Sunday, 26 May 2019

प्रेस नोट 17 मई, 2019

प्रेस नोट       17 मई, 2019

        बांध का काम रोका: समस्याओं का निदान नही



13 मई 2019 से नैटवाड़-मोरी बांध परियोजना (60 मेगावाट), टॉन्स नदी, ज़िला उत्तरकाशी, उत्तराखंड से प्रभावित नैटवाड़ और बनोल गांव के लोगों ने अपनी बरसो से लंबित मांगों की पूर्ति ना होने के कारण बांध का काम रोका हुआ है उनकी मांगें वही है जो कि उनसे जनसुनवाई तथा उसके बाद अलग-अलग समय पर वादे किए गए और जिन्हें पूरा नहीं किया गया है।


अफसोस की बात यह है कि प्रशासन ने अभी तक कोई सकारात्मक पहल नहीं की है। स्थिति खराब है।
-नैटवाड़ में एक मकान गिरा है।
-नैटवाड़ और बनोल के वह सभी मकानों में दरारें आई है। भविष्य में इन मकानों की गिरने का पूरा खतरा है।
-लोगों से जो  वादे किये गए थे वे पूरे नहीं किये गए है। जिसमें मुख्यता प्रत्येक परियोजना प्रभावित परिवार को रोजगार, गांव में ढांचागत विकास कार्य, पुनर्वास नीति में किये गए वादे आदि हैं।
-लोगों की खास मांग है कि परियोजना प्रमुख राजेश कुमार जगोरा को वहां से हटाया जाए।
-बड़े-बड़े डंपर चलने की वजह से उड़ती धूल से स्थानीय बाजार और लोगों को अलग तरह की समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं। कई दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं जिस पर कंपनी ध्यान नहीं देती।
नैटवाड़ और बनोल गांव के लोगो ने  बांध परियोजना का विरोध नहीं किया था। परियोजना के बारे में जैसा बताया गया, जो उनसे वादे किये गए उसको ही लोगो ने सच माना था। बांध की जनसुनवाई से पहले उनको पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट और प्रबंध योजना हिंदी में, आसान भाषा में मुहैया नहीं कराई गई थी।  इसके सबूत हमारे पास मौजूद है। हमने तभी कहा था कि भविष्य में समस्याएं आएंगी और लोग उसका निवारण नहीं करवा पाएंगे क्योंकि प्रशासन की भूमिका जन सुनवाई के बाद मात्र बांध निर्माण में आने वाली समस्याओं को दूर करने की रह जाती है। आज लोग बांध का समर्थन करके भी भयानक समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

जखोल-साकरी बांध परियोजना की जनसुनवाई प्रक्रिया भी गांव वासियों को बिना पूरी जानकारी दिए, जबरदस्ती के साथ  पूरी की गई है। हमें खतरा है कि वहां का भविष्य भी इसी तरह का होगा।

नैटवाड़ और बनोल के संदर्भ में हमारी प्रशासन से मांग है कि:-

1-तुरंत लोगों की इन गंभीर समस्याओं को देखते हुए एक त्रिपक्षीय वार्ता बुलाये जिसमें SJVNLl के उच्च अधिकारी, जिलाधीश स्वयं आप और प्रभावित लोग हो।

2-समझौते की कार्यवाही तीनों पक्षो के सामने सुनाई जाए और तब उस पर हस्ताक्षर हो।

2-समझौते में जो भी हो तय किया जाए उसको समयबद्ध पूरा किया जाए।

लोगों के अधिकारों की रक्षा की जाए। वास्तव में यह संविधान की धारा 21 के अंतर्गत उनकी जिंदा रहने की अधिकार पर हमला है। उनकी समस्याओं के निदान की ओर कार्य होना कि उनके ही खिलाफ कोई कार्यवाही करके उनकी आवाज दबाने का प्रयास हो। देश के तमाम लोगो की नज़र इस छोटी परियोजना पर है। सब ये देख रहे हैं कि किस तरह मात्र दो गांवों के प्रभावितो की बात की भी अनसुनी की जा रही है।

रामबीर, राजपाल सिंह रावत, विमल भाई, विजय सिंह

प्रेस नोट 1 मार्च, 2019


प्रेस नोट 1 मार्च, 2019

  जन सुनवाई में जनता से खतरा क्यों?


