Monday, 9 January 2012

Reality of dams in Uttarakhand

Here we are showing some of the small films which show the reality of dams.

No monitoring, No liability, No responsibility, No concern for environment.

But still dams are for the nation building.



यहंा हम कुछ फिल्में दिखा रहंे है जो बताती है बांधों की असलियतें।

कोई निगरानी नही, कोई जिम्मेदारी नही, कोई उत्तरदेयता नही, कोई पर्यावरण संरक्षण की बात नही।

फिर भी बांध देश के विकास के लिये है?



Sunday, 1 January 2012

माटू दस्तावेज़ Matu Dastavaz

हमने पिछले वर्षो में बांध खासकर उत्तराखंड के, बांधों के विषय में 14 दस्तावेज़ प्रकाशित किये है। हमने सिर्फ टिहरी बांध की पुनर्वास व पर्यावरण की समस्याओं से संबंधित चैाथे दस्तावेज़ को हिन्दी व अंग्रेजी दोनो भाषाओं में प्रकाशित किया है। शेष सभी हिन्दी में ही है। अभी 10वां और 14वां दस्तावेज़ उपलब्ध है। अन्य दस्तावेज़ आपको हम पीडीएफ फाईल मे भेज सकते है

We have published 14 Documents related with dam issues. Mostly in Hindi. Many documents we have out of stock. Given here the list. On demand we can send the soft version in pdf file.


हमारे प्रकाशित दस्तावेज़

1. हनुमंतराव समिति की सिफारिशंे
पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणाजी के टिहरी बांध विरोध में 75 दिनों के लम्बे उपवास के बाद सरकार ने 1996 में भूंकप के विषय पर एक समिति बनाई। साथ ही बांध को आगे बढ़ाने के लिये भी पर्यावरण व पुनर्वास के विषय में हनुमंतराव समिति बनाई। उर्जा मंत्रालय के तहत बनी इस समिति में 8 सरकारी व 4 गैर सरकारी सदस्य थे। सरकार ने इसकी रिपोर्ट व सिफारिशंे मानने में 2 वर्ष लगा दिये। तो भी 10 प्रतिशत ही मानी। जिनका पालन भी सही नही हुआ।

2002/हिन्दी/2 रु0

2.टिहरी बांध-बोलती खबरें/आकड़ें

तात्कालिक समय 2002 में टिहरी बांध के विरोध के कारणों और पर प्रकाशित लेख-खबरें-आंकड़ों को इस दस्तावेज़ में संकलित किया गया है। ताकि टिहरी बंाध के विस्थपितों का संघर्ष का दस्तावेज़ीकरण हो सके और अन्य प्रस्तावित बांध क्षेत्रों में प्रभावितांे के सामने यह सत्य आ सके की बांध वालों के दावो-वादों की सच्चाई क्या होती है।

2002/हिन्दी/15 रु0


3. सरकारी शासनादेश

इस दस्तावेज़ मे यह बताने की कोशिश की गई है कि टिहरी बांध संबधी सरकारी आदेश पहले क्या थे और उन पर कितना अमल हो पाया। टिहरी बांध परियोजना की पहली पुनर्वास नीति 1995 में आई थी। बांध की घोषणा 1962 में हुई। जबकि 1976 में प्रभावित जमीन की खरीद-बिक्री पर रोक लग गई थी। 1978 में पहला भू-अधिग्रहण हुआ।

4. विफलता और विनाश की ओर
{टिहरी बांध परियोजना, पर्यावरण - पुनर्वास}

Towards Failure and Devastation

(Tehri Dam Project, Environment& Rehabilitation)

{This Fourth Document is dedicated to all those who have been warning against the dangers of Tehri Dam and who have been fighting for their rights.}
This is the first data base document on Tehri Dam HEP regarding Rehabilitation and Environment issues. Till 2002.This document is an attempt towards raising some of the significant issues. Serious contemplation is required on these issues. Not only because Tehri Dam project is being promoted under the pretext of development, though it is an alarming signal of devastation. But contemplation and wide-ranging discussions become the need of the hour since Uttarakhand projected as a source of bountiful energy, in actuality, spells the destruction of existent perennial rivers, mountains and their inhabitants.
The document also emphasises that question of full rehabilitation is not an isolated one. It is much more than that. Full rehabilitation of the displaced people is chimerical since it is not going to be accomplished in the near future. Manipulation of data, political ambitions, lack of adequate land and rampant corruption reveal that the question of rehabilitation is not an isolated one. Questions such as the cost-benefit ratio of the Dam, environmental devastation and unpredictable seismic movements are as much related. The quantum of silt accumulated in the reservoir is an indicator that it would seriously affect the longevity of the Dam and consequently the amount of power generation would fall far short of projected estimates, notwithstanding the claims of the project authorities.

