावरण एंव वन मंत्रालय को अंतिम निर्णय लेने के समय अनचाही पर्यावरणीय एंव पारिस्थितिकीय खतरे को दूर किया जा सके। पर्यावरण एंव वन मंत्रालय वन भूमि हस्तंातरण के सही मूल्यांकन के लिये लाभ-लागत निकालने के लिये स्पष्ट दिशा-निर्देशों को तैयार करे।

उत्तराखंड के पर्यावरण व निवासियों के भविष्य के हित में विमलभाई और भरत झुनझुनवाला ने सर्वोच्च न्यायालय में इसी आदेश को विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना पर भी लागू करने के लिये याचिका दायर की थी। जिसे सर्वोच्च अदालत ने स्वीकार नही किया। किन्तु अभी कानूनी रुप से टीएचडीसी बांध काम नही कर सकती है। बिना द्वितीय चरण की वन स्वीकृति के बांध का काम नही हो सकता है। जो कि अभी नही मिली है।

सरकार ने राष्ट्रीय नदी गंगा व उसकी सहायक नदियों में लगातार बहने वाला पानी कितना हो यह तय करने के लिये योजना आयोग के सदस्य श्रीमान बी. के. चतुर्वेदी की अध्यक्षता में विभिन्न मंत्रालयों की एक समिति बनाई है जिसकी रिपोर्ट मार्च 2013 में आने की संभावना है। विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध का भविष्य इस समिति की रिर्पोट पर भी निर्भर करता है।

इन सब बातो से जाहिर है कि बांध के प्रभावों को, बांध पीड़ितों की समस्याओं को समझे बिना सिर्फ बांध के पक्ष में वे ही बोल सकते है जिनके हित बांध के साथ जुड़े है। जिन्होने कभी बांध प्रभावितों की लड़ाई नही लड़ी है। जिन्हे उत्तराख्ंाड के स्थायी विकास और पर्यावरण सुरक्षा से कोई मतलब नही है। बांध की जनसुनवाई के समय विरोध में खड़े कुछ व्यक्ति अब कितने ठेके और दूसरे लाभ लेकर बैठे है यह जानने से उनके बांध समर्थन की सारी असलियत सामने आ जाती हैं।

टिहरी बांध विस्थापितों के पुनर्वास ना किये जाने पर माननीय सर्वोंच्च न्यायालय में चल रहे एन0 डी0 जुयाल और शेखर सिंह बनाम भारत सरकार व अन्य तथा विस्थापितों के दूसरे मुकद्दमें चल रहे है। जिसमें लगातार दिये गये आदेशो के बावजूद भी उनकी पालन नही हो रहा है। माननीय न्यायाधीशों को कड़ी टिप्पणियंा करनी पड़ी है। यदि अदालत का दवाब नही होता तो पुनर्वास के नाम पर जो हुआ है वो भी नही होता।

इन्ही कार्यतर बांधों में हो रही पर्यावरण व विस्थापितों की दुर्दशा परिप्रेक्ष्य में बांधों का विरोध हो रहा है।

बांध प्रभावितों की स्थितिः-
स्थानीय स्तर पर विरोध जारी है। ज्ञातव्य है कि जुलाई 2010 में भी स्थानीय लोगो के पत्र के आधार पर विश्व बैंक ने इस परियोजना को वित्तीय सहायता देने पर विचार नही किया था।
बांध के पावर हाउस के लिये जाने वाली सुरंग हरसारी गांव के नीचे से निकाली जा रही है। जिसके कारण 2004 से लोगो के घरो में दरारंे आई, जलस्त्रोत सूखे, खड़ी फसल का नुकसान हुआ। प्रभावितों ने काम रोककर रखा। 15 मार्च, 2012 को जिलाधीश महोदय व बाद में विश्व बैंक के अधिकारी भी गाँव आकर समस्याओं को देख गए है। किन्तु इन सब नुकसानों का मुआवजा आजतक नही मिला है।  आश्वासन दिया गया कि हरसारी गांव के प्रभावितों से बात करके सुरंग का रुख बदला जायेगा। किन्तु टीचडीसी ने एक तरफ़ा कार्यवाही करके बिना प्रभावितों से चर्चा किये जुलाई 2012 में दूसरी सुरंग का निर्माण का कार्य शुरू कर दिया। जो कि पूर्व सुरंग से मात्र 10 मीटर अलग है। टीएचडीसी लगातार प्रशासन व प्रभावितों को गुमराह कर रही है।

टीएचडीसी प्रभावितों को आगे के विकल्प देने की बात कर रही है किन्तु अब तक के हुये नुकसानों की बात को टाल रही है। प्रभावितों पर दवाब है कि वे पहले बांध की स्वीकृति के लिये हामी भर दे फिर वे उनके पूर्व में हुये नुकसानों पर चर्चा कि जायेगीे। इसमें भी भरपाई की गारंटी नही है। वर्तमान में हो रहे विस्फोटों से हरसारी गांव का शेष पानी भी सूखने कि कगार पर है। दुर्गापुरगांव में भी यही होने वाला है। गुलाबकोटी व यूंणा आदि गांवो की जमीनों में मक डालने से समस्यायें हो रही है। नौरख गांव में बिना वन स्वीकृति के बांध के लिये सड़क निर्माण किया जा रहा है, जिसे वन विभाग ने रोका है। स्थानीय ठेकेदार को नौरख के वन सरपंच ने मात्र जुर्माना लगाकर छोड़ा है। किन्तु टीचडीसी ने इसमे कोई जिम्मेदारी नही ली। यह स्थिति स्थानीय रोजगार की है।

हम फैलाई जा रही अपवाहो से परेशान होने वाले नही है। हम उत्तराखंड के पर्यावरण जोकि देश भर  के लिये महत्वपूर्ण है और लोगो के प्राकृतिक संसाधनों के अधिकारों तथा पहले से प्रभावित हो चुके लोगो के उचित पुनर्वास के लिये अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

विमलभाई

पूरण सिंह राणा