उत्तराखंड शासन प्रशासन ने दिखा दिया कि बांध कंपनियां लोगों के अधिकारों और पर्यावरण से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
यमुना घाटी में टॉन्स नदी की सहायक नदी सुपिन पर प्रस्तावित
जखोल साकरी बांध परियोजना की पर्यावरणीय जनसुनवाई  प्रभावित क्षेत्र से 40 किलोमीटर दूर मोरी ब्लॉक में कथित रूप से पूरी कर दी गई। 1 मार्च को जन सुनवाई का समय 11:00 बजे से शुरू हुआ किंतु उसमें खास जखोल गांव के लोगों को रोका गया। जखोल गांव इस बांध के लिए प्रस्तावित 9 किलोमीटर लंबी सुरंग के ऊपर आता है और जहां सुरंग के दुष्परिणाम संभावित हैं।
प्रशासन ने चुनकर जखोल गांव के अलावा अन्य प्रभावित गांवों पांव तल्ला, मल्ला, सुनकुंडी और धारा के सैकड़ो लोगों को भी जनसुनवाई में जाने से मोरी जखोल मोटर मार्ग पर बैरिकेड लगा कर रोक दिया। जखोलगाँव के प्रधान सूरज रावत के नेतृत्व में लोगो ने ब्लॉक के दरवाजे पर धरना किया और लगातार तीखे नारे देकर बैठे रहे। कोट गांव के प्रधान सूरज दास, डगोली गांव की महिला प्रधान के साथ ग्राम प्रधान हडवाड़ी के मुंशीराम ने भी धरना दिया।


मोरी बाजार की तरफ माटू जनसंगठन के साथी विमल भाई, रामलाल भाई, गुलाब सिंह रावत व राजपाल रावत को पुलिस ने यह कहकर रोका कि आपको लेने एस डी एम पूरणसिंह राणा आएंगे।



लगातार निवेदन करने पर भी जबर सिंह असवाल कानूनगो और पटवारी अनिल असवाल ने नहीं जाने दिया।
दोनों ही तरफ़ लोग लोगो को बाहर रोक कर अंदर जनसुनवाई की प्रक्रिया पूरी कर ली गई।
जब सभी अधिकारी बाहर सड़क पर आए तो लोगों ने उनको वहां रोकने की कोशिश की। जिला अधिकारी आशीष चौहान जी सहित सभी अधिकारी तेज रफ्तार गाड़ियों से 1 किलोमीटर दूरी पी डब्लू डी के गेस्ट हाउस पहुंचे, जहां लोग भी दौड़ते हुए पहुचे और सड़क पर चक्का जाम किया।


बाद में जिला अधिकारी ने गेस्ट हाउस से बाहर आकर मामला सुलझाने की कोशिश की। विमल भाई ने लोगो की ओर से उनसे एक ही प्रश्न पूछा कि लोगों को अंदर आने से क्यो रोका गया? यह हमारी संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। यह जनसुनवाई पूरी तरह प्रायोजित कार्यक्रम की तरह पूरी की गई है।



गुलाब सिंह रावत ने कहा कि हम अपनी मांग जो पहले हमने कही थी उसी को दोहराना चाहते थे। जब तक हमें पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट, पर्यावरण प्रबंध योजना व सामाजिक समाघात योजना हिदी में नहीं मिल जाते हम बांध पर अपनी बात कैसे रखेंगे?  सुनकुंडी गांव के जयवीर ने कहा कि मुझे सुबह पुलिस ने पहले ही उठा दिया था। हम 2011 से इस बांध का विरोध कर रहे हैं हमारी बात तक नहीं सुनी गई।