{यह चौथा दस्तावेज़, टिहरी बांध के खतरों के प्रति आगाह करने वाले, सबके हकों के लिए लड़ने वालों को समर्पित}

आंकड़ो पर आधारित यह पहला प्रकाशन है जिसे हमने ही प्रकाशित किया है। यह टिहरी बंाध परियोजना के 2002 तक के पुनर्वास और पर्यावरण के मुद्दों को पूरी तरह से समेटता है। यह दस्तावेज सिर्फ एक कोशिश है, टिहरी बांध संबन्धी कुछ बिन्दुओ को छूने की। जिन बिन्दुओं को हमने इसमें छुआ है उन पर गंभीर चर्चा की जरूरत है। न सिर्फ इसलिए की टिहरी बांध परियोजना विकास के नाम पर महाविनाश की जननी है। बल्कि इसलिये भी ये चर्चा जरूरी है कि ‘ऊर्जा प्रदेश’ के नाम पर उत्तराखंड की कलकल बहती नदियों, पहाड़ों व उसके रहवासियों के साथ आगे ऐसा खिलवाड़ न किया जाये।

इस दस्तावेज का यह भी कहना है कि प्रश्न समुचित पुनर्वास का ही नही है। अब तक पुनर्वास प्रक्रियाओं को देखते हुये समुचित पुनर्वास एक ऐसा सपना है जो कभी पूरा नही हो सकता है। आंकडो़ के ख्ेाल, राजनैतिक महत्वाकांक्षाये, जमीन की अनुपलब्धता, भ्रष्टाचार ने यह भी बता दिया है कि पुनर्वास का प्रश्न अकेला नही है बांध का लाभ-हानि अनुपात, पर्यावरणीय नुकसान, भूगर्भीय हलचल आदि मुद्दे भी साथ जुडे़ है। झील में भरती गाद बता रही है कि बिजली दावों से कही कम समय तक ही उत्पादित हो पायेगी।

2002/हिन्दी एंव अंग्रेजी/35 रु0

5. बिना जानकारी कैसी जनसुनवाई?

{यह पांचवा दस्तावेज़ समर्पित है नर्मदा बचाओ आंदोलन की शोभा बहन को जिनका संघर्शमय युवाजीवन सरदार सरोवर की दलदल ने लील लिया।}

जलविद्युत परियोजनाओं संबधी पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिर्पोट पर पर्यावरणीय जनसुनवाई की प्रक्रिया को बताता है साथ ही उसमें हो रही धांधलियों को भी सामने लाता है। यह 2004 में प्रकाशित किया गया किन्तु सितम्बर 2006 में इस प्रकिया में बदलाव आया है।

सितम्बर 2004/हिन्दी/15 रु0

6. आखिर टिहरी शहर डुबाया गया!!

{यह छठा दस्तावेज़ समर्पित है उन्हे जो टिहरी शहर में अंत तक समुचित पुनर्वास के लिए संघर्ष करते रहे-डटे रहे। }

भविष्य के इतिहासवेत्ता जब भागीरथी घाटी के बारे में लिखेंगे तो उनके संभवतः ये शब्द होंगे कि देश के विकास के खातिर टिहरी शहर ने जल समाधि ली। किन्तु टिहरी के इतिहास में दफन होने से पहले शहर के लोगों के हक-हकूक जिस तरह छीने गये और शहर से हटने वाला अंतिम व्यक्ति बनने/बनाने की जो कवायद रही है वह भी एक बड़े इतिहास का हिस्सा है।
टिहरी शहर डुबाना अपने में एक बड़ी साजिश थी। उस दर्द की दास्तां लोगों की जुबानी, कमरबंद करके आपके सामने रख रहे है। ये कोशिश इस भ्रम को दूर करने कि है कि टिहरी वालों को खूब मुआवजा मिला।

2005/हिन्दी/10 रु0

7. बांध एक जिदद् नही होता!!!