रामलाल जी ने कहा लोगों को डराने के लिए जखोल के 21 लोगों पर झूठे मुकदमे कायम किये गए हैं।
साथी प्रदीप ने आरोप लगाए की जनसुनवाई में किन्ही आंगनबाड़ी की व आशा कार्यकर्ताओं को तथा अन्य सरकारी कर्मचारियों को बिठाया गया।

धारा गांव के प्रह्लादसिंह पवार बहुत मुश्किल से जनसुनवाई में जाकर अपनी बात कह पाए। उनका कहना है कि जब पर्यटन के लिए और लोगों के स्थाई रोज़गार के लिए आवश्यक हर कि दून मोटर मार्ग को गोविंद वन्य जीव बिहार के कारण स्वीकृति नहीं दी जा रही है तो बांध की 9 किलोमीटर लंबी सुरंग के लिए कैसे स्वीकृति की बात है? जब भूकंप नीचे से आता है तो सुरंगों के लिए भारी मात्रा में विस्फोटक इस्तमाल करने से ऊपर क्या स्थिति होगी?
राजपाल रावत के कहा कि सुरंग परियोजनाओं के असरों को पूरी तरह नकार कर जखोल गांव को प्रभावित तक की श्रेणी में नहीं रखा जा रहा?
शासन प्रशासन और बाध कंपनी ने 12 जून की जनसुनवाई स्थगित होने को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया। इसीलिए आज हर हालत में जनसुनवाई की प्रक्रिया पूरी करने के लिए भारी संख्या में लाठी और बंदूक के साथ पुलिस बल के साए में जन सुनवाई की प्रक्रिया पूरी की गई । जनता से दूर यह जनसुनवाई पूरी तरह से असंवैधानिक और शासन-प्रशासन की चालाकी का नमूना है।
हम इसको पूरी तरह नकारते हैं। प्रशासन ने इस बात को मद्देनजर नहीं रखा कि आज के अधिकारी हमेशा रहने वाले नहीं है, किंतु गांव, नदी और पर्यावरण स्थाई है। इस बिना जानकारी दिए आयोजित जन सुनवाई के असर लोक और पर्यावरण हमेशा झेलेंगे।
हम यह कहना चाहेंगे कि हमारे लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं वरन लोगों के अधिकारों और पर्यावरण की सुरक्षा का है।  आंदोलन अपने तमाम संवैधानिक अधिकारों का उपयोग जन और पर्यावरण हक के लिए करेंगा।

रामबीर राणा।  भगवान सिंह रावत


प्रेस नोट 4 मई, 2019

प्रेस नोट                4 मई, 2019

194 दिन के बाद आत्मबोधानंद जी के अनशन को विराम



युवा संत आत्मबोधानंद जी ने आज अपने 194 दिन के लंबे अनशन को विराम दिया। गंगा की अविरलता निर्मलता के लिए मातृ सदन के युवा सन्यासी का संकल्प एक मुकाम पर पहुँचा।

आज 4 मई, 2019 को  राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन  की डायरेक्टर जनरल श्री राजीव रंजन मिश्रा जी का पत्र  मातृ सदन में प्राप्त हुआ ।

स्वामी शिवानंद जी को  लिखे पत्र की पहली पंक्ति है ---
Kindly recall the discussion during my visit to Matri Sadan on 26/4/2019.
इस पंक्ति को मुख्य मानते हुए यानी कि 25 अप्रैल को जब पहली बार राजीव रंजन जी मातृसदन आए थे और उनकी स्वामी शिवानंद जी से और आत्मबोधानंद जी से बात हुई थी उस पूरी बात का आधार इस एक पंक्ति में आ जाता है। इसी पंक्ति को मद्देनजर रखते हुए और पूरे पत्र की शाब्दिक से अधिक आत्मिक भावना के साथ आज युवा संत आत्मबोधानंद जी के 194 दिनों के उपवास को विराम देने का निर्णय लिया।


इस महती अवसर पर इस पत्र को  लेकर स्वयं राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के कार्यकारी निदेशक श्री रोज़ी अग्रवाल जी के साथ देहरादून में मिशन यूनिट के श्री प्रभात राज जी पहुंचे।
साथ ही हरिद्वार की उप जिलाधिकारी महोदय सुश्री कुसुम चौहान जी, सर्किल अधिकारी विजेंद्र दत्त जी तथा अन्य पुलिस अधिकारी भी मौजूद थे ।
साथ ही पास के गांव से जल्दी ही खबर मिलकर कुछ साथी पहुंच पाए।
इस अत्यंत सादगी, पूर्ण छोटे से कार्यक्रम में 26 वर्षीय युवा संत आत्मबोधानंद जी के साथ फलाहार पर बैठे श्री पुण्यानंदजी का भी फलाहार समाप्त हुआ।
आश्रम ने तय किया था कि आत्मबोधानंद जी के बाद इस संकल्प को आगे बढ़ाएंगे।

गंगा की लड़ाई बड़ी है आश्वासनों के साथ उसको जमीन पर उतारने के लिए गंगा के मायके से लेकर गंगा के तिरोहण, गंगासागर तक वह अपनी तरह बहती रहे। इसके लिए देश के तमाम साथियों को काम करना ही होगा।

स्वामी शिवानंद जी तथा स्वयं आत्मबोधानंद जी ने कहा कि 194 दिन के उपवास के बीच देशभर से तमाम साथियों ने जो धरने, प्रदर्शन, रेलिया आदि की व सरकार को पत्र भेजे, उन सबका मातृ सदन की ओर से हम आभार मानते हैं।

गंगा को अविरल रहने दो, गंगा को निर्मल रहने दो।
गंगा को गंगा रहने दो।

विमल भाई
माटू जनसंगठन

प्रेस नोट 20-4-2019



25 तक सरकार नही मानी तो 27 से जल भी नही पियेंगे।

युवा संत आत्मबोधानंद की खुली चेतावनी



24 अक्टूबर 2018 से अविरल निर्मल गंगा की मांग के साथ मातृ सदन, हरिद्वार, उत्तराखंड में अनशनरत युवा संत आत्मबोधानंद ने अपने अनशन के 177वें दिन 18 अप्रैल 2019 को सरकार को खुली चेतावनी दी-

"चूँकि 177 दिनों के अनशन के बाद भी मेरी मांगों को न तो माना गया है और न ही मुझसे कोई वार्ता ही करने आया है ऐसी परिस्थिति में यदि 25 अप्रैल 2019 तक मेरी मांगें नहीं मानी जाती है तो 27 अप्रैल 2019 से मैं जल का भी त्याग कर दूँगा"

ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद, मातृ सदन, हरिद्वार।--18-04-2019"

Since even after 177 days fast neither my demands have been fulfilled nor any people from the government came for dialogue, in this situation if my demands are not fulfilled till 25th April, 2019 I will leave even taking water intake from 27th April, 2019.

Brahmchari Aatmbodhanand, Matri Sadan Haridwar. 18-04-2019

आत्मबोधानंद जी के इस निर्णय के पीछे सरकार की पिछले 6 महीनो से उनकी मांगों के प्रति उपेक्षा है। सरकार ने न उनसे कोई बात की न ही कोई लिखित ब्यान तक नही दिया। यह
ना केवल अफसोस की बात है, वरन लोकतंत्र में संवैधानिक, नैतिक बल और आहिंसात्मक आंदोलनों को दरकिनार करने की शर्मनाक हरकत है।