{यह दस्तावेज समर्पित है उनको जो सबके हित के लिए संघर्श करते है। }

इस संकलन में हिमाचल व उत्तराखण्ड में सतलुज, राबी, ब्यास, एलाईन-दुहंगन, मलाना, सैंज, भागीरथी, धौली गंगा व उसकी सहायक नदियों पर बनने वाली परियोजनाओं के जल विद्युत के संदर्भ में पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिर्पोट पर जनसुनवाई की प्रक्रिया; राष्ट्रीय व पहाड़ी राज्यों की पुनर्वास नीति; व भाखड़ा, टिहरी और नर्मदा कि स्थितियों पर लिखे विमलभाई के लेख संकलित है। लेखांे में कही दोहाराव भी है किन्तु उस लेख की बनावट न बिगड़े इसलिए उसे नही काटा गया है।

पर्यावरण दिवस 2005/हिन्दी/30रु0

8. ऐसा फिर ना हो
{यह आठवां दस्तावेज़ समर्पित है उन मजदूरों को जो टिहरी बांघ, विश्णुगाड आदि बांधों कि सुरंगो में काम करते मारे गये।}
उत्तरांचल में टिहरी जिले में भागीरथी व भिलंगना नदियों के संगम पर बने टिहरी बांध की पहली टरबाईन का औपचारिक रूप से उद्घाटन करते समय 30 जुलाई को केन्द्रीय उर्जा मंत्री श्री सुषील कुमार षिंदे ने टिहरी के विस्थापितों के प्रति आभार जताया और साथ में ये भी क्लेम किया की परियोजना में पुनर्वास की मद में खर्च अब तक किये गये अन्य सभी परियोजनाओं से ज्यादा है। ये दोनों बातें उन विस्थापितों के प्रति एक क्रूर मजाक है जो अपनी सदियों से बसी सभ्यता संस्कृति से उजड़कर ऐसे पुनर्वास स्थलों पर पहुॅचा दिये गये है। जहां उनके लिए बसना नामुमकिन है।
‘‘टिहरी के विस्थापितों का पुनर्वास बहुत अच्छा हुआ है, उन्हें कई बार मिला है’’ ये बातें बहुत दुश्प्रचारित की गई। न तो पुनर्वास की समुचित व्यवस्था हई न ही हर परिवार के कम से कम एक सदस्य को नौकरी दी गई। जब तक पुनर्वास का काम टीएचडीसी के पास रहा उन्होने कोई जमीन की व्यवस्था विस्थापितों के लिए नही की। हां! झूठ बोलने में वे अव्वल रहे है। आम विस्थापित से लेकर उच्चतम् न्यायालय तक में। टिहरी के संदर्भ दावे-वादे-आष्वासन सब झूठे सिद्ध हुये। इस दस्तावेज़ में यह सब सार्थक तरह से रखने कि कोशिश कि गई है कि सरकार व बांध निर्माताआंे के पूर्ण पुनर्वास (?) के नारे के साथ, टिहरी शहर के बाद गांवो को डुबाये जाने की मुहिम की सत्यता को सामने आये।

नवम्बर 2006/हिन्दी/10 रु0

एक फौरी रिपोट
उजाड़ोगे! डुबाओगे! आखिर कब तक?
{यह रिर्पोट समर्पित है पानी के सैंकड़ो वर्ष पुराने इंजीनियर श्री माधो सिंह भंडारी को जिन्हांेने अपने सुपुत्र का बलिदान देकर सबको पानी दिया। जो आज के अंधे विकास के लिए बलिदान लेने कि पद्धति को चुनौती देता है}

यह फौरी रिपोर्ट प्रस्तावित कोटली-भेल जल-विद्युत परियोजना चरण 1 ब प्रभावित क्षेत्र की सही तस्वीर व लोगो की पहचान के साथ परियोजना से जुड़े सवालो को सामने लाने का प्रयास हैै।

मई 2007/हिन्दी/5 रु0

9. गंगा के मायके में!!!

{यह नौवां दस्तावेज़ समर्पित है, हमारे प्रेरणा स्त्रोत पर्यावरणविद् श्री सुन्दरलाल बहुगुणा जी को जिन्होने गंगा के पर्यावरणीय, सांस्कृतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक पक्ष को स्थानीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक उठाया। वे हमेशा एक सुव्यवस्थित हिमालय नीति के लिए प्रयासरत रहे है।}

उत्तराखंड गंगा का मायका माना जाता है। बरसों से टिहरी बांध पर चले संघर्ष ने इस बात को उजागर किया है कि मैदानों में यदि गंगा मैली हुई है तो पहाड़ों में गंगा को बांधकर न केवल उसके प्राकृतिक स्वरुप को नष्ट किया जा रहा है वरन् उसके अस्तित्व को ही समाप्त किया जा रहा है। उत्तराखंड बनने के बाद ऊर्जा राज्य की मुहिम में यह प्रक्रिया और तेज हुई है। जो उत्तराखंड के भविष्य के लिए घातक है।
यह दस्तावेज़ निश्चित रूप में गंगा की उसके मायके में क्या स्थिति है उसको साफ-साफ रखेगा। हमने गंगा से संबधित कुछ तथ्य दिये है। भागीरथी व अलकनंदा पर बांधों के कहर की स्थिति को भी रखा है ताकि ये दस्तावेज और उपयोगी हो सके।

सितम्बर 2008/हिन्दी/25 रु0

10. गंगा की भ्रूण हत्या

{यह दस्तावेज़ उत्तराखंड की उन जुझारु बहनो को जो मिट्टी से जुड़ी है व उसे बचाने के लिए संघर्ष करती हंै, को समर्पित है।}

यह दस्तावेज़ भागीरथी-अलकनंदा-गंगा नदियों पर प्रस्तावित 3 कोटली भेल जल-विद्युत परियोजनाओं पर चले रहे आंदोलन, पर्यावरणीय जन सुनवाईयों के नाटक, लोगांे की चिट्ठियंा, चल रही कानूनी कार्यवाहियों, पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्टाे के झूठ, नेशनल हाइड्रो डेवलपमेन्ट कारपोरेशन के बंाधो के प्रभावों व उसकी पुनर्वास नीति का स्वार्थ आदि बताता है।
कह सकते है कि यह दस्तावेज़, खासकर बांध के मुद्दे पर कार्यरत संगठनो/व्यक्तियों/समूहों/प्रभावितों के लिए बहुत उपयोगी साबित होगा। बांध के संघर्ष को शुरु से समझने व करने के लिए ये भी दस्तावेज़ महत्चपूर्ण है।
पर्यावरणीय, सामाजिक, संास्कृतिक मूल्यों व जरुरी अघ्ययनों आदि को दरकिनार करके बांधो को कैसे सही ठहराने कि कोशिश हो रही है? यह भी इस दस्तावेज़ से मालूम होगा।

अक्तूबर2008/हिन्दी/60 रु0

11. बहे ना बहे

उत्तराखण्ड में किसी भी जलविद्युत परियोजना पर पहली स्वतंत्र जांच रिपोर्ट: लोहारीनाग-पाला जलविद्युत परियोजना
गंगा की मुख्य सहायक नदी, भागीरथी नदी पर गंगोत्री से 50 कि.मी. नीचे नेशनल थर्मल पाॅवर कारपोरेशन (एन.टी.पी.सी.) द्वारा 600 मेगावाट की लोहारीनाग-पाला सुरंग जल विद्युत परियोजना बनाई जा रही है। केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने, ‘‘पर्यावरण प्रभाव आकलन 1994’’ के आधार पर 8 फरवरी 2005 को पर्यावरणीय मंजूरी दी है। जिसके मानकों को ताक पर रख कर बांध निर्माण चालू है। इसी लोहारीनाग-पाला जल विद्युत परियोजना के पर्यावरणीय व सामाजिक दायित्वों की अवहेलना के संदर्भ में पांच सदस्यों के एक स्वतंत्र जांच दल ने (पर्यावरण स्वीकृति के अनुसार) में सरकारी कागजातों, विभिन्न समाचार पत्रों की रिपोर्टांे, बांध प्रभावित गांवांे के भ्रमण के दौरान प्रभावितों से मिलकर व एन.टी.पी.सी. के अधिकारियों से भटवाड़ी, स्थित परियोजना कार्यालय में 23 दिसम्बर 2008 को मिलने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की गई है। स्वतंत्र जांच दल के पास रिपोर्ट से संबधित प्रेस कटिंग, कानूनी कागजात, फोटो, प्रभावितों के पत्र आदि मौजूद है।...............................
(यह परियोजना अभी बंद कर दी गई हैं)