हम इस सरकारी मौन का पूरी तरह से निषेध करते हैं। 11 अक्टूबर 2018 को स्वामी सानंदजी ऋषिकेश में सरकारी अस्पताल में अपनी संदेहास्पद मृत्यु से पहले लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखते रहे। जिसका कि प्रधानमंत्री ने कभी कोई जवाब नहीं दिया।

उन्हीं कि उपवास पद्धति को मानते हुए, उनकी मांगों की पूर्ति के लिए आज आत्मबोधानंद जी अपने जीवन को दांव पर लगा रहे हैं। इस सरकार ने ना सानंद जी से कोई सकारात्मक बात कि ना ही आत्मबोधानंद जी के साथ कोई संवाद किया है।

स्वामी सानंद की मुख्य मांगे  साल भर से ज्यादा लटक रही है। गंगा एक्ट, गंगा भक्त परिषद, गंगा पर निर्माणाधीन प्रस्तावित बांधों पर रोक, गंगा पर खनन पर रोक व  वन कटान पर रोक आदि पर कोई ठोस सकारात्मक कदम सरकार ने आज तक नहीं उठाया।

चुनाव के समय में सरकार के पास यह आसान बहाना है कि आचार संहिता लागू है। किंतु हरिद्वार में चल रहे भयंकर खनन और स्टोन क्रेशरो की वजह से गंगा पर बुरा असर हो रहा है। स्थानीय हरिद्वार प्रशासन अब तक के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेशों को लागू करने में असफल दिखता है।

केंद्र सरकार ने गंगा पर कोई नए बांध नही बनेंगे, ऐसे कई बयान दिए। मगर खास करके खनन जिसको कि पुराने अदालती आदेशो, सरकारी अधिसूचना के साथ यदि प्रशासनिक सख्ती बरती जाती तो राज्य सरकार अपने स्तर पर भी रोक सकती है। मगर खनन माफिया को रोकने में सरकारें पूरी तरह असफल क्यों दिखाई दे रही है?

वास्तव में गंगा की अविरल प्रवाह और गंगा के गंगत्व को पुनः स्थापित करने के लिए उत्तराखंड में मंदाकिनी नदी पर
सिंगोली-भटवारी, धौलीगंगा पर तपोवन-विष्णुगाड तथा अलकनंदा पर विष्णुगाड- पीपलकोटी परियोजनाओं को रोकना जरूरी हैं। चूंकि फिलहाल ये तीनों परियोजना अभी निर्माणाधीन है। तथा सीधा गंगा के प्रवाह पर असर डालती हैं।  पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह जी की सरकार ने भागीरथीगंगा पर 4 निर्माणाधीन परियोजना रोकी थी। तब गंगा के लिए अपने आप को समर्पित कहने वाली भाजपा सरकार ने इन परियोजनाओं को क्यों नहीं रोका? जबकि केंद्र राज्य को होने वाली प्रतिवर्ष होने वाली 12% मुफ्त बिजली के नुकसान को ग्रीन बोनस के रूप में दे सकती है जोकि 200 करोड़ से भी कम होगा।

इन सब परिस्थितियों में ही युवा संत आत्मबोधानंद को ये कड़ा निर्णय लेना पड़ा है। सरकार को किसी भी स्तर से आकर पहल करनी चाहिए। सरकार अपनी कथनी को लिखित रूप में लेकर आए। संत आत्मबोधानंद का जीवन बचना ही चाहिए।

साथी-----
विमलभाई, रामबीर राणा

मुख्य मांगे:-

1.        हरिद्वार में गंगा के दोनों ओर रायवाला से रायघाटी तक 5 किलोमीटर की दूरी तक खनन और स्टोन क्रेशर को वर्जित किया जाए।

2.    गंगा पर निर्माणाधीन सिंगोली- भटवारी, तपोवन- विष्णुगाड और विष्णुगाड- पीपलकोटी बांधों को रोक दिया जाए।