2009/हिन्दी/10 रु0

12. ढोल में पोल

देवभूमि उत्तराखण्ड़ के श्रीनगर शहर में, टिहरी-पौड़ी जिलों में, अलकनंदा नदी पर बन रही 330 मेगावाट की श्रीनगर जल-विद्युत परियोजना जनहक, पर्यावरणीय मापदण्डो, झूठे व धोखाधड़ी से पूर्ण आकड़ांे, कागजातों, आवश्यक कानूनी मापदण्ड़ों की अवहेलना करके बनाई जा रही है।

इस दस्तावेज में यह बताने कि कोशिश है कि कैसे ऊर्जा राज्य के ढोल में पोल है

2009/हिन्दी/10 रु0

13. अविरल गंगा?

इस दस्तावेज़ को 2010 के महाकुंभ के समय इसलिये निकाला गया ताकि लोगो को गंगा की सही अर्थ व स्थिति मालूम हो सके व गंगा पर कार्यरत, निर्माणाधीन व प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना के बारे मे जन जागृति हो सके। इतने बांधो के बाद क्या गंगा अविरल बचेगी? गंगा के रक्षण का मामला प्रदूषण के साथ गंगा घाटी की जलविद्युत परियोजनाओं को बंद करने से जुड़ा है।

जनवरी 2010/हिन्दी/10 रु0

14. पिंडर का जनसंघर्ष

एक के बाद एक पर्यावरणीय जनसुनवाईयों का नाटक, राष्ट्रीय गंगा नदी की फिलहाल एकमात्र स्वतंत्र बहती पिंडर नदी
घाटी में संस्कृति-समृद्धि-स्वतंत्रता पर हमले के खिलाफ चल रहे संघर्ष का दस्तावेज़।

2011/ हिन्दी/ 40 रु0

Youtube links........ Bandh katha......

On these youtube links you can see some dam related real films by matu.....
we always update
--Landslides_In_Pindar_Valley_2010--
Story of propossed Devsari HEP (252 MW) on Pinder River
--Bandh katha -1--
--Bandh Katha-2--
Video on "Envirnmental Public Hearing" 20-1-2011, held at Village Chepdu on proposed Devsari HEP (252 MW) on Pinder River
--Bandh Katha-3--
Video on Peoples' "Public Hearing" 3-4-2011, held at Sangam maidan, Deval on the issue of Dams on Pinder River

The Reality of a Public Hearing, a part from Naitwar-Mori HEP (60MW) Environmental Public Hearing. 3-5-2011
Bandh Katha 5 (1 of 2) & (2 of 2)


प्रैस नोट: पिंडरघाटी में संघर्ष जारी है 13-12-2011

‘‘नदी के निचले व ऊपरी हिस्सों में प्रस्तावित/पहले से कार्यरत परियोजनाओं के विषय में कोई जानकारी नहीं दी गई है। इस क्षेत्र में नदी के सूखने के मुद्दे का हल कैसे निकाला जाएगा? जलग्रहण क्षेत्र की जानकारी नहीं है और यह भी स्पष्ट नहीं होता कि इससे कोई पारिस्थितिकीय क्षति नहीं होगी। मानसून में बांध के नीचे कितना पानी छोड़ा जाएगा, इसकी भी जानकारी शामिल नहीं है। सुरक्षा दीवारों तक की ऊंचाई व मलबा फेंकने के स्थानों की योजना सही व पूरी नही है। नदी में शीज़ोथोरैक्स व अन्य मछलियों के विशिष्ट प्रजनन स्थलों की जानकारी नही दी गई है। विस्तृत पर्यावर्णीय प्रवाह अध्ययन किया जाए। नदी के विभिन्न भागों में उसकी गहराई व गति के साथ उसके पर्यावर्णीय प्रवाह की कोई यह एक भूकंपीय क्षेत्र है, भूकंप के बाद यहां काफी भू-स्खलन होता है। आस-पास के क्षेत्रों में सुरंग आदि निर्माण कार्य से होने वाले प्रभावों की विस्तृत जानकारी नही है। परियोजना क्षेत्र में बाढ़ पूर्वसूचना प्रणाली नही है। बांध टूटने की स्थिति का विश्लेषण और आपदा प्रबंधन योजना नही है।’’

ये सब 29 और 30 अप्रैल 2011 को संपन्न पर्यावरण आकलन समिति (नदी घाटी एवं जलविद्युत परियोजनायें) में प्रस्तावित देवसारी जल-विद्युत परियोजना (252 मेवा) पर की गई कार्यवाही में थी। बांध निमार्णकर्ता कंपनी, सतलुज जल वि़द्युत निगम को इस पर अघ्ययन करने थे। इससे मालूम पड़ता है कि बांध की पर्यावरण प्रभाव आकलन और पर्यावरण प्रबंध योजना में कितनी सारी गंभीर खामियंा है और यह गलत बनाई गई हंै। हमने इन बातों की आशंका पहले ही कही थी। आश्र्चय की बात है की बांध कंपनी ने ये सब जानकारियंा जिन्हे बनाने में साल से ज्यादा समय लगता उन्हे 3-4 महिनों महिनों में ही तैयार करके फिर से मंत्रालय में दाखिल कर दिये। 12 नवंबर को फिर पर्यावरण आकलन समिति के सामने ये विचार के लिये आ गया था।

ज्ञातव्य है कि उत्तराखंड के चमोली जिले में, पिडंर नदी पर प्रस्तावित देवसारी जल-विद्युत परियोजना का शुरु से ही विरोध हो रहा है। बांध हेतु दो जनसुनवाईयों में लोगो का पूरा विरोध रहा। तब बांध कंपनी ने बैरिकेट लगाकर, जनता को दूर रखकर जनसुनवाई का नाटक पूरा किया। पिंडर घाटी के निवासियों के विरोध के बावजूद, अनियमितताओं से पूर्ण, जबरदस्ती कराई गई इस पर्यावरणीय जनसुनवाई के बाद पिंडर की जनता ने इस अपमान का पूरा विरोध धरने, रैली, प्रदर्शनों के रुप में लगातार किया है। इसके बाद 3 अप्रैल 2011 को देश के विज्ञजनों के सामने हुई लोक की ‘‘जनसुनवाई’’ में शामिल पिंडर घाटी के हजारों लोगो द्वारा जनता का पूरा विरोध सामने खुलकर प्रदर्शित हुआ है। उसकी सारी कार्यवाही की विडियो व लिखित रुप में भी हमने केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेजी है। जिसका नतीजा था कि प्रस्तावित परियोजना को तुरंत स्वीकृति नही मिली।

हर गांव में संघर्ष जारी है। थराली गांव में पुलिस भेजकर, पिंडर घाटी के साहसी लोगो को डराकर काम शुरु करने देने के लिये दवाब बनाना। पैठाणी गांव में जहंा पावर हाउस बनना है वहंा भी महिलाओं ने काम रोक रखा है। जिस कारण अभी बांध की विस्तृत परियोजना रिर्पोट नही बन पाई है। चमोली जिले की पूर्व मे बनी और निर्माणाघीन परियोजनाओं के कारण पर्यावरण हानि और क्षेत्र के लोगो पर बुरे असर सामने दिख रहे है। उनका समाधान नही हुआ है। मंदाकिनी घाटी भी यही स्थिति है। हम यह सब पिंडर घाटी में नही होने देंगे।

यह क्षेत्र भूकंपग्रस्त है और यहंा के गांवो में भूस्खलनों का सैकड़ों सालो का इतिहास रहा है। 2010 व बाद के मानसून में भूस्खलनों को प्रशासन ने रिकार्ड में छुपाने की कोशिश की। बांध की सुरंगे इन्ही गांवो के नीचे बन रही है। नंदादेवी राजरात यात्रा का प्राचीन पवित्र यात्रा मार्ग भी इन्ही गांवों से होकर जाता है।