3. मातृसदन के संत आत्मबोधानंद से तुरंत बात की जाए।

Thursday, 28 February 2019

प्रेस नोट- 28 फरवरी, 2019

    
फ्री गंगा, ( अविरल गंगा)
फेसबुक@freeganga ट्विटर@matrisadan, #freeganga, www.freeganga.in                              
 ---------------------------------------------------------------------------------------------

15 दिन की जांच समिति अस्वीकार

128 दिन के लंबे उपवास पर सरकार गंभीर नहीं


मातृ सदन हरिद्वार में 26 वर्षीय उपवासरत आत्मबोधानंद जी का आज 128वां दिन है। देशभर में प्रदर्शनों, समर्थन में भेजे जा रहे पत्रों के बावजूद भी सरकार गंभीर नहीं नजर आती। हमारी जानकारी में आया है की सरकार ने सात निर्माणाधीन बांधो की ताजा स्थिति जानने के लिए एक समिति भेजी है। समिति में ऊर्जा मंत्रालय, जल संसाधन एवं गंगा पुनुरूजीवन मंत्रालय और वन एवम जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के विशेषज्ञ गए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार इसमें कोई स्वतंत्र विशेष के नहीं है।

1-मध्यमेश्वर व 2-कालीमठ यह दोनों ही 10 मेगावाट से कम की परियोजनाएं हैं जो की मंदाकिनी की सहायक नदी पर है। 3- फाटा बयोंग (76 मेगावाट) और 4-सिंगोली भटवारी (99 मेगावाट) मंदाकिनी नदी पर है 5-तपोवन-विष्णुगाड परियोजना (520 मेगावाट) का बैराज धौलीगंगा और पावर हाउस अलकनंदा पर निर्माणाधीन है। इससे विष्णुप्रयाग समाप्त हो रहा है। विश्व बैंक के पैसे से बन रही 6- विष्णुगाड- पीपलकोटी परियोजना (444 मेगावाट) अलकनंदा पर स्थित है। 7-टिहरी पंप स्टोरेज (1000 मेगा वाट) टिहरी और कोटेश्वर बांध के बीच पानी का पुनः इस्तेमाल करने के लिए।

यदि सरकार गंगा के गंगत्व को पुनः स्थापित करना चाहती है तो वह खास करके क्रमशः 4, 5 और 6 नम्बर की परियोजनाओं को तुरंत रोके।  फिलहाल है यही तीनों परियोजना अभी निर्माणाधीन है। पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह जी की सरकार ने भागीरथीगंगा पर 4 निर्माणाधीन परियोजना रोकी थी। तब गंगा के लिए अपने आप को समर्पित कहने वाली सरकार इन परियोजनाओं को क्यों नहीं रोक रही? जबकि केंद्र राज्य को होने वाली प्रतिवर्ष होने वाली 12% मुफ्त बिजली के नुकसान को ग्रीन बोनस के रूप में दे सकती है जोकि 200 करोड़ से भी कम होगा।

हम गंगा पर राजनीति और उसके आर्थिक दोहन को  स्वीकार नहीं करते बल्कि उत्तराखंड के समुचित और सच्चे विकास और गंगा के गंगत्व के हिमायती हैं।

हजारों करोड़ों गंगा की सफाई अविरलता व निर्मलता के लिए खर्च किया गया है। खुद प्रधानमंत्री अर्धकुंभ नहा कर लौटे हैं। सरकार इस बात से खुश नजर आती है कि उसने गंगा में कुंभ के समय स्वच्छ पानी दिया है जो कि पिछली सरकारों ने नहीं दिया। हम इस बात का साधुवाद देते हैं। किंतु गंगा जी मे पानी लगातार और साफ बहता रहे। मगर प्रश्न यह है कि क्या गंगोत्री और बद्रीनाथ के पास से भागीरथी गंगा और विष्णुपदी अलकनंदा गंगा अपनी सहायक नदियों के साथ जब देवप्रयाग में मिलकर गंगा का बृहत रूप लेकर आगे बढ़ती है तो क्या वह जल गंगासागर तक पहुंच पाता है? गंगा की अविरलता क्या बांधों के चलते संभव है? पर्यावरण आंदोलनों ने, सुंदरलाल बहुगुणा जी से लेकर स्वामी सानंद जी के लंबे उपवासो के बाद उसी संकल्प के साथ बैठे आत्मबोधानंद जी के 128 से दिन अनशन के बाद भी सरकार गंगत्व की गम्भीरता क्यो नही समझ रही?