पिंडर नदी ही राष्ट्रीय नदी गंगा की एकमात्र स्वतंत्र बहती नदी शेष है। पर्यावरण मंत्रालय स्वंय की पहल पर इसे स्वतंत्र नदी घोषित करें। लोग तो लड़ेंगे ही।

माटू जनसंगठन व भू-स्वामी संघर्ष समिति की ओर से

दिनेश मिश्रा, सुरेंद्र रावत, महिपत सिंह कठैत, सुभाष पुरोहित, सुरेन्द्रर परिहार, केडी मिश्रा, बलवंत आगरी,
मदन मिश्रा व विमलभाई
जारीः--देवाल, चमोली, उत्तराखंड

प्रैस विज्ञप्ति: पुनर्वास तर्क का विषय नही: सर्वोच्च न्यायालय No argument on Rehabilitation 6-11-2011

सर्वोच्च न्यायालय :
                 
                      पुनर्वास तर्क का विषय नही
टिहरी बांध का जलाशय भरने से पहले पुनर्वास करो

See in English after the Hindi text.

‘‘पुनर्वास तर्को का विषय नही है। देश में प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक रोटी, कपड़ा और रहने के लिये स्थान प्राप्त करने का हक है। प्रत्येक व्यक्ति के विकास से ही समाज का विकास होता है।’’ ये शब्द सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर0 एम0 लोधा ने न्यायमूर्ति एच0 एल0 गोखले के साथ, टिहरी 3 नवंबर को बांध संबंधी एन. डी. जयाल एंव शेखर सिंह बनाम केन्द्र सरकार और राज्य सरकार तथा अन्य मुकद्दमों की सुनवाई के दौरान कहे।
इसके साथ ही बांध कंपनी टिहरी जलविद्युत निगम (टीएचडीसी) द्वारा झील का जलस्तर 830 मीटर तक किये जाने का निवेदन नामंजूर कर दिया। अदालत ने टीएचडीसी को पुनर्वास के लिये उत्तराखंड राज्य सरकार द्वारा पुनर्वास पूरा करने के लिये मंागी गई 102.99 करोड़ की राशि देने का आदेश दिया। न्यायमूर्ति लोढा ने राज्य सरकार की वकील रचना श्रीवास्तव को विशेष रुप से कहा की आप हमें पुनर्वास की ‘‘विस्तृत व सत्य जानकारी’’ मुहैया कराये। जिसके बाद आगे की सुनवाई होगी।

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के आदेशों के अनुसार पुनर्वास कार्य किसी भी तरह के विस्थापन के 6 माह पूर्व होना चाहिये था। उच्चन्यायालय ने 29 अक्तूबर 2005 को टिहरी झील को भरने के लिये हरी झंडी दिखा दी और झील का भरना दोपहर अढ़ाई बजे से शुरु हुआ था। किन्तु पुनर्वास का काम आज भी पूरा नही हो पाया है। टिहरी बांध विस्थापितों को पुनर्वास ना होने के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने आज तक टिहरी बांध झील को भरने की पूरी इजाजत नही दी है।

3 नवंबर को सुनवाई के दौरान अतिरिक्त महान्यवादी श्री एच0 पी0 रावल ने कहा की हमे उत्तराखंड सरकार से जलाशय भरने की इजाजत पुनर्वास के लिये अतिरिक्त आवश्यक राशि देने की शर्त पर मिल गई है। उन्होने अदालत में टीएचडीसी की ओर से शपथ पत्र दाखिल किया जिसमें राज्य द्वारा 825 मीटर तक सर्शत जलाशय भरने की इजाजत का एक पत्र, तिथि 25.10.2011, का संलग्न था।

पिछले 20 वर्षो से विस्थापितों का पक्ष रख रहे, वादियों के वकील संजय पारिख ने अदालत को बताया की पुनर्वास मात्र पैसा देने से नही हो जायेगा। पुनर्वास राज्यसरकार और केन्द्र सरकार दोनो की ही जिम्मेदारी है। पिछले पंद्रह वर्षो से विस्थापित पुनर्वास की बाट जोह रहे है। सही व उचित पुनर्वास करने में दोनो ही नाकाम रहे है। पिछले वर्ष 2010 में अधिक वर्षा के कारण हरिद्वार व ऋषिकेश में बाढ़ का खतरा दिखाकर टीएचडीसी ने माननीय अदालत से टिहरी बांध जलाशय में 830 मीटर से उपर पानी भरने की इजाजत ले ली थी। जो सही नही था। पानी भरने के कारण रिम के चारोओर के गांवो मेे भूस्खलन हुआ है। जिनका पुनर्वास भी नही हो पाया है। माननीय अदालत ने अभी तक अनेको आदेश दिये है जिसके बावजूद भी पुनर्वास नही हो पाया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोन्साल्विस ने कहा नदीपार के लोग के लिये प्रस्तावित पुल भी नही बन पाये है। अभी 825 मीटर के नीचे रहने वालो तक का पुनर्वास नही हो पाया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राजीव धवन ने कहा की हम जमीनी सच्चाई अदालत के सामने रख रहे है जबकि टीएचडीसी कागजो पर पुनर्वास पूरा हुआ दिखा रही है। देश में बांधों के कारण हुये विस्थापितों की स्थिति भाखड़ा बांध से लेकर नर्मदा के बांधों तक यही है। टिहरी बांध उसी क्रम में है। बांध बनाने के लिये सुंदरलाल बहुगुणा व मेधापाटकर के साथ बुरा सलूक किया गया किन्तु पुनर्वास आज भी पूरा नही हुआ है।

न्यायमूर्ति लोधा ने कहा की अदालत पूरी बात को सही रुप से जानने के बाद ही निर्णय देगी। पुनर्वास पर तर्क-विर्तक नही होने चाहिये। उसे सही रुप से पूरा करना आपकी जिम्मेदारी है।

ज्ञात्वय है कि एन. डी. जयाल एंव शेखर सिंह बनाम केन्द्र सरकार और राज्य सरकार तथा अन्य कई केस सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे है। ग्यारह वर्षो बाद 1 सितंबर 2003 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में टिहरी बांध को स्वीकृति देते हुये कहा था किः-
‘‘यह स्पष्ट किया गया है कि परियोजना के चालू होने के पूर्व शर्तो को साथ-साथ अमल करने करने की शर्त को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के मौजूदा प्रक्रियाओं के तहत बहुत बारीकी से निगरानी किया जाएगा एवं परियोजनाकार यह सुनिश्चित करेंगे कि जलाशय को भरने के लिए टी-1/टी-2 सुरंग बन्द करने के पूर्व हरेक तरीके से विस्थापन, पुनस्र्थापन एवं पुनर्वास हो जाए।’’

हम लोगो की ओर से बोलने वाले अधिवक्ताओं सर्वश्री संजय पारिख, श्री कोलिन गोन्साल्विस, श्री राजीव धवन का आभार व्यक्त करते है। अब राज्य सरकार और केन्द्र सरकार दोनो को ही ना केवल टिहरी बांध के पूर्ण जलाशय स्तर तक का वरन् रिम के चारों ओर हुये 80 से ज्यादा गांवो में हो रहे भूस्खलन के खतरों को दूर करना चाहिये। राज्य सरकार अब पुनर्वास स्थलों पर मूलभूत सुविधाओं को पूरा करे। इन्ही सुविधाओं में कमी को दिनकर समिति की फरवरी 2010 की रिर्पोट में कहा गया था और 102.99 करोड़ रुपयों की मांग में इन सुविधाओं हेतु भी पैसे की आवश्यकता जुड़ी है। देखना यह भी है कि यह पैसा इन्ही कार्यो पर खर्च हो। भ्रष्टाचार ना हो यह भी देखना होगा। राज्य सरकार को पुनर्वास हेतु यह धनराशि उपलब्ध कराने के लिये माननीय सर्वाेच्च न्यायालय के कदम का भी हम स्वागत करते है। टीएचडीसी को नयी परियोजनाये आंबटित करने वाली राज्य सरकार अब पुनर्वास के कार्य को युद्धस्तर पर करे।

विमलभाई

अदालत में केस के दौरान उपस्थित

पूरण सिंह राणा