संतआत्मबोधानंद जी किसी ज़िद पर नहीं बैठे हैं। सत्य  अकेला भी खड़ा होता है तो वहां सत्य ही रहता है। सरकार को यह बात मान माननी ही होगी।

हमारी प्रधानमंत्री से अपील है कि वे अपने कार्यकाल के अंतिम समय में गंगा गंगत्व के लिए इन बांधों को निरस्त करें। भविष्य में बांध न बने इसके लिए तुरंत सक्षम कदम उठाए और कम से कम गंगा की कुंभ क्षेत्र के खनन और स्टोन क्रेशर पर तुरंत रोक लगाई जाए।

मधु झुनझुनवाला,  विमल भाई, वर्षा वर्मा, देबादित्यो सिन्हा


Wednesday, 27 February 2019

प्रेस नोट ; 27-2-2019

प्रेस नोट  ; 27-2-2019

जखोल साकरी बांध की जनसुनवाई रद्द करो 

फिर वही धोकाः बिना जानकारी पुलिस के साये में जनसुनवाई 

जखोल साकरी बांध, सुपिन नदी, जिला उत्तरकाशी, उत्तराखंड की 1 मार्च, 2019 को दूसरी पर्यावरणीय जनसुनवाई की घोषणा हुई है। इस बार जनसुनवाई का स्थल परियोजना स्थल क्षेत्र से 40 किलोमीटर दूर है। यह मोरी ब्लॉक में रखी गई ताकि वह जन विरोध से बच जाए। सरकार ने प्रभावितों को उनकी भाषा में आज तक भी जानकारी नहीं दी जो कि वे आसानी से कर सकते थे।

दरअसल 12 जून 2018 को जनता द्वारा सही मुद्दों को लेकर और प्रशासन की सही समझ के कारण जखोल साकरी बांध परियोजना की पर्यावरणीय जनसुनवाई रद्द हुई।  ये मामला सिर्फ और सिर्फ लोगो को उनके क्षेत्र में विकास के नाम पर परिवर्तनों की जानकारी सही व पूरी जानकारी मिलना और उनकी सहमति होने का है।

1 मार्च की जनसुनवाई पर्यावरण आकलन अधिसूचना 14 सितंबर 2006 के नियम विरुद्ध है जो यह कहता है कि जनसुनवाई प्रभावित क्षेत्र में ही होनी चाहिए प्रभावित क्षेत्र में धारा, जिस गांव की नीचे सुरंग जाने वाली है वह जखोल गांव, सुनकुंडी आदि में आज की तारीख में बर्फ है। 

हमने सरकार से मांग क़ी है कि:-
1-  ईआईए अधिसूचना 14 सितंबर 2006 के मानकों का उल्लंघन देखते हुए।
2- जनसुनवाई स्थल 40 किलोमीटर दूर रखने के कारण।
3- मौसम अनुकूल ना होने के कारण।

1 मार्च की जनसुनवाई तुरंत स्थगित की जाए। हमारी पहले से की जा रही मांगे:-

1- ईआईए, एमपी, एसआई हिंदी में अनुवादित करके, लोगों को उनकी भाषा में स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा समझाए जाएं।
2- इस पूरी प्रक्रिया के बाद जनसुनवाई का आयोजन प्रभावित गांवों में हो, जहां अन्य गांवों से लोगों को लाने की व्यवस्था की जाए।

बिना पर्यावरणीय जनसुनवाई के पर्यावरण स्वीकृति नहीं मिल सकती है। इसलिए सरकार किसी भी तरह से जनसुनवाई की कागजी प्रक्रिया पूरी करना चाहती है।

वन अधिकार कानून 2006 की वन अनापत्ति भी प्रभावित गांवो से धोखे से ली गई है ।  सामाजिक समाघात आकलन रिपोर्ट की जनसुनवाई 28 नवंबर को प्रभावित क्षेत्र  से दूर मोरी ब्लॉक में रखा गई । भारी संख्या में पुलिस बल लगाया गया।
जबकि ना तो गांव की कोई समिति बनी, ना गांव के लोगों को परियोजना के बारे में समझाने के लिए कोई बैठक हुई। जो की कानूनी रूप से होना चाहिए था।

लोगों की गैर जानकारी का फायदा उठाकर बांध कंपनी ने पर्यावरणीय जनसुनवाई के अलावा बाकी की वन स्वीकृति और जमीन के मसले को हल करने की कोशिश की है। 

सामाजिक समाघात आकलन रिपोर्ट की जनसुनवाई भी सिर्फ एक भ्रम था। वरना कंपनी की पुनर्वास नीति पहले से लगभग तय है। मात्र जमीन का रेट तय करने की बात होगी। 

जब लोगों को बांध की जानकारी ही नहीं दी, जब लोगों के वन अधिकार कानून 2006 के अंतर्गत अधिकार ही सुरक्षित नहीं किए गए, जब गोविंद पशु विहार का मुद्दा ही अभी तय नहीं हुआ तो फिर कैसी जनसुनवाई ?  कंपनी, प्रशासन व पुलिस के बल पर लोगो से यह झूठी स्वीकृति या झूठी अनापत्ति ली गई हैं।  

प्रशासन ने इसको शायद अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया है। प्रशासन ने यहां के पर्यावरण और लोगों के अधिकारों को पूरी तरह उपेक्षित किया है। क्योंकि प्रशासन को लगता है कि लोग कहां तक लड़ेंगे? आखिर उनके और भी मसले प्रशासन के पास होते हैं। ग्राम प्रधान भी एक सीमा से आगे नहीं बोल सकते क्योंकि उन पर भी प्रशासन का दवाब होता है। इन सबके बीच क्षेत्रीय पर्यावरण और जनक दोनों ही नकारे जा रहे हैं।

जखोल गांव के 19 लोगों पर झूठे मुकदमे लगाए गए, ताकि जखोल के लोगों को दबाया जा सके। जो लोग मौजूद नहीं थे उन तक पर भी ये झूठा मुकदमा लगाया गया है। आज जखोल फिर कल और गांव भी होंगे। जो जानकारी मांगेगा उसका यही हाल होगा। माटू जन संगठन लगातार यही बात सरकार से उठाता रहा है। जब यह तर्क दिया जाता है कि बांध लोगों के लिए व प्रदेश के विकास के लिए है तो फिर लोगों और पर्यावरण के हित के नियम कानूनों का उल्लंघन खुद सरकार ही क्यों करती है? सरकार-शासन-प्रशासन लोगों के साथ है या बांध कंपनी के साथ ?

बांध परियोजना की जानकारी लोगो की भाषा मे बिना दिए, प्रतिकूल मौसम में प्रभावित क्षेत्र से दूर पर्यावरणीय जनसुनवाई फिर एक धोखा होगी।

प्रहलाद पवार, रामवीर राणा, केसर सिंह, राजपाल सिंह, विमल भाई 

23- 2-2019 Press Note

23- 2-2019 Press Note
                 फ्री गंगा, ( अविरल गंगा)
जेपी हेल्थ पैराडाइज,रोड नंबर 28, मेहता चौक, रजौरी गार्डन,नई दिल्ली  फेसबुक@freeganga ट्विटर@matrisadan, #freeganga, www.freeganga.in                                                                                                   ----------------------------------------------------------------------------------------------